१३-१०-०९

कॉन्ट्राडिक्शन- 5


उन दिनों में मां होना चाहता था और छत के पंखे के नीचे पसीने के तर तकिये को भूलकर घंटों दुनिया से बेहोश रहता था... दिमाग बाकी जिस्म से अलग होकर कहीं तैरने चला जाता था, या लगता था कि सिर्फ दिमाग सो गया है... बाकी बेहोश जिस्म देर तक जिंदा रहता था... और फिर मर कर ना जाने कैसे लौट आता था... जैसा भी था, अच्छा दौर था...

मैं तुम्हें अक्सर याद करने की कोशिश करता था... और जब बहुत सोचने पर भी तुम्हारा चेहरा... तुम्हारा रंग और तुम्हारी कोई पहचान मुझे याद नहीं आती तो मैं शराबी हो जाना चाहता था... मुझे लगता कि मैं तुम्हें न जानते हुए भी भावुक होना चाहता हूं... तुममें डूब मरना चाहता हूं... तुम्हें तमाम रंगों में से चुन लेना चाहता हूं और तुम्हारे माथे पर लाली मलना चाहता हूं... पर तुम मुझे याद नहीं आती थीं...

मैं उस दौर की उलझनों से निकलने के लिए बहस करता... सिगार पीता... या शायद बीड़ी... किसी दोस्त के कहने पर फोस्टर की बीयर और बैगपाइपर की शराब... और फिर इन सबसे निजात पाने के लिए कभी कभी तुम्हें याद कर लिया करता... इस सब से मैं अक्सर परेशान रहता और फिर और नशीला हो जाता...

मैं हमेशा चाहता कि तुम मेरा जिक्र करो... मेरा नाम लो और मै तुम्हें पुकार लूं... लेकिन न तो मुझे तुम्हारा नाम याद रहता और ना ही तुम्हें मेरा... और अचानक मुझे पता चलता कि मैं अब तक तुमसे नहीं मिला हूं... देर तक तकिये पर पसीना बहाता रहता और अक्सर पंखा चलाना भूल जाता... मैं अक्सर खामोशी में सोचता कि तुम्हारा अस्तित्व कैसा है...? मैं तुम्हारे लिए परेशान होना चाहता और तुम्हें ढूंढने की कोशिश करता...

मैं अक्सर तुम्हारे ना होने में होने की उम्मीद करता... कल्पनाओं में जीता... और तुम्हारे जिस्म की बनावट को अक्सर ओढा करता... मैं तुम्हें बेपनाह मोहब्बत करना सीख गया था... इसलिए तुम्हें जानना चाहता था... इसलिए मैं अक्सर तुम्हें पैदा कर लिया करता था...

तुम अगर उस दौर में होतीं तो मैं तुम्हारी मां बनता... वैसे तुम आज भी होतीं तो भी मैं मां ही बनता... हर बार तुममें खपने की कोशिश करता और निराश होकर बार बार आत्महत्या करता रहता... और इस तरह जीना सीखकर तुम्हें इस दुनिया का सामना करना सिखाता... मैं उन दिनों मां होना चाहता था... हर लड़के की तरह...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

१२-१०-०९

खबर में कॉन्ट्राडिक्शन

मैं प्रतिभा कटियार को नहीं जानता... लेकिन वो जानती हैं... उन्होंने मुझे मेरे नजरिये से पढ़ा है... ये भी नया कॉन्ट्राडिक्शन है... मुझे अनुमान है कि प्रतिभा आईनेक्ट में पत्रकार हैं... खबर ये है कि 11 अक्टूबर, आईनेक्स्ट के ब्लॉग श्लॉग कॉलम में कॉन्ट्राडिक्शन और ब्लॉग का जिक्र है... जो है वैसा स्कैन यहां लगा रहा हूं...
(पढ़ने लायक देखने के लिए चित्र पर दो बार क्लिक करें)

प्रतिभा कटियार, जो भी हैं... शुक्रिया करके उसे छोटा नहीं बनाना चाहता...
खबरी
9953717705

१०-१०-०९

कॉन्ट्राडिक्शन-4


मैं दुनिया के सबसे वाहियात जोक सुनकर हंसना चाहता था, सबसे गंदी गाली किसी को देना चाहता था, और सबसे बुरी लड़कियों से मोहब्बत करना चाहता था… अक्सर लोग कहा करते थे कि दुनिया बिगड़ रही है, बूढ़े अक्सर इस बात का मलाल करते थे, और मुझे उनकी बातों पर आश्चर्य होता... मुझे मुझसे बुरा कोई नहीं दिखता था, सिर्फ मेरी दुनिया बुरी थी, बाकी सब उतना खराब नहीं था... मुझे मोहब्बत करनी थी... मैं बुराई ढूंढ रहा था...

लड़की उस शहर से थी जहां तक पहुंचते-पहुंचते गंगा सबसे गंदी हो जाती है... उसने बताया था कि दुनिया के सबसे बुरे अनुभव उसके पास हैं... और मैं ये सुनकर खुश हो जाता करता था... वो सांवली थी... मुझे लगता था कि वो मुझसे कुछ लंबी होगी... न भी हो शायद... पर कभी मैं उसके साथ खड़ा नहीं था... सिर्फ इस बात के अलावा कि मैं वाहियात हो जाता चाहता था... और मुझे एक बुरी लड़की की तलाश थी...

मैंने सोचना बंद कर दिया था कि किसी के साथ प्यार करते हुए जीया जा सकता है... मैं अक्सर सोचता था कि क्या किसी के गले लगकर सुकून से मरा जा सकता है... और जब मैं इस तरह की बातें किसी से करता था, लोग मुझे पागल करार देते थे... मुझे खुद लगता था कि मैं धीरे धीरे पागलपन की ओर बढ़ रहा हूं... मैं मेरे अंदर एक और बुराई की तासीर जानकर फिर खुश हो जाता था...

मुझे अपने बुरे होने पर पूरा यकीन था... उतना ही जितना मेरे पिता को मेरे होशियार होने पर था, या जितना मेरी मां को मेरे भोला होने पर... लेकिन फिर भी कई खालीपन थे, जो भरने पर आमादा था... मैंने कभी सिगरेट न ने पीने की कोई कसम नहीं खाई थी... कभी पिताजी ने मुझसे इस तरह का कोई वायदा भी नहीं लिया था... लेकिन फिर भी सिगरेट पीना मेरे लिए वैसी ही कल्पना थी जैसा एक सांवली बुरी लड़की का साथ... वैसे सिगरेट कभी भी पी जा सकती थी... और किसी लड़की के साथ रहना भी आजाद दिल्ली में कोई मुश्किल काम नहीं है... लेकिन फिर भी ये खालीपन मुझे बताता था कि पूरी तरह बुरा बनने के लिए मुझे सिगरेट पीनी चाहिये... और...

मैं अक्सर इंटरनेट पर सबसे बुरे लोगों के बारे में पढ़ता हूं... तो मैं कुछ देर के लिए निठारी के नरपिशाचों की तरह कल्पना में जीने लगता हूं... मैं किसी गुमनाम से या नामी कवि की कविता पढ़ता हूं तो लगता है कि पुलिस की मार और सरेआम बेशर्मी से भी बुरा सपनों का मर जाना हो सकता है... मैं रोज घर से दफ्तर और दफ्तर से घर तक के चक्कर काटना चाहता हूं... और अपने सारे सपनों को मारकर सबसे बुरा होने की कोशिश करना चाहता हूं...

मैं बुरा बनना चाहता हूं और सोचता हूं कि गांधी को गाली देकर बुरा बना जा सकता है... गांधी के नाम से जुड़ी कोई अच्छाई मेरे सामने आ नाची तो मैं थक जाऊंगा... इसलिए मैं गांधी का नाम नहीं लेता... मैं रास्ते चलते आवारा होना चाहता हूं... और उसी आवारगी में ऐसी हरकतें भी कि दुनिया हिकारत से देखने लगे... पर मैं ऐसा तब नहीं कर पाता जब पसीने से तरबतर कोई अंग्रेजी बोलने वाली और बेबकूफ सी दिखने वाली कोई सांवली लड़की रिक्शेवाले से मोलभाव करने लगती है और देर तक वो उसी संघर्ष में उलझी रहती है... मुझे उसकी परेशानी अपनी जैसी लगती है... और फिर मैं और बुरा होकर उससे नजर फेर लेता हूं... शायद उस वक्त में उससे ज्यादा बुरा नहीं हो सकता था... तब भी नहीं जब मैं उसकी इस मजबूरी का फायदा उठाकर उसे छेड़ रहा होता... और कुछ देर को ही सही वो उस संघर्ष से उबर पाती...

खैर बात दुनिया की सबसे बुरी लड़की की हो रही थी... और अक्सर लोग मुझसे कहते हैं कि आजकल की लड़कियां बिगड़ गई हैं... मैं उसके लिए खुद को तैयार कर रहा हूं..

देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705

२६-९-०९

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी 13


-तुम्हें जुकाम हो गया है.
-कल भीग गया था-
-कब?
-जब पहली हिचकी आई थी रात को- उसके बात सोने नहीं दिया तुमने- बहुत बारिश हुई- तकिया गीला हो गया था-
-तो मैं नहीं आऊंगी आज तुमसे मिलने- पर तुम्हें तो बुखार हैं- तुम भी ना, जरा भी खयाल नहीं रखते अपना-
-पर वो काम तो तुम्हारा है- मुझे तो हमेशा तुम्हारा खयाल रहता है-
-तुम हो कहां अभी ?
-आई पॉड में जा छिपा हूं- दोनों कानों में ठूंस लिये हैं ईयर फोन- कि तुम्हें न सुन सकूं
-तो मैं जाऊं?
-तुम हर पल पूछती हो. और मैं हर बात कहता हूं- जाओ ना,
-फिर तुम क्यों बुलाते हो?
-तुम जाती क्यों नहीं हो.
-कितने कठोर हो ना तुम
-हां, पहाड़ की तरह
-उफ़, फिर पहाड़… तुम उतर क्यों नहीं आते मैदानों में
-और तुम क्यों नहीं चली जाती वापस, पहाड़ों में
-देव, अब पहाड़ मैले हो गये हैं- सावन पिछली बार भीग गया था- अबकी नहीं आया- पिछली बर्फ को भी सर्दी लग गई थी- अबकी बुरांश के पेड़ रूठ गये हैं- देवदार ठूंठ बन गये हैं- जिस नदी के किनारे पानी में पैर डालकर तुम मेरे बालों से चुगली किया करते थे, वो अब झील बन गई है- घाटी में बहुत सी मिट्टी जमा हो गई है- सुना है वहां एक बड़ा बांध बनने वाला है- सब डूबने वाला है- ये पहाड़ दुखता है-
-लेकिन तुम्हें तो पहाड़ अच्छे लगते थे ना बिट्टू-
-लगते थे, पर सिर्फ तुम्हारे साथ- अब नहीं देव.
-तुम कुछ खाओगी- ये काली रातें तुम्हें डराती नहीं हैं- इतनी दूर से रोज तुम कैसे आ जाती हो मेरे पास- रास्ते में कोई नहीं पकड़ता तुम्हें... मुझे डर लगता है-
-देव मेरे पास एक सेब है- दोनों खाएंगे- आधा आधा
-नहीं मुझे खट्टा दही खाना है- मम्मी से झगड़ना है
-तुम अपनी मम्मी से इतना झगड़ते क्यों हो देव-
-तुम मेरी मम्मी में घुस जाती हो- जब वो लाड़ करती हैं तो तुमसे लड़ने का मन करता है- तुम तो चुड़ैल हो ना
-और तुम मेरे पायलेट
-तुम्हें याद है-
-हां याद है, लेकिन जोर से मत बोला करो- सब समझ जाते हैं-
-मुझे तुम्हारी खुशबू चाहिये- सफेद बादल को दे देना- वो आकर मेरी आंखों में बैठ जाता है-
-और तुम अपनी मीठी सी हंसी मुझे भिजवा देना- उसी बादल को लौटा देना चलते वक्त- वो मेरे दिल में बैठा जाता है- भेजोगे ना-
-देव, मुझसे कुछ कहो ना-
-जो मैं कहूंगा, वो तो तुम्हें पता है-
-हां मालूम है- पर एक बार ऐसे ही सुनने का मन कर रहा है-
-मैं नहीं कहूंगा- सब सुन लेंगे- लौटते बादलों के कान में कह दूंगा- तुम उनसे पूछ लेना-
-देव मेरे साथ घूमने चलो-
-कहां-
-नील नदी के पास-
-तब ?
-जमीन के नीचे नीचे बहना मेरे साथ- झील फिर नदी बन जाएगी- और किसी को दिखाई भी नहीं देगी-
-लेकिन उसकी मछलियों का क्या?
-वो गुदगुदी करेंगी तुम्हारे पांवों में-
-लेकिन उसका पानी तो ठंडा होता होगा ना- तुमने जो सपना बुना था, वो पूरा हुआ या नहीं- मुझे तुम्हारा सपना ओढ़ना है-
-नहीं इस बार मैंने सावन बुना है- आंखों में उतर आया है वो- उसी से निकलती है नील नदी- कभी छिपी, कभी उघड़ी...
-और तुम्हारी सलाईयां, जिनसे तुम सपना बुनती हो- उन्हें तुम अपने बालों में लगा लेना- मैं तुम्हारी तस्वीर उतारूंगा- चीन की दीवार पर
-पर वहां तो प्लेन से जाना होगा ना- और वीजा भी बनवाना पड़ेगा, तुम कैसे जाओगे?
-तो नहीं जाऊंगा- नहीं उतारूंगा तुम्हारी तस्वीर- पर फिर तुम्हें हर वक्त मेरे सामने रहना होगा- फिर तुम मुझे याद मत करना- ये हिचकियां मुझे मार देती हैं-
-देव तुम बदल गए हो- कब से?
-जबसे नमस्ते बात खत्म करने के लिए और शुक्रिया ताना मारने के लिए इस्तेमाल होने लगा है- तबसे मैं भी बदल गया हूं- -------------------------------

मुझे यहां नहीं रहा जाता- मुझे कहीं और जाना है- किसी दूसरी जगह- नहीं- किसी दूसरे वक्त में-
किस वक्त में जाना चाहते हो ? किसके पास?
भगत सिंह के पास- सुखदेव और राजगुरू के पास- उनके वाले स्वर्ग में-
उनके स्वर्ग में? तो क्या उनका कोई अलग से स्वर्ग होगा? क्या वहां ज्यादा ऐशोआराम होगा-
हां उनका स्वर्ग अलग है- उस स्वर्ग से सभी देवता भाग गये हैं- इंद्र का सिंहासन हिला दिया है- वहां जगह जगह फांसी के झूले हैं- वहां फांसी पर झूलने वालों की लंबी कतार लगी है- भगत बार बार हिन्दुस्तान की तरफ देखते हैं- फिर मेरी और तुम्हारी तरफ देखते हैं- और भागकर फिर फंदे पर झूल जाते हैं- पर इस बार भगत की जान नहीं जा रही है- भगत के भीतर कुछ छटपटा रहा है- भगत के पांव बहुत देर तक तड़पते रहते हैं- सुखदेव और राजगुरू भी छटपटा रहे हैं- बड़ा बेचैन माहौल है- भगत का तड़पना बंद होता है तो वो मुझे फिर देखते हैं- फिर तुम्हें देखते हैं- सुखदेव और राजगुरू रोना बंद कर देते हैं- जोर जोर से आवाज लगाते हैं- लेकिन मुझे सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनाई देती है-
तुम ऐसे मत कहा करो-मुझे डर लगता है- लगता है जैसे मैं तुम्हें खो दूंगी-

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बिट्टू देव को बुला रही थी- बिट्टू से दूर होकर देव को भी उसकी अहमियत पता चल गई थी- देव भगत के पास नहीं गया- मसूरी गया- लौटते में बिट्टू ने कहा- देव मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी- अब देव के कानों में बस यही गूंजता है- सपने में पहाड़ी पर मेमना लेकर बैठी लड़की नजर आती थी- जिसका इंतजार खत्म ही नहीं होता था- वक्त करवट ले रहा था- करियर और दुनिया के फेर में देर दर दर भटक रहा था- भटकाव देव की नियति बन गया था- नौकरी पर नौकरियां- और शहर दर शहर- देव क्या ढूंढ रहा था ये उसे भी नहीं पता था- पर न जाने क्या हुआ था देव को कोई ठौर उसे नहीं बांध पा रही थी- सब कहने लगे थे- कहां टिकेगा ये लड़का? मां कहती- इसके पैरों में तो चक्का लगा है- पिताजी कहते- करियर का कबाड़ा करना है क्या- दोस्त पूछते- और कहां भई- या ज्यादा से ज्यादा- यार फलां चैनल में तो तेरी कोई जुगाड़ होगी- मेरी कुछ बात जमवा दे यार- देव पर आवारगी हावी थी- या फिर कोई बोझ जिसे उतार फेंकने की हड़बड़ाहट उसे कहीं टिकने नहीं दे रही थी- ‘देव, मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी’. देव को डर लगता था- क्या वाकई- कहीं वो मेरा इंतज़ार तो नहीं कर रही- वैसे इस दुनिया में यकीन नहीं होता था- पर फिर भी खयाल कभी कभी आ जाता था- मसूरी की हवा की खुशबू को भूलने में चार साल लग गए- बिट्टू को भूलने के लिए ये जनम कम पड़ रहा था- पर देव तो भूलने में माहिर था- भूल गया- पहाड़ियों को भी- और पहाड़ी भूटिया पिल्लों से खेलती, बर्फ जैसे मेमने के साथ अटखेलियां करती बिट्टू को भी- देव अब एक बड़े मीडिया प्रोजेक्ट में हिस्सेदार था-
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वो दिन बड़े लम्बे होते थे... सूरज सारी गर्मी से देव को झुलसाना चाहता था और देव के वो पूरी ताकत से लड़ने के दिन थे... मायानगरी से लेकर राजनगरी तक में धक्के खाना उन दिनों देव की ड्यूटी हो गई थी... कठोर दिन और निष्ठुर रातें... पर देव की सनक के आगे सब कट गये... धीरे-धीरे...

हमेशा की तरह देव के कानों में कोई बाबरी धुन बज रही थी... देव लिखने में तल्लीन था... देव का हुलिया बिल्कुल बदल चुका था... आंखों पर बिना फ्रेम का मंहगा चश्मा था... नंबर कोई माइनस दो होगा... दूर की चीजें बिना चश्मे के धुंधली सी दिखती थीं... पिछले दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था... देव की चार किताबें बाजार में आ चुकी थीं... किसी दार्शनिक की तरह बाल लम्बे और घुंघराले हो गये थे... बालों का झड़ना रुक गया था... नीला डेनिम का कुर्ता और सफेद रेशमी पजामा जंच रहा था... दीवार पर बनी पुरानी अंगीठी अब सजावट का सामान हो गई थी... और देव से जुड़ी बिट्टू की यादें भी... देव कई दफा मसूरी गया पर फिर किसी पहाड़ी के पेड़ के नीचे इंतजार करती बिट्टू नहीं मिली... ऐसा नहीं है कि देव ने उसे ढूंढने के लिए भाग दौड़ नहीं की थी... लेकिन धीरे धीरे उस दौर की कविताओं को पौ फटे तक गुनगुनाना उसकी नियती बन गया था... बिट्टू को सोचकर लिखी गई कविताएं अब फिल्मी गीत बन गईं थीं... देव अब तक बड़ा फनकार बन गया था... फिल्में बनाता था... बड़ा शायर हो गया था... देव मुंह में पेन दबाए फिल्म की कहानी सोच रहा था... कोरे कागज पर बीचों बीच लाइन खींचीं हुई थी... दाईं तरफ कहानी चल रही थी तो बाईं ओर एक इंच का हाशिया छोड़कर उसके विजुअल शॉट भी लिखता जाता था... तीन दोस्तों की कॉलेज लाइफ पर एक फिल्म की स्क्रिप्ट दिमाग में चल रही थी... पर मजा नहीं आ रहा था... कमरे में सिगरेट की गंध शाश्वत सी हो गई थी... और बिजी हूं, बाद में फोन करता हूं... ये देव का ब्रह्मवाक्य...
देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705

१७-९-०९

कॉन्ट्राडिक्शन- 2


दो आंखें हैं... एक जोड़ी होंठ... दो बाहें... कुल मिलाकर एक पूरा जिस्म है... कुछ और हिस्से हैं उस जिस्म के... कुछ उभरे हुए तो कुछ गहरे... जिस्म गीला है... मैं शायराना हूं... मैं रूहानी हूं... मैं जिस्मानी हूं...

एक जोड़ी बाहें एक और जोड़ी चाहती हैं...
एक जोड़ी आंखें अक्सर एक और जोड़ी तलाश लेती हैं...
एक जोड़ी होठों को शिकायत है एक और जोड़ी न मिलने की...
मुझे लगता है कि मेरे ही जिस्म में सरहदें खिंच गई हैं...

तुम्हारी शिकायतें अक्सर मुझे सुनाई देती हैं... तुम्हारे होंठ एक लम्हे के लिए कुछ भी नहीं बोलना चाहते... मैं अक्सर खामोश नहीं रह पाता... तुम कहती हो मुझे जीना नहीं आता... तब मुझे लगता है जीना जरूरी भी नहीं... तुम्हारी एक जोड़ी बंद आंखें नहीं बोलती और मुझसे अक्सर कह देती हैं कि मैं मैं जाहिल हूं... मैं तुममें डूब मरना चाहता हूं...

जिस्म बेलिबास नहीं है... होना चाहता है... दिल में दरिया है... दरिया में उथलपुथल है... कई लोग हैं... उथलपुथल से बेपरवाह हैं... बालों में भाप है... आंखों में खून है... रगों में लाली है... बस... रगों में सिर्फ लाली है...

मुझे रंग याद आते हैं... मुझे सर्दी का मौसम याद आता है... मुझे लता... रफी और मुकेश के गाने गुनगुनाने का मन करता है... तुम कहती हो मैं जमीन से जुड़ा हूं... मुझे लगता है कि तुम मुझे देसी कह रही हो... मैं फिर भी बोलता रहता हूं... तुम अक्सर खामोश रहती हो...

सब कुछ उल्टा पुल्टा है... जिस्म के चारों ओर शोर हो रहा है... कान परेशान हैं... वो कुछ सुनना नहीं चाहते... जिस्म बार बार सबको मना करना चाहता है... हाथ कानों को गले लगा लेते हैं... कानफोड़ू आवाजें हैं... सीने तक उतरना चाहती हैं... सीने के दरिया में उथलपुथल इसी वजह से है...

एक करवट एक नई सलवट बना देती है... मुझे सलवटें अच्छी नहीं लगतीं... मुझे बस तुम अच्छी लगती हो... सलवटों अक्सर सरहद बन जाती हैं... पड़ौसी सलवट शरारत करती है... पहली सलवट को शरारत पसंद नहीं है...

जिस्म को खामोशी पसंद है... जिस्म खामोश हो जाना चाहता है... जिस्म आवाजों से बेपरवाह है... कल ही किसी से सुना है कि जिस्म को अपनी शर्तों पर जिंदा रहना चाहिये... जिस्म को बाकी जिस्मों से फर्क नहीं पड़ता... जिस्म आजादी चाहता है... जिस्म गुलाम है...

ये सलवटें झगडालू हैं... जिस्म पंचायतें लगाता है... जिस्म चुगली करता है... जिस्म मौसम का मजा लेता है... जिस्म बुरे दौर को भूल जाना चाहता है... जिस्म खुदपरस्त है... जिस्म स्वार्थी है... जिस्म बेचैन जंगल को खूब गालियां देना चाहता है... फिर उसी जंगल में खो जाना चाहता है... जिस्म पहाड़ों पर जाना चाहता है... फिर संन्यासी हो जाना चाहता है...

आंखों को किताबें पसंद हैं... चेहरे को नकाब पसंद हैं... वैसे आंखों को आंसू भी पसंद है... लेकिन ओठ आजकल तौबापसंद हो गए हैं... रुह बेचैन जंगल में बेचैन है... पहाड़ों पर चली गई है... जिस्म खामोश है...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

१-९-०९

मैं तेरा, तेरी दुनिया का



अंगडाई लेते मेरे मैले ख्वाबों को
तूने छू लिया था हौले से...
जैसे पहले चुंबन सा स्पर्श था वो...
और मैं जी लिया था ज़िंदगी मेरी...

वो मोतियों की दुनिया थी...
हकीकत में ख्वाबों की दुनिया...
आंखों से झरती थी...
और गर्म पानी का फव्वारा बुझाता था
उस शहर की प्यास
मैं अजीब सा था उन दिनों...
इन अजीब सी बातों की तरह...

बादल के पीछे दौड़ता था मैं...
जमीन से उठाता था किरच
और उसकी चमक देखकर हो जाता था खुश...
उतना जितना आज नहीं होता सच के हीरे पाकर...
अजीब सा था उन दिनों...
मैं भूल जाता था भगवान का अस्तित्व
और मैं बन जाता था रक़ीब
तेरा... तेरी दुनिया का

मैं कुछ नहीं था... पर तेरे साथ था...
बहुत दिन बाद आज लौट आया है वो दिन
मेरे बदन में छिपकर बैठ गई है तेरी रुह...
और मैं फिर बन गया हूं तेरा दुश्मन
आहिस्ता आहिस्ता...


देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’
1-9-09

२७-८-०९

खोई हुई डायरियां नहीं मिलतीं... प्रेमिकाओं की तरह


डायरी नई है... किसी बात को कई हफ्ते बीत चुके हैं... किसी बात को शुरू होने में कई दिन हैं... हर लम्हा एक वक्त पुराना हो रहा है... अगला छण हर पल नया होना चाहता है... ऐसे में एक नई डायरी हाथ लगी है... कुछ लिखना चाहता हूं... काली स्याही से लिखूं... मेरी बात लिखूं... नीली स्याही से लिखूं... उसकी बात लिखूं... या अपनी बात काली से और उसकी नीली से... वैसे स्याही से क्या फर्क पड़ता है... फर्क तो लिखने से भी नहीं पड़ता... दीवाली वाले दिन मां कॉपियां मंगाती थीं... पिताजी पूजा करके उन पर रोली से स्वास्तिक बना देते थे... नई डायरी पर भी कुछ अच्छा लिखना चाहता हूं... तो पिताजी याद आ जाते हैं... नई डायरी से नई दोस्ती करना चाहता हूं... तो चाहता हूं कि नया बनकर मिलूं... पर पुरानी बातें जाती ही नहीं... लगता है कि जैसे सब नया खप गया है... सब नया खो दिया है... मुझे खूब जोर से रोने का मन करता है... ऐसा लग रहा है कि पुरानी डायरी से बेवफाई करूंगा... मुझे पूछने का मन कर रहा है कि आपको भी ऐसा ही दर्द होता है क्या पुराना कुछ खो जाने पर... कैसे दिन हैं ये... काम क्यों कर रहा हूं... सब चले गए हैं... फिर भी केबिन में क्यों जमा बैठा हूं... मैं किसका इंतजार करता रहता हूं यूं बैठा बैठा... खोई हुई डायरियां नहीं मिलतीं... प्रेमिकाओं की तरह

२६-८-०९

कॉन्ट्राडिक्शन-1


कई निगाहे हैं... उनमें में एक पुराने गुलदस्ते के सूखे गुलाब पर टिकी है... लेकिन एक वहां से हटकर किताबों की बेतरतीब अलमारी में कुछ ढूंढ रही है... इस निगाह को वो लावारिस खत नहीं मिल पा रहे हैं जो आवारगी के दौरान लिखे गए और वो बंजारे खत इन किताबों के हुजूम में कहीं छिपा दिये गए... अब ढूंढने से भी नहीं मिलते... बिस्तर पर कुछ गर्म सलवटें लेटी हैं... जिंदगी भर का आलस एक साथ अंगडाई ले रहा है... एक सलवट दूसरी को छू रही है... वो छुअन बहुत हसीन है...

अलाव है... आग है... सर्दी का मौसम है... हाथों की गुस्ताखी है... हाथ आग को चेहरा दिखा रहे हैं... एक शॉल में दुबकी दो जान बैठी हैं... एक के हाथ में पुरानी डायरी है... दूसरे के होठों पर प्यार के गीत हैं... बारिश हो के चुकी है... मौसम विज्ञानियों से बिना पूछे ही कोयले वाला बता गया है... कि बर्फ गिरेगी... बुरांश पर फूल नहीं आये हैं... बुरांश को न्यौता है... बर्फ नाज़ुक है... बुरांश पर झरने लगी है...

डायरी के पन्ने कई दिनों बाद उलटे हैं... हर पन्ने पर तारीख है... हर गीत में एक कहानी है... डायरी के पन्ने उड़ रहे हैं... शाल में दुबकी दो जान एक ही दिन में कई तारीखें पढ़ लेना चाहती हैं... आज की रात की कहानी फिर कभी गीत बनेगी... डायरी खुश है... जैसे आज के ही दिन के लिए सारे अर्से गीत बने थे...

एक जान को नींद आ रही है... वो दूसरी जान की गोद में लेट गई है... एक जान सो गई है... दूसरी सोना नहीं चाहती... आग को चेहरा दिखाता दूसरी जान का एक हाथ नर्म हो गया है... अब वो बालों में गुदगुदी कर रहा है... वो छुअन बहुत देर तक नहीं थकती... वो छुअन बहुत हसीन है...

बिस्तर की नर्म सलवटें अकेली हैं... नींद टूट गई है... चिपचिप है... उमस है... दिल्ली की गर्मी है... बिजली चली गई है... एसी बंद हो गया है... किताबें बेतरतीब हैं... एक निगाह फिर सूखा गुलाब देख रही है... दूसरी बेतरताब अलमारी पर अटकी है... एक पुरानी डायरी है... आग को चेहरा दिखा दिखाने वाले कठोर हाथों में आ गई है... गर्मी में पुरानी डायरी पंखा बन गई है... ज़ोर ज़ोर से हिल रही है... पंखे की तरह झल रही है... डायरी के पन्ने कई दिनों बाद उलटे हैं... हर पन्ने पर तारीख है... हर गीत में एक कहानी है... पन्ने जोर जोर से हवा में उड़ रहे हैं... हवा कर रहे हैं... डायरी से कुछ पन्ने रूखे फर्श पर गिर पड़े हैं... निगाहों की तलाश खत्म हो गई है... बंजारे खत मिल गए हैं... बेकारी का दौर है... दोपहर है... जिंदगी भर का आलस एक जान में भरा है...
इन दोपहरों की कहानी गीत नहीं बनती... खत वापस डायरी में ठूंस दिये गए हैं... डायरी फिर भर गई है...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9952717705

२५-८-०९

एंकर का कोट


नमस्कार, मैं हूं राहुल शर्मा... और आप देख रहे हैं टेलीविजन इंडिया... इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है आगरा के ताज महोत्सव से जहां भीषण आग लग गई है... आग में शिल्पियों के दो सौ से ज्यादा पांडाल जलकर खाक हो गए हैं... मौके पर दमकल की गाड़ियां पहुंच चुकी हैं... इस बीच खबर आ रही है कि कुछ लोग आग में फंसे हो सकते हैं... हमारे संवाददाता प्रशान्त कौशिक फोन लाईन पर हमसे जुड़ चुके हैं... प्रशांत क्या अपटेड है...?
असाइन्मेंट हैड आलोक श्रीवास्तव के चेहरे पर मुस्कान दौड़ रही थी... आउटपुट हैड शशिरंजन झा खुद पीसीआर संभाले हुए थे... ओवी पर शॉट आ गए हैं... जल्दी काटो... राहुल लाइव टॉस करो... हम सबसे पहले हादसे की सीधी तस्वीरें दिखा रहे हैं... खबर को बेचो... याद रखो खबर सबसे पहले हमने ब्रेक की है... शशिरंजन जी ने एंकर का टॉकबैक ऑन करके तमाम इंस्ट्रेक्शन एक सांस में दे मारे...
... और आपको सीधे लिए चलते हैं आगरा के ताजमहोत्सव में, जहां इस वक्त भयंकर आग लगी हुई है... इस वक्त आप अपने टेलीविजन स्क्रिन पर हादसे की पहली तस्वीरें देख रहे हैं... हम अपने दर्शकों को बता दें कि सबसे पहले ये खबर आप टेलीविजन इंडिया पर देख रहे हैं... और जैसा कि अभी हमारे संवाददाता प्रशान्त कौशिक बता रहे थे... आग में से चार शव निकाले जा चुके हैं... चारों शव इतनी बुरी तरह झुलस गए हैं कि उनकी शिनाख्त नहीं हो पा रही है... आग में शिल्पियों का तकरीबन एक करोड़ रुपये का माल जलकर खाक हो गया है... इस वक्त टेलीविजन स्क्रिन पर आप ताजमहोत्सव की आग की लाईव तस्वीरें देख रहे हैं... और हमारे साथ फोन लाइन पर जुड़ चुके हैं आगरा के एसएसपी जीपी निगम... निगम साहब, कैसे लगी ये आग? इतने बड़े जलसे के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किये गए थे... ?
एंकर की आवाज में अचानक जोश आ गया था... आउटपुट हैड बार बार टॉक बैक ऑन करके उसे याद दिला रहे थे कि ये तस्वीरें सिर्फ उन्हीं के चैनल पर दिखाई जा रही हैं... और राहुल हर बार और जोर से ये बात दर्शकों के सामने दोहरा रहा था...
प्राइम टाइम खत्म हुआ... भई वाह... छा गए... खूब बिक गई खबर... मार्केट मार लिया आज तो... एक्सक्लूसिव का टैग लगा लगा कर चलाई खबर... वैल डन राहुल... वैल डन... राहुल की जान में अब जान पड़ी... आउटपुट हैड औऱ एडिटर इन चीफ ने उसकी पीठ ठोंकी थी...
अरे सर... आगरा तो मेरा घर है... उस शहर की हर बारीकी जानता हूं मैं... आपने देखा कि कैसे लपेटा एसएसपी को सुरक्षा इंतेजामों के मुद्दे पर... एंकर ने टाई ढीली की... मेकअप रिमूव किया... आज की मजदूरी पूरी हो गई थी...
सर, शायद आपका फोन आ रहा है... मेकअप आर्टिस्ट ने राहुल को इशारा किया... राहुल हमेशा की तरह आज भी शो के बाद फोन का साइलेंट मोड डीएक्टीवेट करना भूल गया था... उधर पिताजी की भर्राई आवाज थी... अनर्थ हो गया बेटा... अंजली बुरी तरह से झुलस गई है... एट्टी पर्सेंट बर्न थी, जब हॉस्पीटल ले गए...
फोन के उस पार से जैसे शहर भर के रोने की आवाज आ रही थी... एंकर के कंधे से कोट उतर चुका था... एक आम आदमी अपनी बहन के लिए रो रहा था...
देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’
9953717705

४-६-०९

खबरी की पांच छहनिकाएं


दीवार पर गढ़ी कील,
दिल-दीवार,
बाकी तुम..!

बांस सा ज्वार,
फनकार,
बंसी की धुन!
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चुक गए सवाल,
सांस,
मोक्ष-

रंगीन पानी...
तेरा अक्स...
होश!
-----

आहट,
अकेलापन,
डर-

न तू,
न मां,
न घर!
-----

खारा सागर,
टूटी बोतल,
जिन्न-

कारे आखर,
कोरे कागज,
तेरे बिन!
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तड़पती भूख,
रेगिस्तान,
प्यास!

वादियां... झरना...
तू...
काश!
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देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705

२३-५-०९

दाग झूठे हैं...



सच सुंदर होता है...
और दाग अच्छे...
आज तक यही कहा है मैंने...
यही पढ़ा है...

मैंने इन दागों पर सुंदर कविताएं लिखीं,
और हर बार सुंदर धब्बों पर यकीन किया...
मैं डूबा रहा रंगों में...
गरारे करता रहा अपनी ही कविताओं के देर तक...

मैंने इंद्रधनुष को सुंदर कहा...
और समेटता रहा आंखों में सुंदर ख्वाब...
ये जानकर भी कि सुबह टूट जाएगी नींद...
और आंखों के झूठे ख्वाब भी...

सोता रहा मैं... आंखें मूंद कर
समेटता रहा सुंदर वादों का बोझ...
जैसे पोटली खोलूंगा तो सब बचा रहेगा...

मैं अक्सर बांधता रहा मुठ्ठी में किनारे की चमकीली रेत...
चुनता रहा फूल ये मानकर कि ये कभी नहीं मुरझाएंगे
मैं बटोरता रहा मुस्कान, शाश्वत खजाने की तरह...
पर मैं गलत था...

सब सुंदर चीजें सच नहीं थीं...
इंद्रधनुष बादलों का धोखा था...
मुस्कानों में दुनियादारी का फरेब था...
वादों में छिपी थी गद्दारी...

मेरी सब कविताएं झूठी थीं...
मेरे ख्वाब नकली थे...
अच्छे दागों की तरह...
अच्छे दाग झूठे होते हैं अक्सर...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705

५-५-०९

खबरी की एक गज़ल


हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का
अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का


छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी
जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का


फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही
कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का


होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में जा कर मर गए
अब सलीका खो गया है रंग लगाने का


हर रोज मुझसे घूंट भर- छूटता सा तू रहा
और जमाना चल पड़ा- हर चीज़ पाने का...


देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

२-५-०९

तुम डरो, तो डरो!



मेरे पद डगमग हैं... तो?
मेरी गति दुर्धर है... तो?
तुम अपनी फिक्र करो,
नसीहत मत दो...
मैं जानता हूं रास्ते टेड़े करना...
तुम अड़ो, तो अड़ो।

कर्मण्येवाधिकारस्ते...
रट लिया... रट लो!
छाले मेरे हैं...
फैसला तुम क्यों लेने लगो?
नींद, सपने, लाड़, चुंबन,
सपनों ने सब तो छल लिया,
मैं पिटूंगा, पर लड़ूंगा,
तुम डरो, तो डरो!

इश्क नहीं है कविता जैसा... तो?
भाव नहीं है राधा जैसा... तो?
तुम ढूंढो-फिरो... कन्हैया, राम, रसूल...
मैं जानता हूं... मैं बना रहना!
तुम खुदा बनो, तो बनो।

गर्म तवे पर,
बर्फ के डेले की तरह तड़पा हूं मैं...
हौसला करता हूं,
आग बुझेगी ये...
दही की हांड़ी में,
सहेजे सा जमा बैठा हूं...
उम्मीद में हूं,
दुनिया खट्टी होगी सब...

देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705

२१-४-०९

राष्ट्रपति भवन में कूड़ा डालना तथा पेशाब करना सख्त मना है...


जी हां... बात कुछ अटपटी लग सकती है... पर यकीन जानिये ये बात मैंने बिल्कुल बिना मोड़े-तोड़े और बिना शब्दों से खेले लिखी है... राष्ट्रपति भवन में वास्तव में कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगा हुआ है... और तो और कोई भारतीय सज्जन वहां दीवार की ओट लेकर या कोई कोना पकड़कर पेशाब भी नहीं कर सकता... मैं मजाक नहीं कर रहा हूं... बल्कि जो देखकर आया हूं, वही बता रहा हूं... एक बात और ये बात विदेशियों पर लागू नहीं होती... खतरा सिर्फ हिंदुस्तानियों से है इसलिए ये आदेश भी सिर्फ उन्हीं के लिए है... दरअसल हुआ यूं कि मैं अपने एक मित्र के साथ तफरी करने यूं ही राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया... और धूप कड़ी थी इसलिए मुख्य परिसर के ही अंदर किसी पेड़ की छांह लेने का मन किया... लेकिन देश के सबसे संवेदनशील स्थान पर हर जगह अपनी मन मर्जी तो चलाई नहीं जा सकती... इसलिए पूरे सम्मान से सभी सरकारी आदेशों का पालन करना भी जरूरी है... राष्ट्रपति भवन में एक ऐसे ही आदेश का बोर्ड दिखाई दिया... उसका मजमून यही था जो मैंने अक्षरश: इस पोस्ट के ऊपर लिख दिया है... ये आदेश मुझे कुछ अटपटा नहीं लगा... क्योंकि जैसे देश भर की दीवारें हकीम उसमानी या डॉक्टर शेखों के इलाज की गारंटियों से पटे रहते हैं... वैसे ही हमारी प्यारी दिल्ली में ‘यहां पेशाब करना मना है’ का आदेश कई क्रियेटिविटियों से गुजरता हुआ गधे के पूत यहां मत ... तक हो जाता है. कई जगह पर्यावरण, स्वास्थ्य और समाज के प्रति जागरूक लोग व्यक्तिगत पहल करते हुए दीवारों पर ये नेक नारे लिखते हैं तो कहीं कहीं कुछ बेहद समाज सेवी संस्थाएं ये काम करती हैं... लेकिन दिल्ली प्रशासन और सरकार को भी इस राष्ट्रीय परेशानी का इल्म है, और जगह जगह उसने इस काम में खुद भी भागीदारी की है... दिल्ली में लगभग हर चौराहे पर साफ सुथरे शौचालय हैं जो प्राय: साफ सुथरे ही बने रहते हैं... नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को छोड़ दें तो मैंने उनमें आते जाते लोग कम ही देखे हैं... प्रकृति-प्रेमी और खुली हवा में जीने की इच्छा रखने वाले हम खुले में ही करने के शौकीन भी हैं... लेकिन खुले खेल का ये डर राष्ट्रपति भवन तक में है ये मुझे नहीं पता था... अब ये भी जान लीजिये कि ये आदेश आया कहां से... रायसीना हिल्स को समतल करके वहां भव्य भवन तो अंग्रेज बना गये लेकिन वहां कूड़ा फेंकना मना है और गधे के पूत यहां मत ... लिखना वो भूल गए... अंग्रेजों की इस मिस्टेक को सुधारा है लोक निर्माण विभाग ने... वैसे प्रेशर वाली बात तो ठीक है लेकिन सरकार वाकिफ है कि हम राष्ट्रपति भवन तक में जाकर कूड़ा फेंकने तक की हिम्मत रखते हैं... एक बात और... ये आदेश सिर्फ हम हिन्दुस्तानियों के लिए ही है... मेहमानों को इससे छूट मिली हुई है... मेरा यकीन न हो तो फोटो को दोबारा ध्यान से देखें... दिल्ली में लगे अमूमन सभी आदेश हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में होते हैं... लेकिन इस महत्वपूर्ण जगह पर ये महत्वपूर्ण आदेश सिर्फ हिंदी में ही है... मैं समझता हूं इतना काफी है... आप समझ गए होंगे कि राष्ट्रपति भवन में कूड़ा फेंकना और पेशाब करना सख्त मना है...


देवेश वशिष्ठ खबरी

+91-9953717705

१९-४-०९

तुम खट्टी होगी...


तुम खट्टी होगी...
पर सच्ची होगी...
अभी छौंक रही होगी हरी चिरी मिर्चें...
खट्टे करौंदों के साथ...
या कच्ची आमी के...
या नींबू के...
या ना भी शायद...

नाप रही होगी अपना कंधा...
बाबू जी के कंधे से...
या भाई से...
और एड़ियों के बल खड़ी तुम्हारी बेईमानी
बड़ा रही होगी तुम्हारे पिता की चिंता...

तुम भी बतियाती होगी छत पर चढ़ चढ़
अपने किसी प्यारे से...
और रात में कर लेती होगी फोन साइलेंट...
कि मैसेज की कोई आवाज पता न चल जाए किसी को...
तुम्हें भी है ना...
ना सोने की आदत...
मेरी तरह...
या शायद तुम सोती होगी छककर... बिना मुश्किल के...
जब आना...
मुझे भी सुलाना...

गणित से डरती होगी ना तुम...
जैसे मैं अंग्रेजी से...
या नहीं भी शायद...
तुम लड़ती होगी अपनी मम्मी से...
पापा-भैया से भी,कभी कभी...
मेरी तरह...
पर तुम्हें आता होगा मनाना...
मुझे नहीं आता...
बताना...
जब आना...

तुम खट्टी होगी...
चोरी से फ्रिज से निकालकर
मीठा खाने में तुम्हें भी मजा आता होगा ना
तुम भी बिस्किट को पानी में डुबोकर खाती होगी...
जैसे मैं...
या शायद तुम्हें आता होगा सलीका खाने का...
मुझे भी सिखाना...
जब आना...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705

९-४-०९

नीली छांह...


नीली स्याही... नीला कागज...
नीला बादल... नीला दु:ख...
नीली आंखों वाली की हर याद बहुत नीली है...

नीला सरगम... नीला पंचम...
नीली बातें... नीला चुप...
नीले-नीले जीवन की हर सांस बहुत नीली है...

लिख-लिख कर कागज पर सपने,
आग लगाए हाथों से...
जलते नीले सपनों की ये आग बहुत नीली है...

अब सूरज का बंद हुआ है,
मेरे घर आना जाना...
और तभी से इस कमरे की रात बहुत नीली है...

नीले पत्ते... नीली खुशबू...
नीली मिट्टी... नीली छांह...
मेरे रोपे हर पौधे की शाख बहुत नीली है...

नीला हंसना... नीला रोना...
नीला नीला कह देना...
अक्षय-अक्षय तेरी-मेरी, जात बहुत नीली है...

देवेश वशिष्ठ खबरी...

८-४-०९

तुम गीत हो...


बिट्टू, तुम गीत हो...
तुम्हें मैंने नहीं लिखा,
खुद लिख गए तुम,
हर्फ-हर्फ अपने आप...
मैंने तुम्हें नहीं गाया,
तुम खुद रहे जुबान पर,
मीठी-मीठी लोरी से...
मैं बेसुरा था,
तुम खुद बन गए सरगम,
और निकलते रहे मेरी जुबान से...
तुम गीत हो,
वियोग का...
जिसने मुझे सिखाया,
अहसास ऐसे किया जाता है...
संयोग का,
जिसने बताया कि जीया ऐसे जाता है...
तुम एक प्यार भरा नगमा हो,
जिसे मैंने अपनी सबसे ऊंची आवाज में गाया है...
तुम गीत हो,
जिसे सबसे आसानी से गाया जा सकता है...
तुम प्रीत हो, जिसे हमेशा-हमेशा निभाया जा सकता है...
तुम सौगंध हो,
जिसके लिए मुझे कभी आडम्बर नहीं करना पड़ा...
तुम जीत हो,
जिसके लिए मुझे कभी नहीं लड़ना पड़ा...
तुम गीत हो उत्साह का,
जिसने मुझे हमेशा हौसला दिया है...
कि रुकना नहीं है,
हारना नहीं है...
जीना है
और जीत लाना है तुम्हें...
तुम गीत हो, गाना है तुम्हें...

देवेश वशिष्ठ खबरी

९-३-०९

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-12


देव तुम मुझसे शादी करोगे? कितना मजा आयेगा ना- मैं रोज तुम्हें सताऊंगी- और तुम रोज मुझे चुड़ैल कहा- मैं बिल्कुल बुरा नहीं मानूंगी- अच्छा एक काम करते हैं- सुरकंडा देवी के मंदिर चलते हैं- वहां पर हम शादी कर लेंगे- ठीक है ना- तुम दुल्हन बन जाना और मैं दूल्हा बन जाऊंगी- फिर सुरकंडा माता के सामने की पहाड़ी पर टहलेंगे- बर्फ में खूब कूदेंगे- कितना मजा आयेगा ना- चलो ना देव- अभी चलो- तुम ना कभी नहीं सुनते- चलो ना-

बिट्टू- देव झुंझला जाता था- वो गंदा था- बिल्कुल गंदा- वो प्यारी सी बिट्टू को डांट देता था- जोर से- कभी कभी तो सबके सामने- पर बिट्टू फिर भी कुछ नहीं कहती थी- रात के करीब 2 बजे थे- देव देर रात घर लौटा था और कानों में आई पॉड का ईरयपीस लगा कर सो जाता था- देव कटता जा रहा था- घर से- समाज से- अच्छाईयों से- बुराईयों से- देव सबसे कट गया था- रेडियो पर पर रेखा का गाना बज रहा था- हम भूल गये सब बात- मगर तेरा प्यार नहीं भूले- देव, बिट्टू को भूल नहीं पा रहा था- चाहकर भी- लेकिन आज हिचकियां नहीं आयीं- देव को ये अच्छा नहीं लग रहा था- हर रोज देर रात तक आने वाली हिचकियों की आदत पड़ गई थी उसे- लेकिन आज शायद ज्यादा देर हो गई थी- शहर में बड़ी घटना हो गई थी- प्राइम टाइम लंबा खिंच गया- एंकरिंग के बाद कुछ नेता टाइप लोगों के साथ चाय नाश्ता हो गया था- और उसके बाद अगले दिन की प्लानिंग- इस बीच एक आध बार हिचकी आईं थीं लेकिन शायद काम में ध्यान नहीं रहा- वैसे देव ने बिट्टू पर कभी ध्यान दिया भी कहां- फोन भी करती तो वही- याद भी करती तो वही- देव को तो बस हिचकियां आतीं थीं- पर आज रेखा के गाने ने उसे फिर वादियों की याद दिला दी थी- हम भूल गये हर बात- मगर तेरा प्यार नहीं भूले- बिट्टू की जिद आज बार बार याद आ रही थी- ‘देव चलो हम शादी कर लें’- काश उस दिन चिड़चिड़े देव ने उस दिन मना न किया होता- न कहा होता कि ‘हथेली पर सरसों नहीं जमती बिट्टू’- वक्त लगता है- और बिट्टू बोली- देव ये हथेली पर सरसों कैसी होती है- क्या उस सरसों के फूल भी उतने ही ताजा होते होंगे- और वो सरसों उगती कैसे होगी- उस सरसों का साग बन पाता होगा ना- अच्छा छोड़ो ये बताओ वो सरसों पक जाती होगी तो क्या होता होगा- देव बताओ ना कौन उगाता होगा हथेली पर सरसों- उसके फूल भी तुम्हारी तरह हंसते होंगे ना- नहीं तुम्हारी तरह नहीं, मेरी तरह- वैसे भी तुम तो कम कम हंसते हो ना- उस पर ओस की बूंदें कैसी अच्छी लगती होंगी ना- उसके फूल कभी नहीं रोते होंगे ना- देव बताओ ना- तुम हमेशा चुप क्यों रहते हो- देव न तब कुछ बोलता था और न अब बोल रहा था- पता नहीं किस मिट्टी का बना था देव- बिट्टू सुरकंडा देवी जाने की जिद करती और देव टहला देता- कहानी बहुत लंबी है लेकिन पहले मैं आपको सुरकंडा देवी के बारे में बता दूं- मसूरी से टिहरी की ओर जाते वक्त पड़ता था सुरकंडा देवी का मंदिर- ये जगह बिट्टू को बहुत पसंद थी- सुरकंडा देवी के मंदिर से शुरू हो जातीं थी धनोल्टी की बर्फ और लंबे लंबे बॉज, बुराश औऱ चीड़ के घने जंगलों से लदी ढकी पहाडियां- बिट्टू सुरकंडा देवी के मंदिर तक पैदल चली जाती थी- पहाड़ों की चढाई और ढलान उसका खिलौना थीं-

कभी देव ने उसे थककर सुस्ताते नहीं देखा- और देखा भी हो तो क्या पता- देव किसी भी चीज पर ध्यान ही कहां देता था- अजीब सा था देव- पर ये जगह देव को भी बहुत अच्छी लगती थी- धनौल्टी के चीड़ के पेड़ों से सर्दियों के बाद पीली बारिश होती थी- और देव बिट्टू का मजाक बनाता- देखो बिट्टू तुम्हारे चंदा मामा पुष्प वर्षा कर रहे हैं- बिट्टू को धनौल्टी मसूरी से ज्यादा खूबसूरत लगती थी- एक तो इसलिये कि वहां कम लोग जाते थे- दूसरा इसलिये भी कि यहां अभी ज्यादातर चीजें अनछुई थीं- ज्यादातर पेड़ों को अभी टूरिस्ट की नजर नहीं लगी थी- पहाड़ियों पर कुरकुरे के रैपर नहीं होते थे- और बारिश में रोड के बीचों बीच हर 100 मीटर पर झरने बन जाते थे- बिट्टू उनमें खूब छपाक छपाक करती थी- देव मैदानों में रहने वाला था- इसलिये ठंड से डरता था- लेकिन बिट्टू मस्त मौला थी- बीमार हो जाती और ठीक भी- लेकिन देव बीमार कम ही होता था- लेकिन वो हमेशा उस मस्ती से रह जाता था- हालांकि मन देव का भी बहुत करता था- पर फिर भी...

मसूरी से सुरकंडा देवी के मंदिर तक जाने में लगता जैसे पृकृति के जितने रंग संभव है वो सब यहां बिखरे थे- पता नहीं धरती पर कितनी जगह स्वर्ग है- लेकिन देव के साथ जब बिट्टू वहां घूमने जाते थे- तो सारी मसूरी- पूरा धनोल्टी और हर पहाड़ पर मस्ती छा जाती थी- सिर्फ देव को छोड़कर- कितना बोर है ना देव- पर न जाने क्यों बिट्टू को वही अच्छा लगता था- धनौल्टी में घूमने फिरने के लिए पर्यटक कम ही जाते थे- तब तक भीड़ भाड़ से दूर था धनौल्टी- आज भी हो शायद- पर मुझे तो जमाना हो गया घनोल्टी गये- देव बिट्टू से तो कुछ नहीं कहता था लेकिन मुझे वहां के किस्से सुनाया करता था- मुझे देव से जलन होने लगी थी- जब आता तभी लगता था कि और तरोताजा हो गया है देव- अब ये पहाड़ी हवाओं का असर था या बिट्टू का प्यार- लेकिन देव तब खुश रहता था- उसके कानों में ईयर फोन पर गाने नहीं बजते थे- तब वो खुद गुनगुना लेता था- जोर जोर से- चीख चीख कर- और एक बार भी बिट्टू नहीं कहती थी- बस करो देव- बहुत बेसुरा गाते हो तुम- रास्ते भर अंताक्षरी चलती थी- और तीन घंटे का सफर कैसे कट जाता था पता ही नहीं चलता था- धनोल्टी तक पहाड़ बहुत ऊंचे हो जाते हैं- लेकिन देव और बिट्टू के मन में शायद ही कभी आया हो कि इतने लाचार हो जाएंगे- उनका कद इन पहाड़ों के सामने बहुत छोटा रह जायेगा- आसमान छूते देवदारों ने देव को कभी नहीं चिढ़ाया था- लेकिन अब देव की आंखें कहीं कहीं ही उठती थीं- देव पागल सा होता जा रहा था- और लोगों ने ये कहना भी शुरू कर दिया था- यहां देव को कविता लिखने के लिए कभी कोई कल्पना करने की जरूरत नहीं पड़ी थी- अब देव को लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है- ओफ्फो... मैं आपको धनोल्टी के बारे में बता रहा था फिर बात फिर घूमकर देव और बिट्टू पर घूम गई-
आजादी से पहले तक मुसाफिर घूमने फिरने के लिए धनौल्टी नहीं जाते थे। यहां टिहरी नरेश की इस्पेक्शन बिल्डिंग थी। सन् 1950 में टिहरी नरेश की रियासत हिन्दुस्तान में मिल गई और धनोल्टी की इस्पेक्शन बिल्डिंग को तहसील बना दिया गया- धनौल्टी तहसील में नायब तहसीलदार के संरक्षण में सभी सरकारी कार्य होते हैं। लेकिन सर्दियों में धनौल्टी में इतनी ठंड पड़ती है कि वहां रुक पाना मुश्किल हो जाता है इसलिये ये तहसील ब्लाक मुख्यालय थत्यूड में स्थानांतरित हो जाती है- छोटा सा है धनोल्टी- मसूरी से भी छोटा- देव और मसूरी जब यहां की गलियों में दौड़ लगाते थे तब यहां सरकारी ऑफिस के नाम पर एक तहसील- एक बैंक- एक छोटा सा पोस्ट ऑफस और एक जूनियर हाईस्कूल है. यहां की मूल आबादी भी सिर्फ चार पांच सौ ही थी- सब एक दूसरे को जानते थे- वैसे आबादी ज्यादा भी होती तो भी शायद सब एक दूसरे को जानते- मैंने पहले भी बताया था ना- पहाड़ी नदियों में कचरा नहीं होता- अभी यहां के लोगों में दुनियादारी हावी नहीं हुई है- सर्दियों में धनौल्टी में 2-3 फुट तक बर्फ पड़ती है- कई बार तो यहां एक सीजन में 8-10 बार तक बर्फ पड़ती है। यही मौसम बिट्टू को बुलाता था- बार बार... बार- बार... और वहीं पास में था सुरकंडा देवी का मंदिर- धनौल्टी जाने वाले पर्यटक सुरकंडा माता के दर्शन करने जरूर जाते थे- बिट्टू कहती- देव सुरकंडा माता से जो मांगो पूरा हो जाता है- पता नहीं उसने क्या मांगा था- और अगर कुछ मांगा भी था- तो वो उसे मिला क्यों नहीं?
जारी है-
देवेश वशिष्ठ खबरी- 09719432410

६-३-०९

मेरा स्वर्गवास


एक सपना देखा अभी,
आधी रात को
और फिर नहीं लगी आंख...
अब धुंधला सा याद है बस
सीढ़ीदार खेत थे पहाड़ियों के...
और एक ढलान पर एक गांव
सीढ़ियों के रास्ते वाला गांव
टूटी सीढ़ियां... पहाड़ी लाल पत्थरों की
बीच में कुछ घर थे...
बुरांश के पेड़ों से ढंके...
एक हाथी था...
उस पर इंद्र...
उसकी शक्ल मिलती थी मुझसे बहुत कुछ
वो स्वर्ग था...
आज रात में फिर स्वर्गवासी हुआ...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

गीली- गीली...


मुझे फेंक दिया किसी ने वहां से
शायद चुक गये थे मेरे पुण्य पिछले जन्मों के
या शायद मंहगा था वो स्वर्ग
मिट्टी के कुल्हड़ों वाला...
गर्म दूध वाला...
चढ़े और ढ़ले रास्तों वाला...
उस पहाड़ी का वो गीला मौसम
बहुत याद आता है...
और तुम भी,
गीली- गीली...
-----------------
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

ये वादा रहा...


तुम्हारी याद को लिख लेता हूं सबके लिये
ये सोचे बगैर कि सब सवाल करेंगे
और निरुत्तर हो जाऊंगा मैं...
तुम्हारी याद को रख लेता हूं बटुए की उस जेब में...
जहां रखा है शगुन का सिक्का,
कि पर्स खाली न रहे कभी...
तुम्हारी याद को सी लिया है आज
फटे घाव के साथ...
कि तुम मिल जाओ मेरे खून में...
और अगले जन्म में...
बेटा बनूं तुम्हारा...
या
तुम बेटी मेरी।
ये वादा रहा...
------------------
देवेश वशिष्ठ खबरी

१५-१२-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-11



वादियां... मेरी आवारगी की कहानी (10) की पुरानी पोस्टें यहां से पढ़ना शुरू करें-
देव घर लौट आया था.
क्यों? उसने मुझे नहीं बताया-
देव मुझसे सारी बातें छुपा जाता था. पर मुझे पता था. वो बहुत कुछ भूल आया था. भुलक्कड़ था देव. देव को कुछ भी याद नहीं आता था. वो स्कूल- स्कूल का रिशेप्शन- करनपुर की हलवाई की वो दुकान- ढलान की दूध जलेबी- पांच रुपये के स्टीम्ड और दस रुपये में फुल प्लेट फ्राइड मोमोज़- गांधी बाबा का पार्क- पार्क की बेंच- सर्वे चौक- कदमताल- एक रुपये के सिक्के वाला पब्लिक टेलीफोन, जिससे बातें करने के लिए देव को सब्जी वाली आंटी से रुपये तुड़वाने पड़ते थे- उसके बराबर वाली दुकान की चाय भी देव भूल गया था- देव सब कुछ भूलता जा रहा था- भुलक्कड़ हो गया था देव- याद नहीं आता था और न ही उसके खत- ये जानते हुए भी कि वो घरवालों की नजर में आ जाएंगे, वो उन्हें अपनी एक पुरानी किताब में रखकर भूल गया था- भुलक्कड़ जो ठहरा देव-

काश बिट्टू भी इतनी भुलक्कड़ हो जाती- काश राधा इतनी भुलक्कड़ होती- कितना आसान होता है भूलना सब कुछ- और फिर लोग पूजते... कन्हैया की तरह- पागल थी राधा- रोये जाती थी और उसे याद रहता था दुनिया के देव से किया वायदा- आंसू मत गिराना राधे- जैसे प्रेम निवेदन नहीं आदेश हो कोई- या निवेदन भी- लेकिन स्वार्थ से भरा- राधा रोएगी- तमाशा खड़ा होगा- मुश्किल हो जाएगी- लोग क्या कहेंगे- राधा से उसके रोने की वजह जानेंगे- भेद खुल जाएगा- सो कन्हैया भुलक्कड़ हो गया- कन्हैया सब भूल गया- पनघट से लेकर प्रियतम तक को- कान्हा भी भुलक्कड़ था देव की तरह- कन्हैया योगी हो गया- और राधा रोती रही जिंदगी भर- कन्हैया ने अपने सारे भार उतार दिए- बिना किसी कचोट के रुक्मणी जैसी 64000 पत्नियों के बाबजूद कान्या योगी बने रहे- महान थे कान्हा- एक झटके में सब भूलने की कला भी उन 64 कलाओं में से एक रही होगी जिसके लिए कान्हा का प्रताप था- कन्हैया के स्वार्थी वचन का वजन जिंदगी भर उठाती फिरी राधा और फिर गुम हो गई- राधा ने कभी कन्हैया को तकलीफ नहीं दी- कभी उसकी जिंदगी में नहीं लौटी- पर क्या हुआ? उस देवाधीश को क्या फर्क पड़ता- वो तो योगी था- दुनिया भर को भोगने के बाद भी वो विरक्त था- इसी विरक्ति को तो पूजती है दुनिया- इसी विरक्ति को पाने के लिए ही तो इतने आडम्बर किये जाते हैं- पर राधा प्रेयसी थी- वो राजनीति- रणनीति और धर्मनीतियां नहीं जानती थी- शायद थोड़ी बहुत जानती भी हो- पर कान्हा के गूढ़ प्रेम ज्ञान को वो अनपढ़ कैसे समझती- ये ज्ञानी लोग बहुत खतरनाक होते हैं- ब्राह्मणों की तरह- भोज करते हैं- दक्षिणा भी लेते हैं- और फिर चरण भक्ति भी कराते हैं- राधा कान्हां से फिर कभी नहीं मिली- कभी अपने हक की आवाजें उसने नहीं उठाईं- न कान्हा की प्रेयसी होने के महत्व का कभी फायदा उठाया- वियोग के सर्ग के बाद वो कभी नहीं दिखी- बेबकूफ थी राधा- बिट्टू की तरह- कान्हा भुलक्कड़ नहीं था- वैरागी नहीं था- स्वार्थी था वो- उसके सीने में कभी रुलाई नहीं आई- उसकी वजह से कभी राधा को हिचकियां नहीं आईं पर देव कैसे किसी को बताता कि हर रात उसे इतनी हिचकियां क्यों आतीं हैं- भुलक्कड़ जो ठहरा- सब भूल गया था देव-

मेरा अध्ययन थोड़ा कम है- इसलिए नहीं पता कि किसी मंत्रशास्त्र में राधा की सुंदरता का भी कोई वर्णन है क्या? लेकिन इतना जरूर कहूंगा, रुकमणि ज्यादा खूबसूरत रही होगी- देव का प्रेम भी सुंदरता और वैभव की कसौटी पर कसा जाने लगा था- घर में रिश्ते के लिए हर रोज मेहमान आने लगे थे- रोज मेज पर प्लेटें बिस्किटों से भरी जातीं थीं- और देव बेशर्म हंसता हुआ चेहरा लेकर उनके पास चला जाता था- फिर उसके इंट्रोडेक्शन का रिवाज शुरू होता था- पिताजी उस वक्त चारण-भाट हो जाते थे- छायावादी कवियों की तरह उन्हें उसमें कोई दोष दिखाई नहीं देता था- तारीफों के पुल बांधने लगते थे- देव दिल्ली में तमाम प्रतिष्ठित चैनलों में बड़े पदों पर नौकरी कर आया था- एक से बढ़कर एक जॉब अपोर्च्युनिटी देव की चौखट पर खड़ी रहीं थीं- पर कितना बड़ा वैरागी था देव- सब पर लात मार आया- पिताजी सच छिपा जाते थे- भगोड़ा हो गया था देव- कृष्ण की तरह- रणछोड़- देव की छलांगे नकली थीं- वो खुद से भाग रहा था- भागकर देव सोचता था कि सारे झंझटों को वहीं छोड़ आया है- विरक्ति का नया तरीका ढूंढ निकाला था देव ने- पिताजी को देव में कोई बुराई नज़र नहीं आती थी- सिर के उड़ते बाल- सर्वाइकल स्पोंडियोलाइटिस- देव बीमार था- बिट्टू जानती थी- इसीलिए उसे उसकी ज्यादा फिक्र रहती थी- देव को शादी के लिए लड़कियों के फोटो दिखाए जाने लगे थे- एक से एक खानदानी उसके दरवाजे पर आने लगे थे- बिट्टू तो अकेली थी- पहाड़ी की मुड़ती हुई ओट सी- बिट्टू भी राजनीति नहीं जानती थी- पहाड़ी नदियों में कचरा नहीं होता, जब तक मैदान में नहीं आ जातीं- बहन के हाथों में देव को रिझाने के लिए फोटो होते थे- पर सब के सब क्लोज अप- देव उनमें बिट्टू को ढूंढता था- उसके उन हाथों को ढूंढता था जो दर्द से कराहते उसके कंधे की बिना कहे मालिश कर देते थे- देव को सिर्फ क्लोज अप दिखाए जाते थे- उनमें देव को बिट्टू जैसी तस्वीरें तो मिल जाती पर बिट्टू जैसे हाथ नहीं- देव उन निगाहों को ढूंढता था जो देव को सर्दी से बचाने के लिए सपने बुनते थे- अपराधी था देव- पता नहीं बिट्टू क्यों ऐसे देवों को माफ कर देतीं हैं- पता नहीं क्यों राधाएं क्यों खामोशी से रोती रही- बेबकूफ थी राधा- बिट्टू की तरह- पर आज देव का भला रुंध रहा था- देव को बिट्टू की बहुत याद आ रही थी- आज हिचकियां भी बहुत आ रहीं थीं, और देव सोच रहा था- सवेरे ड्यूटी जाना है- ये बिट्टू कब सोएगी- कब सोने देगी-

जारी है-
देवेश वशिष्ठ खबरी

१५-९-०८

एक हवेली, एक कहानी


पुरानी हवेलियां बूढ़ी औरतों की तरह होती हैं. इठलाते बचपन की तरह किसी ने उन्हें प्यार से उठाया. जवान अल्हड़ नक्काशियां की. उनकी चुनरी पर धानी, नीले, लाल, और चटख रंग भरे. उन नशीली हवेलियों ने वो दौर भी देखा जब बुढ़ापे में उनके दरवाजे की रौनक कम होने लगी. राजस्थान के राजपूताना किले, शाही छतरियां और रेगिस्तान में बाबड़ियां इतिहास की गाढ़ी मोटी जिल्द में लिपटी किसी कहानियों की किताबों के पन्ने की तरह लगती हैं. पर हर हवेली की देहरी और हर देहरी का चौबारा एक-एक कहानी है. जो अब भी वैसे ही सुनी जा सकती है. उस कहानी के पात्र दीवारों से अब भी चिपके हैं. भित्ति चित्र बनकर.
राजस्थान की जमीन पर कई जगह प्रकृति ने उजास रंग नहीं भरे तो राजस्थानी आवारगी ने सतरंगी रंग में सराबोर ‘सवा सेर सूत’ हर सिर पर बांध लिया. रंगों की इसी चाह ने रेतीले मटीले राजस्थान के हर घर को हवेली बना दिया और हर दीवार को आर्ट गैलेरी.
राजस्थान का शेखावाटी ‘ओपन आर्ट गैलेरी’ कहा जाता है. चूरू, झुंझनू और सीकर जिलों को मिलाकर एक शब्द में ‘शेखावाटी’ कहने का रिवाज है. इसी शेखावाटी में झुंझनू जिले का नवलगढ़ हर सुबह सूरज से रंगों की तश्तरी लेकर हर घर को हवेली बना देता है.
नवलगढ़ में तकरीबन 700 छोटी-बड़ी हवेलियां हैं. अगर सिर्फ भव्य और बड़ी हवेलियों की बात करें तो भी 200 का आंकड़ा तो पार हो ही जाएगा. नवलगढ़ की हवेलियों के बारे में सुना था. पर जब देखने पहुंच गया तो लगा कि सावन का अंधा हो गया हूं हर तरफ सिर्फ रंग दिख रहे हैं. दीवारों पर उकरे रंग. छतरियों पर छितरे रंग. छज्जों में छिपते रंग. आलों में खोए रंग. राजा रंग. दासी रंग. सैनिक रंग. सेठिया रंग. अगर मुझे कोई दोबारा व्याकरण गढ़ने की इज़ाजत दे दे तो इन हवेलियों में बैठकर मैं रंगों को यही नाम दे सकूंगा.
जितने रंग उतनी हवेलियां. जितनी हवेलियां उतनी कलाकारी. और जितनी कलाकारी उतनी कहानियां. ‘जित देखूं, तित तूं’ हर गली में हवेली. हर घर हवेली. मोरारका की हवेली... पोद्दार की हवेली... सिंघानिया की हवेली... गोयनका की हवेली... जबलपुर वालों की हवेली... जोधपुर वालों की हवेली... कलकत्ता वालों की हवेली... सेठ जी की हवेली... सूबेदार की हवेली... राजा की हवेली... हर मौसम की हवेली... जैसे पुराना रोम जूलियर सीजर जैसे उपन्यासों से झटके से बाहर उतर पड़ा है और हर काला हर्फ एक हवेली बन गया है.

नवलगढ़ के इस रंगमहल से जब दोबारा चेतना में आया तो पहला सवाल उठा- किसने बनवाईं इतनी हवेलियां. एक साथ... एक जैसी... और यहीं क्यों... इतनी सारी...
वहां के लोगों से पूछा- जितने मुंह उतनी कहानी... हर कहानी की अलग वजहें... और हर वजह के अपने अपने सवाल... खबरी मन नहीं माना तो किताबें कुरेदनी शुरू कीं. किसी ने बताया कि यहां से सिल्क रूट गुजरता था. दो सदी पहले तक यहां 36 करोड़पतियों के घराने थे. एक हवेली बनी. दूसरी बनी. तीसरी... चौथी और फिर पूरा शहर बस गया. खाटी हवेलियों का शहर. शेखावाटी के लिखित अलिखित इतिहास के जानकारों के मुताबिक पन्द्रहवीं शताब्दी(1443) से अठारहवीं शताब्दी के मध्य यानी 1750 तक शेखावाटी इलाके में शेखावत राजपूतों का आधिपत्य था. तब इनका साम्राज्य सीकरवाटी और झुंझनूवाटी तक था. शेखावत राजपूतों के आधिपत्य वाला इलाका शेखावाटी कहलाया. लेकिन भाषा-बोली, रहन-सहन, खान-पान, वेष भूषा और सामाजिक-सांस्कृतिक तौर-तरीकों में एकरूपता होने के नाते चुरू जिला भी शेखावटी का हिस्सा माना जाने लगा. इतिहासकार सुरजन सिंह शेखावत की किताब ‘नवलगढ़ का संक्षिप्त इतिहास’ की भूमिका में लिखा है कि राजपूत राव शेखा ने 1433 से 1488 तक यहां शाशन किया. इसी किताब में एक जगह लिखा है कि उदयपुरवाटी(शेखावाटी) के शाशक ठाकुर टोडरमल ने अपने किसी एक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के स्थान पर भाई बंट प्रथा लागू कर दी. नतीजतन बंटवारा इतनी तेजी से हुआ कि एक गांव तक चार-पांच शेखावतों में बंट गया. यही भूल झुंझनू राज्य में भी दोहराई गई. इस प्रथा ने शेखावतों को राजा से भौमिया(एक भूमि का मालिक) बना दिया. झुंझनू उस वक्त के शाशक ठाकुर शार्दूल सिंह के पांच पुत्रों- जोरावर सिंह, किशन सिंह, अखैसिंह, नवल सिंह और केशर सिंह की भूमियों में बंट गया. नवल सिंह का नवलगढ़ उसी भाई बंट प्रथा का ही एक नमूना है. केन्द्रीय सत्ता के अभाव ने सेठ-साहूकारों और उद्योगपतियों को खूब फलने फूलने का मौका दिया. हवेलियों के रंग पहले संपन्नता के प्रतीक बने, और फिर परंपरा बन गये. खेती करते हुए किसान से लेकर युद्ध करते सेनानी तक. रामायण की कथाओं से लेकर महाभारत के विनाश तक. देवी- देवताओं से लेकर ऋषि-मुनियों तक... पीर बाबा के इलाज से लेकर रेलगाड़ी तक... हवेली की हर चौखट, हर आला रंगा-पुता. इंसान की कल्पना जितनी उड़ान भर सकती है, इन हवेली की दीवारों पर उड़ी. जो कहानी चितेरे के दिमाग पर असर कर गई वो दीवार पर आ गई. जो बात दिल में दबी रह गई, उसे हवेली की दीवारों पर रंगीन कर दिया गया... लेकिन एक दिन तेज़ हवा चली और उस रंगीन किताबों के कुछ पन्ने जल्दी जल्दी वक्त के साथ उड़ गए. हवेली मालिकों ने हवेली छोड़ दीं. कोई विदेश चला गया तो कोई हवेली अनाथ हो गई. जैसे एक हवेली को देखकर दूसरी बनी थी बिल्कुल उसी तरह एक पर ताला जड़ा तो दूसरी हवेलियों के दरवाजे भी धड़ाधड़ बंद होने लगे. शेखावाटी की हवेलियों के रंग फीके पड़ने लगे हैं. अचानक जैसे इठलाती हवेलियां बूढ़ी हो गई हैं. इन बूढ़ी मांओं को सहारे की ज़रूरत है. जो इन्हें देखे... देखभाल करे.
(ये लेख तहलका हिंदी पर भी छपा है, यहां पढ़ें)
देवेश वशिष्ठ खबरी
9811852336

४-९-०८

वादियां मेरी आवारगी की कहानी X

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ठंडी होती चाय कितनी बेसब्र होती है. जैसे धीरे धीरे प्राण जा रहे हों और जिसके लिए जीवन लगा देने का व्रत लिया है वो बेपरवाह हो गया हो. देव नए दफ्तर जाता है और सवेरे की चाय का पहले कप में से अचानक जैसे कोई पहाड़ी जिन निकलता है और उसे खूब चिढ़ाता है. उसके होठों पर भी वैसी ही प्यासी मटमैली पपड़ी पड़ जाती है जैसी ठंडी होती चाय पर होती थी. थोड़ी देर बाद जिन चुपचाप फिर उसी कप में उतर जाता है और खाकी मटमैली पपड़ी में छिपकर जोर जोर से रोने लगता है. देव उससे ध्यान हटाता है और लबादे की तरह डेस्क पर पड़े अखबारों पर सरसरी नज़र दौड़ाता है. पर खबरों के काले काले अक्षरों बड़े बड़े दाड़ी मूछ वाले राक्षसों की तरह उसे डराने लगते हैं. हर खबर में वो देहरादून-मसूरी को ढूंढता है. कुछ नहीं मिलता तो अखबारों की रद्दी से मितली सी होने लगती है. उसके भी होंठ सूखने लगे हैं. वो कम्यूटर पर कुछ टाइप करना चाहता है पर कीबोर्ड से एक परी निकलकर जादू कर देती है. कोई बटन काम नहीं करता. वो जोर जोर से बटन दबाता है. अचानक वो देखता है कि वर्ड फाइल पर कुछ लिखा है. एक ही नाम. बार बार. बिट्टू का नाम. उसने चाय का कप उठाया और पपड़ी के पीछे के रोते जिन समेत पी लिया. जिन अंदर जाकर फिर परी बन गया है. उस परी के हाथ में फुलझड़ी है उसका चेहरा जाना पहचाना है. बिल्कुल वैसा जैसा वो भट्टा फाल के पास छोड़ आया था. उसके दूसरे हाथ की उंगली में चोट लगी है. बिट्टू रो रही है. और असाइनमेंट डेस्क की लड़की देव को देख देखकर हंस रही है. देव को लगता है कि उसका रूप रंग बदल रहा है. उसके कपड़े गेरूए हुए जा रहे हैं. उसकी दाड़ी अचानक बढ़ गई है. उसने बाल बढ़ गये हैं और मसूरी की किसी बेशर्म आवारा पहाड़ी ने अभी तक आंखें नहीं मूंदीं हैं. उसने एक बरगद के पेड़ को भेजकर उसके लंबे बालों में दूध मल दिया है. असाइनमेंट डेस्क की वो लड़की अभी तक हंस रही है. वो बार बार कनखियों से उसे देख रही है. देव को उसकी इस हरकत से गुस्सा आ रहा है. क्यों उसे नहीं मालूम. पर ये लड़की भी उसे मसूरी की उसी पहाड़ी की तरह लग रही है. जिसे कभी भी शर्म नहीं आई. जिसने कभी आंखें नहीं मूंदी. जो चुपचाप आने वाली खामोशी में अचानक छींक पड़ती थी. बिट्टू अचानक सहम जाती. और वो निर्जन पहाड़ी फिर हंस देती. कभी कोई कोयल बोलती थी तो अच्छी लगती थी. लेकिन शायद ये लड़की बिल्कुल अच्छी नहीं है. देव को घुटन हो रही है. उसे प्यास लग रही है. वो ट्रे से ढंके पानी को देखता है. वो झरना बन जाता है मीठे पानी का झरना. बिल्कुल भट्टा फॉल के पानी की तरह. देव कुछ समझ नहीं पा रहा. उसे पसीना आ जाता है. वो ऑफिस बॉय पर झल्लाता है. एसी ऑन करने को कहता है. अचानक गिलास के पानी से वही परी फिर बाहर आती है. धीरे धीरे पंखा झलती है. अब देव को राहत मिल रही है. सब सामान्य हो जाता है. असाइमेंट डेस्क की लड़की उठकर वहां से चली जाती है. देव को थोड़ी दम आती है. वो पानी का गिलास उठाता है. एक घूंट पीता है. पर पानी एकदम खारा है. जैसे किसी के आंसू पी रहा है. वो घबराकर गिलास रख देता है. परी फिर गायब हो जाती है. उसकी दाड़ी-मूंछें अपने आप हट जाती हैं. गेरुए कपड़े फिर पेंट शर्ट बन जाते हैं. की बोर्ड फिर काम करने लगता है. ऑफिस बॉय जिन वाला चाय का कप ले जाता है. खारे आंसू का गिलास फिर मीठे पानी से भर जाता है. असाइनमेंट की लड़की फिर आकर अपनी जगह बैठ गई है. लेकिन वो जटाधारी जोगी भागकर लंबी सांस के साथ देव के अंदर दाखिल हो जाता है. देव को लगता है जैसे उसे किसी मंदिर का महंत बनाकर यहां भेज दिया गया है और उसके प्राण वहीं पहाड़ों की किसी गुफा में रह गए हैं. वो परी उसकी आंखों में आ गई है. और अलिफ लैला की कहानियों के जान वाले तोते की तरह वो अपनी नज़रों को दुनिया से छिपाए फिर रहा है.

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336
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१८-८-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी IX

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ये ढलान है. दूसरी निगाह से देखो तो चढ़ाई भी कह सकते हो. दो रास्ते हैं और दोनों की ओर निगाहें भी लगी हैं. देव को लौटना है. बिट्टू को भी. देव अभी देहरादून जाएगा और फिर वहां से दिल्ली. बिट्टू वापस मसूरी चली जाएगी. भट्टा फॉल के ऊपर चाय की दुकान पर बैठे बैठे सुस्ती आने लगी है. यहां से मसूरी 10 किलोमीटर ऊपर है और दून कोई 20 किलोमीटर नीचे. एक ही रास्ते से दो अलग अलग बसें आएंगी. एक जाने के लिए आएगी और दूसरी आने कि लिए यहां से जाएगी. बातों में दिखने जैसा कोई घुमाव फिराव नहीं है. हाथ छूट रहे हैं. आंखें थोड़ी देर पहले तक गीली थीं. अब सूख गई हैं. चाय एक बार फिर ठंडी हो गई है, बस का बेसब्र इंतजार बता रहा है कि दोनों को जल्दी है कि हाथ कब छूटे. नहीं यहां मैं गलत लिख गया. हाथ पकड़े रखने की कोई जोर जबर्दस्ती नहीं है पर वास्ता इतना नया भी नहीं कि झटके से छूट जाए. एक ओर ऊंचाई है तो दूसरी ओर गर्त. और मजबूरी ऐसी कि जाना होगा. ऊंचाई की तरफ भी और घुमावदार गहराई में भी बैचेनी है. पर बस है कि आ ही नहीं रही. देव को आज वो दिन याद नहीं आ रहे हैं जब हर शनिवार की शाम को देहरादून रेलवे स्टेशन के बाहर से मसूरी जाने वाली बस में बिट्टू को बैठाता था और तब तक इंतजार करता जब तक बस किसी मोड़ तक जाकर ओझल न हो जाती. यूं तो वहां से टैक्सी भी जाती थीं मसूरी के लिए. लेकिन टैक्सी पर उसे भरोसा नहीं था. अगर मजबूरी में कभी टैक्सी से जाना भी पड़ता तो कई बार ऐसा हुआ था कि वो बिट्टू के साथ खुद मसूरी तक गया और फिर स्याह रात में आखिरी लौटती बस से देहरादून लौटकर आता. घुमावों पर कहीं बिट्टू का जी न मिचलाने लगे इसलिए जेब में ठेर सारी क्लोरोमिंट लेकर जाता. घंटे भर के छोटे से सफर से पहले घंटे भर तक नुक्ताचीनी चलती. हिदायतों का सिलसिला चलता. लेकिन आज खामोशी थी. देव दिल्ली जा रहा था. हमेशा के लिए. होठों से कुछ निकलते नहीं बन रहा था. घबराहट बाहर निकल निकल कर थक चुकी थी. सारी औपचारिकताएं हो गईं थीं. देहरादून से मसूरी जाने के लिए दो बसें मिलती थीं, एक मसूरी की लाइब्रेरी तक जाती थी तो दूसरी पहाड़ी के दूसरी ओर पिक्चर पैलेस तक. बिट्टू को इसी बस का इंतजार होता था. मसूरी का एकमात्र पिक्चर हॉल तो बंद हो चुका था लेकिन उसके नाम पर चौक और बस अड्डे का नाम पिक्चर पैलेस पड़ गया था. बस की सड़क के घुमाव से उतरती बस की आवाज आई. बिट्टू की आंखों में ठहरे से आंसू अचानक छलक गए. जैसे अचानक लबालब कटोरे की ज़मीन हिल गई हो. ‘देव, तुम्हारी बस आ गई.’ खामोशी टूटी. निगाहें फिर मिलीं. बस मिलाने की हिम्मत नहीं हुई. ‘हां’, चलता हूं, तुम कैसे जाओगी? आज पहली बार ये सवाल देव ने बिट्टू से पूछा था. आज से पहले कभी नहीं हुआ कि देव को छोड़ने से पहले देव ने जाने की बात की हो. बिट्टू ने देव के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, तुम चले जाओ देव, मैं मैनेज कर लूंगी. बिट्टू ने देव के माथे को झांकते हुए से कहा. ‘नहीं, तुम्हारी बस आ जाने दो. मैं बाद में चला जाऊंगा.’ देव का मन नहीं माना. खैर ये भी नुक्ताचीनी ही थी. पर वैसी नहीं जैसी रोज होती थी. थोड़ी देर बाद बिट्टू की बस आ गई और उसके थोड़ी देर बाद देव की. उस रोज़, उस वक्त क्या हुआ, ये बताया नहीं जा सकता इसलिए मैं भी नहीं बता रहा. पर बिट्टू ने चलते चलते बस एक बात कहीं, देव अब जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा. उस दिन देव की आंखें और गला एक साथ पहली बार भरा था, वो पहला दिन था जब उसका दिलेर होने का ढ़ोंग काम नहीं आया. बस में बैठते ही वो फफक पड़ा. दो बसें दो दिशाओं में जा रहीं थीं. कुछ ही देर में दूरियां काफी बढ़ गईं थीं.
जारी है...
देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’

9811852336

८-८-०८

कोई मरता क्यों नहीं


वो पहाड़ी अभी तक जिंदा है...
नहीं फटी उसकी छाती इस बारिश में भी...
शायद इसीलिये लोग उसे पत्थरदिल कहते हैं...
वो जिंदा है ये सुनने के बाद भी
कि मैंने उसे छोड़ दिया ..
अभी भी वहीं बहती है नदी...
उसी तरह... सुना मैंने
उसकी गति में आज भी पुकार है...
गालियां नहीं...
ये जानने के बाद भी
कि अब मैं कभी नहीं बैठूंगा उसके पास
पैर लटकाकर उसके साथ
पार्क का फव्वारा रो रहा है वैसे ही
पर उन आंसुओं जैसा नहीं...
जो बहते रहे दिल- दिल में,
पर दिखे नहीं कभी उस दिन के बाद
मेरी तरह...
पर खुलकर उड़ा रहा है वो माखौल
मेरे उन वादों का
जो वहीं पास की बेंच पर बैठकर किये थे मैंने...
रात अब भी नहीं मरी...
उस पर तरस खाकर...
एक भी तारा नहीं टूटा आज
उसके दिल की तरह
जिसे छोड़ दिया मैंने
दुनिया से डरकर...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

२५-७-०८

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी VIII

वादियां मेरी आवारगी की कहानी की पिछली किश्तें पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें- वादियां मेरी आवारगी की कहानी-I,II,III,IV,V,VI,VII
इंसान, वक्त, युग, मन और जज्बात कब और कैसे बदलते हैं ये भी बिल्कुल अबूझ सी पहेली है... बिल्कुल देव और बिट्टू के रिश्ते की तरह... और बिल्कुल म्यार के पहाड़ की तरह... देहरादून के पास ही है टपकेश्वर महादेव मंदिर... रविवार की छुट्टी होती तो देव का सवेरा यहां बीतता और शाम गांधी मैदान में... इंदू किसी इतिहासकार की तरह बताती उत्तराखंड की राजधानी के गौरवशाली इतिहास के बारे में... उसकी बातें सुनकर देव को आश्चर्य भी होता और मज़ा भी आता... आश्चर्य इसलिये कि छुटपन से ही आसाम के बोर्डिंग में पली-बढ़ी लड़की को यहां के बारे में इतनी ज़मीनी जानकारी किसने दी... और मज़ा इसलिये आता कि वो उसे वहां से जुड़ी पौराणिक कहानियां उसे ऐसे सुनाती थी जैसे वहां की टूरिस्ट गाइड हो... एक बार टपकेश्वर महादेव के दर्शन किये तो एक अनकही सी हामी हो गई कि इतवार की हर सुबह यहीं बीतेगी... दिन भर वहीं झगड़ते... बातें करते... समझते... समझाते और शाम होते वापस आ जाते... गुफा के भीतर भगवान भोलेनाथ के पिंडी दर्शन करने के बाद, सिर पर पल्लू रखे इंदू देव को प्रसाद देती और देव चुपचाप दोनों हाथ फैला देता... देव को कोई भरोसा नहीं था भगवान के अस्तित्व पर... घर से निकला तो देव पूरी तरह नास्तिक हो गया था... पर इसे देव भूमि का जादू कहें या बिट्टू का असर... नास्तिक देव इस जगह आया तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि भोले बाबा के दर्शन नहीं किये हों...


चाहें तब जब वो बिट्टू के साथ था, या तब जब बिट्टू उसके लिए एक कहानी बन गई... खैर उस वक्त इंदू देव की बिट्टू के साथ साथ टूरिस्ट गाइड भी थी... मंदिर के पीछे घाट की सीड़ियों पर बैठकर उथली नदी में पैर डाले इंदू बोली... पता है देव देहरादून का पुराना नाम द्रोणाश्रम था और द्वापर युग में पांडवों तथा कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य यहां तपस्या के लिए आये थे... उन्होंने यहीं, इसी गुफा में कठोर तपस्या की थी... और तब भोलेनाथ ने स्वयं उन्हें दर्शन दिये थे... तभी से इस मंदिर का नाम तपकेश्वर महादेव हो गया... इंदू की ये मायावी सी बातें देव की समझ में तो नहीं आती थीं पर उसके मुंह से कहानी की तरह सुनने में मज़ा खूब आता था... उथले पानी में छोटी छोटी मछलियां उनके पैरों के इर्द- गिर्द इकठ्ठी हो जाती तो देव पैर हटा लेता... पर इंदू के ठंडे पानी में पैर डाले रहती...
अरे मेरे बुद्दू पायलेट... अगर इस दुनिया में जब तक आप किसी को कोई नुकसान न पहुंचाओ, तब तक कोई किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता... उसकी इस बात को सुनकर देव पहाड़ी नदी के पानी में दोबारा पैर तो डाल देता पर उसकी नादानी पर हंसी खूब आती... घर से इतनी दूर दुनियादारी देखने के बाद भी उसकी ये बात वास्तव में नादानी ही लगती थी... देव कभी ज्यादा नहीं बोलता था... उसे बस सुनने में मज़ा आता था... इंदू बोलती रहती और देव मजे से सुनता रहता... ये वो दिन थे जब किसी बात पर किसी का कोई झगड़ा नहीं होता था... सच कहूं ऐसी कोई बात ही नहीं होती थी, जिसमें झगड़े की कोई गुंजाइश बचे... जब वो छोटी मछलियां पैरों से टकराने लगी तो देव बोला... बिट्टू ये पानी गन्दा हो गया है... शायद... बात में छिपी बात से बेफिक्र इंदू फिर शुरू हो जाती... हां, सो तो है... इंदू ने सहमति जता दी... लेकिन फिर चहकी और बोली... देव जानते हो, इस नदी में कभी दूध बहता था... इससे भी एक कहानी जुड़ी हुई है... एक बार द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को बहुत भूख लगी और उनसे वो दूध की जिद करने लगा... द्रोणाचार्य तो सब कुछ छोड़कर पहाड़ पर तपस्या करने आ गये थे... वो उसके लिए दूध का इंतजाम नहीं कर पाये... पर अश्वत्थामा भी जिद का पक्का था... वो भी अपने पिता के साथ तपस्या करने लगा... भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर यहां दूध की नदी बहा दी... पर कलयुग में ये नदी सूख गई और इसमें बरसाती पानी बहने लगा... पर ये गन्दगी तो यहां आये लोगों ने फैला कर रखी है... दुनिया भर से यहां दर्शन करने आते हैं, और यहां पर फैला देते हैं गंदगी... इसीलिए देव मुझे भीड़ बिल्कुल भी पसंद नहीं है... पर आजकल तो जहां देखो वहां आदमी ही आदमी... हर तरफ भीड़ भरी हुई है...
क्यों तुम्हें आदमी पसंद नहीं हैं... देव ने पूछा...
इंदू देव की आंखों में झांकी और बोली- नहीं... मुझे खामोशी पसंद है... पर तुम्हारे साथ...
फिर तो हो गया... मेरे साथ तुम कभी खामोश रहती हो... जब देखो तब पक पक पक पक...
दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े... पानी की मछलियां अब देव को डरा नहीं रही थी... अब गुदगुदी हो रही थी....
जारी है...
देवेश वशिष्ठ खबरी
9811852336

२७-६-०८

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी VII


वािदयां- मेरी आवारगी का कहानी की पिछली कड़ियां पढ़ने के लिए यहां क््लिक करें-
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वक्त गुज़रा और इंदू शहर के रंग में रच बस गई... घर में मोहब्बत मिले न मिले, उस पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था... लेकिन घर के सवाल परेशान करते तो नौकरी की जुगाड़ में देहरादून आ गई... मैं कहानी को बिना ज्यादा घुमाए फिराए आपको ये बता दूं कि आगे इंदू उसी स्कूल में फ्रंट ऑफिस पर जॉब करने लगी जहां देव पढ़ाता था... मैं कहानी को यहां भी ज्यादा नहीं मोड़ूंगा कि उस दिन क्या हुआ होगा जब देव ने उसी लड़की को दोबारा देखा जिसे उसने आपा खोकर थप्पड़ मार दिया था... यहां आप जो भी कहानी गड़ लें आपकी मर्जी... लेकिन उस दिन एक बात ज़रूर हो गई... पहली बार गुरूर छोड़कर देव को लगा कि माफी मांगने से भी सुकून मिलता है... लंच के वक्त इंदू कैंटीन में गई... देव के साथ बैठी और बिना कुछ कहें चुपचाप खाना खाया... इस पूरे दौरान न तो देव की हिम्मत कुछ बोलने की हुई और न ही इंदू ने कुछ कहा... शाम हुई तो इंदू ने देव से पूछ लिया---- तो क्या क्या देखा आपने देहरादून में...
कुछ खास नहीं... सच कहूं तो कुछ नहीं...
देव के दिमाग में अब तक वो चीतल वाली बात ही चल रही थी...
क्या... हाऊ बोरिंग आर यू... इतनी सुंदर जगह और कुछ नहीं देखा...
इंदू ने बड़े अचरज से कहा
दरअसल वक्त ही नहीं मिला... हां कभी कभी शाम को टहलने गांधी पार्क चला जाता हूं... पास में ही है... आप यहीं रहती हैं क्या... देव ने पूछ लिया...
नहीं यहां तो मैं बस टाइमपास करने आई हूं... मेरी मम्मी मसूरी में रहती हैं... तो उस दिन तुम यहां जॉइन करने आ रहे थे...
हां... उस रात का मलाल मुझे आज तक है...
कोई बात नहीं... अगर वो तुम वो थप्पड़ नहीं मारते तो शायद आज हम दोस्त नहीं बन पाते... चलो मैं तुम्हें देहरादून घुमाती हूं...
बस यही से एक सीधी सच्ची सी लव स्टोरी शुरू होती है... लेकिन ये कहानी आगे जाकर बड़े गुल खिलाने वाली है... कहानी तो चलती रहेगी... इंदू के बहाने चलो तुम्हें देहरादून भी घुमा दूं... हालांकि अभी देव के रेस्ट हाउस पर इंदू का आना जाना शुरू नहीं हुआ है पर मैं बता दूं कि कॉलेज के पास ही करनपुर में देव कॉलेज के रेस्ट हाउस में रहता है... एकदम अकेला... करनपुर के पास ही है सर्वे चौक... और सर्वे चौक के आगे गांधी मैदान और उसके बाद घंटाघर... अरे इस बीच एक और जगह है... परेड ग्राउण्ड... याद रखना ये सारी जगह पूरी कहानी में बार बार आएंगी... घंटाघर से देहरादून में हर जगह जाने के लिए विक्रम टेम्पो मिलते हैं... और देर तक देहरादून में देव के साथ घूमने के बाद यहीं से ५ नं. के ऑटो में बैठकर इंदू अपनी मामी के घर चली गई... ज़ाहिर सी बात है कि इंदू देहरादून में जॉब कर रही है तो मसूरी से रोज़ ३५ किलोमीटर का सफर करके तो आएगी नहीं... उस दिन से जो सिलसिला शुरू हुआ कि हर दिन.... कॉलेज के बाद रोज शाम एक घंटा इंदू और देव गांधी पार्क में जाने क्या क्या बतियाते रहते... न वहां देव का कोई और था और न कोई इंदू को मिल सका था... थीं पर इंदू को फुआरे के किनारे वाली लोहे की बेंच ही पसंद थी... देव कम बोलता था... इंदू सब कुछ बताती... अपने बारे में, अपने दोस्तों के बारे में... चंद्रमा से अपने रिश्ते के बारे में... इंदू चांद की ओर इशारा करके बोलती... पता है ये मेरा सबसे अच्छा दोस्त है... मैं इंदू और ये चांद... बिल्कुल एक से... पता है मैं जब भी परेशान होती हूं या किसी से दिल की बातें करने का मन करता है तो इसी को सब बता देती हूं... ये कभी नहीं कहता कि कितना बोलती हो... मैंने इससे कभी कुछ नहीं छिपाया... इसे सब पता है... सब कुछ... ये भी कि आसाम में उस लड़के ने जब मुझे प्रपोज किया था तो मैंने भी हां कर दी थी... पर उसी दिन मुझे पता चला कि वो मेरी क्लासमेट पर भी लाइन मार रहा था... और उस दिन देव मैंने जो दिया न उसके खींचकर... उसे जिंदगी भर याद रहेगा... कहते कहते इंदू खिलखिलाकर हंस पड़ी... इंदू की यही आदत थी... हर माहौल में वो हंसने का बहाना ढूंढ लेती थी... ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने इंदू को किसी से नाराज़ देखा हो... इस लड़की को किसी से कोई शिकायत नहीं थी... बात करती तो खुलकर... हंसती तो पूरी खिलकर... लगता जैसे गांधीजी की मूर्ती के सामने लगा फुआरा उसकी हंसी के साथ और ऊंचा हो जाता था... और उसकी दो बूंदे बातों बातों में उसके बालों को छू जातीं और पार्क की लाइट में चमकने लगतीं तो... देव को इंदू का साथ अच्छा लगने लगा था...
जारी है...
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देवेश वशिष्ट 'खबरी'
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२०-६-०८

वादियां मेरी आवारगी की कहानी- VI

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी की पुरानी किश््तें यहां पढ़े-

जब अपने पिता को इंदू ने पहली बार देखा ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा हिन्दी फिल्मों में दिखाया जाता है... इंदू न रोई न चिल्लाई... अपने पिता से ये उसकी पहली पहचान हुई थी लेकिन बिल्कुल ठंडी और निर्जीव... बोर्डिंग की पढ़ाई पूरी हो गई थी... नाते रिश्तेदारों ने इंदू की मां से कहा तो उसे वहीं रोक लिया... शूरू में सारे रिश्ते नाते इंदू को अजब सी बनावट लगते... पर वादियों की रानी मसूरी में उसके पैर जैसे ही घर से बाहर पड़ते, दिमाग का सब ऊहापोह मिट जाता... मसूरी की एक खास बात मैं आपको बताता चलूं... शिवालिक की पहाड़ियों पर बसे मसूरी की एक खासियत है... यहां एक ही वक्त में अलग अलग मौसमों का मज़ा लिया जा सकता है... अगर मसूरी में पहाड़ के एक तरफ सूरज मेहरबान हो रहा होता है तो मुमकिन है कि जहां से उस पहाड़ी का घुमाव शुरू होता है वहां की सड़क पर बारिश हो रही हो... एक ही वक्त में धूप छांव का अजब खेल चलता है इस जादूई शहर में... हालांकि बहुत छोटा सा है मसूरी... देव जब भी बिट्टू से मसूरी घूमने की जिद करता था तो वो तपाक से यही कह देती थी... अरे मसूरी है ही कितना बड़ा... वो तो में तुम्हें बातों बातों में घुमा दूंगी... और फिर शुरू हो जाती थीं इंदू की बातें... देव, देखो ये गनहिल है ना, यहां से वो धनोल्टी दिखती है... औऱ वो दूर... वहां दूरबीन से जो छोटे छोटे झंड़े दिख रहे हैं ना... लोग कहते हैं कि वहां पांडवों ने तप किया था... देखो ना देव यहां के बंदर कितने मोटे मोटे और झबरीले हैं... पता है इनके झबरीले बाल इन्हें यहां की ठंड़ ये बचाते हैं... और उधर कैम्टीफाल... नहीं वहां नहीं जाएंगे... वहां बहुत भीड़ रहती है... यहां पास में भट्टा गांव में एक और झरना है... वहां कोई नहीं जाता... और- और तुम कभी बुद्धा मोनेस्ट्री गये हो... पता है... वहां पांच सौ सीढ़ियां हैं... और वो भी एकदम खड़ी... पर मैं तो दो मिनट में वहां चढ़ जाती हूं... पर तुम थक जाओगे... और पता है यहां से परसों एक जीप खाई में गिर गई थी...और देखो देव ये नीचे हमारा स्कूल... यहां मैं बच्चों को पढ़ाती हूं... यहां ना एक बड़ा प्यारा सा बच्चा है... बिल्कुल तुम्हारी तरह... हे भगवान, कितना बोलती थी बिट्टू... कि घूमना छोड़ो उसे चुप कराने में ही वक्त गुज़र जाता था... ओफ्फो... मैं फिर विषय से भटक गया... अभी देव और इंदू की प्रेम कहानी शुरू ही नहीं हुई और मैं उनके घूमने की कथा सुनाने लगा... अभी तो देव इंदू की जिंदगी में आया ही नहीं है... पर क्या करूं उसकी कहानी है ही इतनी आजाद कि उसे सिरे से बांधना मुश्किल है... हां तो मैं कह रहा था कि इंदू को मसूरी की खूबसूरती भा गई थी... इसीलिए उसका वहां मन भी लग गया... सवेरे सवेरे पैदल पैदल दूर पहाड़ी पर निकल जाती... उसे भीड़-भाड़ से चिढ़ सी हो गई थी... वो इंदू जो आसाम में सबसे शरारती थी... बंदिशें तोड़कर जीने में जिसे मज़ा आता था... वो अकेलापन ढूंढने लगी थी... वक्त इंसान की सूरत और सीरत कैसे बदल दे कोई नहीं जानता... शायद इसीलिए कहते हैं कि कल क्या होगा... कैसा होगा... किसी ने नहीं देखा...

जारी है...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

३-६-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी (5)

वादियां मेरी आवारगी की कहानी के पिछले हिस््से यहां पढ़े-
वादियां मेरी आवारगी की कहानी- I, II, III, IV



आगे...

देव की नई नई नौकरी लगी थी... दिल्ली की तंग दिली से निकलकर देहरादून की वादियों के बीच जा रहा था... ये भी एक सफर था, जो जारी था... हाथ में किताब थी... महाश्वेता देवी की हज़ार चौरासीवें की मां... पहले चार पन्ने पढ़कर ही मन खराब हो गया... इसलिए नहीं कि किताब खोटी थी... इसलिए कि चार पन्ने ही इतना असर कर गए कि बाकी पढ़ने की हिम्मत नहीं बची... बस का लम्बा सफर भी उबाऊ था... मोबाइल के एफ एम में कुछ किलोमीटर पहले तक दिल्ली और मेरठ से आ रहे रेडियो स्टेशनों के गाने साफ साफ सुनाई दे रहे थे... रात थी... बाहर का कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था... जब इंसान माहौल से न जुड़ पाए तो ऊब होती है... और इस से निज़ात पाने का तरीका है कि या तो पूरी तरह माहौल में रम जाओ... या पूरी तरह अपने में खो जाओ... और कोई तरकीब नहीं है बचे रहने की... हां एक और है... सो जाओ... देव ने सोने की कोशिश की... पर न जाने किन ऊबड़ खाबड़ रास्तों से गुजर रही थी बस... ऐसे में कहीं नींद आती है... पहली जनवरी थी... ठंड थी... और इसीलिए बस में ज्यादा भीड़ नहीं थी... वैसे भी मैदानी लोगों को तो पहाड़ियां और वादियां गर्मियों में ही याद आती हैं... भरी सर्द रात में कोई मसूरी का रुक कोई क्यों करे... पर नौकरी का मोह और मजबूरी जो न करवा दे कम है... मेरठ और देहरादून के बीच एक रेस्तरां है चीतल... सफर करती ज्यादातर बसों के ब्रेक यहीं लगते हैं... बस रुकी... रात के कोई दो बजे थे... मुंह से धुंआ निकल रहा था... एक ऊनी शॉल लेकर चला था घर से... देव ने शॉल पहले नेहरू स्टाइल में कंधे से कमर की ओर लपेटी... ठंड ठिठुराने लगी... तो सर ढंकते हुए शॉल में लगभग दुबक सा गया... अब स्टोरी में क्लाइमेक्स आ रहा है... यही जगह है जब कहानी ध्यान से पढ़ी जाय... उससे पहले से अगर आप ध्यान लगा रहे हैं तो ये आपकी श्रृद्धा है, पर इतनी बात तो आपको वैसे भी समझ आ जाती, जो सरसरी पढ़ जाते... खैर... हुआ यूं कि इधर देव की बस चीतल पर लगी... उधर इंदू की बस भी वहीं आराम कर रही थी... ये वो वक्त है जब देव पहली बार इंदू को देखेगा... और यहीं से इंदू के बिट्टू बनने की कहानी लिखी जाएगी... यूं तो देव को भूख जोरों की लगी थी... पर ऐसी गजब ठंड में अगर किसी चीज़ की जरूरत और तलब लगी तो वो थी... एक गर्मागरम चाय की प्याली... कहानी से हटकर मैं आपको एक जानकारी दे दूं... अगर कभी देहरादून की तरफ जाना हो तो चीतल रेस्त्रां पर ज़रूर रुकें... और रुकें तो वहां चाय का ज़ायका ज़रूर लें... ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है... चीतल की चाय बड़ी मज़ेदार होती है... इसलिए बाकी काउंटर भले खाली पड़े रहें... इस सरकारी ढाबे के चाय के काउंटर से चाय लाइन लगाकर ही मिलती है... उस वक्त चीतल पर कोई चार पांच बसें रुकी थी... कहने का मतलब ये है कि भीड़ बहुत थी... और ठंड इतनी ज्यादा थी तो आज चाय का काउंटर कैसे खाली होता... देव भी लाइन में लग गया... आप ज़रा अनुभव कर कर देखे... जबर्दस्त ठंडी रात हो, सफर का माहौल हो... और चाय की तलब लग उठे... ऐसे में इंतज़ार कहां होता... वो भी लाइन लगाकर... खैर देव इंतजार कर रहा था... अपनी बारी का... बस आधे घंटे के लिए रूकी थी... अगर इतनी ठंड में आपको आधे घंटे के लिए रात के ढाई बजे खुले जंगल में बने जंगल में रेस्त्रां छोड़ दिया जाय तो पता चलेगा कि कितने आधा घंटा कितने घंटों का होता है... पर यहां ये वक्त सिर्फ एक चाय का कूपन भर लेने में ही गुज़र गया... बारी आई... देव काउंटर तक पहुंचा... पैसे दिये... पर यहां जो कुछ हुआ उससे ठंड में भी माहौल गर्म कर दिया... लाइन से हटकर एक लड़की ने लपककर... काउंटर बॉय से कूपन छीना, और काउंटर पर पैसे रखते हुए थैंक्यू भैया कहकर निकल गई... देव इस हरकत पह पहले पहल तो हक्का बक्का सा रह गया... पर जब उसे बस का हार्न सुनाई दिया तो अपने गुस्से को वो काबू में नहीं रख पाया... दांत पीसता हुआ वो उस बदतमीज़ लड़की के पास पहुंचा और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता एक जोरदार थप्पड़ लड़की के कान पर रसीद हो चुका था... थप्पड़ मारने के बाद देव सकपका भी गया... गुस्सा जो न करवा दे... गुस्से में आदमी कुछ सोच कहां पाता है... बस कर जाता है... मैंने आज तक यही नसीहतें पढ़ी सुनी है कि गुस्से पर काबू रखना चाहिए... या गुस्से में आदमी पर शैतानियत हावी हो जाती है... लेकिन देव के सर पर हावी हुआ शैतान तुरंत भाग भी गया... सच कहूं तो अचानक हुई हरकत के बाद देव डर गया था... ज़रा सोचिए, सरेआम... पब्लिक प्लेस पर कोई लड़का किसी लड़की को थप्पड़ मार दे... उस लड़की के घरवाले... मौजूद लोग क्या उसे छोड़ देंगे... थप्पड़ उस लड़की को पड़ा और देव सन्न रह गया... इस सर्द रात में अपने पिटने का यकीन कर देव को पब्लिक के तुरत रिएक्शन का इंतज़ार था... और रिएक्शन हुआ भी... भीड़ में पहले तो एक ज़ोरदार ठहाका गूंजा... फिर खुसुरपुसुर शुरू हो गई... कोई सामने नहीं आया... न भीड़ से... न लड़की के घर से कोई... लड़की के हाथ से चाय का कूपन छूटकर गिर गया... आंखों से दो बूंद भी... उसने एक नज़र देव को देखा... जैसे इसके बाद भी सॉरी कह रही हो... जैसे पुराना गाना बज उठा हो... गुस्से में जो निखरा है उस हुस्न का क्या कहना... कुछ देर अभी हमसे तुम यूँ ही ख़फ़ा रहना... गाड़ी का हॉर्न फिर बजा... एक मिनट भैया... वो ज़ोर से चिल्लाई और बस की तरफ भाग गई... देव की बस अब भी वहीं खड़ी थी... बिना मुसाफिरों के... ठंड... चाय की तलब... सब गायब हो गई थी... अब बस कुछ बचा था... तो मलाल... रास्ता भर... वैसे मलाल और भी ज्यादा होता अगर उसे ये पता होता कि जिस लड़की को उसने थप्पड़ मारा है उसका बाप कल ही मरा है और वो उसे ही आखरी बार देखने जा रही थी...

जारी है...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

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२६-५-०८

पेन की स्याही, सूखी तो समझ आया...


प्यासा छोड़ कर
एक बार फिर
थम गई बारिश
और बेचारा संमदर.. बह गया सब...
रातभर की नींद को,
गिरवी रखा है...
और दिन की चांदनी को पी गया रब...
फिर मिलेगी तंग छुट्टी,
घूम आऊंगा...
दूर... बहुत दूर... वहीं पर रह गया सब...
ज्यों नुकीली बालियां
गेहूं की, सोने की...
टकटकी में ही रहा... और कट गया सब...
मां का, पिताजी का,
बहनों- दोस्तों का
ना पता ये सारा हिस्सा... छंट गया कब...
पेन की स्याही सूखी
तो समझ आया...
स्याह सा एक दौर था... और खप गया सब...
दूर सीसा था...
और बीच में बादल
रोशनी जब ना रही तो... छंट गया सब...
किताब तूने दी मुझे
दर्दों के गीतों की...
तोहफा था पहला इसलिये यूं रट गया सब
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852337

२४-५-०८

वादियां-मेरी आवारगी की कहानी- IV



५.
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आप कहेंगे कि तीन चार पन्ने कहानी पढ़ गये और लेखक बार बार कह रहा है कि आप अभी कहानी पढ़ेंगे... अभी कहानी शुरु होगी... पर आखिर वो शुरु कहां से होगी... सच बताऊं तो मुझे भी नहीं पता कि ये कहानी कहां से शुरू होगी... कहां खतम होगी... क्योंकि लेखक ने ये कहानी जल्दी लिखना शुरु कर दिया है... और कहानी तो अभी चल ही रही है... ये कुछ देर के लिए आप इसे इंटरटेन्मेंट चैनलों पर आने वाले आज के सोअपेरा की तरह पढ़ें... जो चलते जाते हैं... बेसिर पैर... बिना हिसाब किताब के... बिना कहानी किस्से के... और बिना मतलब के... पर उनमें भी अपना मज़ा होता है... अपना फ्लो होता है... और यही फ्लो तो जिंदा होने का अहसास कराता है... इंदू को घर जाना था... पापा से मिलना था... पहली बार... आखिरी बार... और भरोसा भी नहीं था कि मिल भी पाएगी या नहीं... इंदू ने कभी अपने पापा को नहीं देखा... तस्वीर में भी नहीं... ये रिश्ता उसके लिए सिर्फ लोगों की किस्सागोई था... जो कह दे मान लेगी... पर पापा का एक खत ज़रूर आया था एक बार... और बकौल खत इंदू को पता चला कि उसके पापा उसे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे... इस तिलिस्मी से रिश्ते और उस खत से उसे सिर्फ इतना पता चल सका कि उसकी भलाई के लिए ही उसे बचपन में ही बोर्डिंग भेज दिया गया था और उसके घरवाले उसके हितैषी हैं... जो भी हो न तो इंदू ने उस खत के ज्यादा मतलब निकाले और न कई कई बार पढ़ा... हां हमेशा के लिए सहेज कर ज़रूर रख लिया... आसाम की हवा खुली थी... वो आजाद थी... न घर की कोई बंदिशें कभी उस पर थीं और न समाज की... लेकिन वो कभी नहीं समझ पाई कि ऐसी आजादी के लिए यहां इतनी हाय-तौबा क्यों हो रही है... बस की कोने वाली सीट मिली थी उसे... और बारिश हो रही थी... वैसे बारिश से भी इस लड़की का पुराना रिश्ता है... कैसे...? अब सब एक साथ जान लोगे क्या...? अभी तो कई पन्ने भरने हैं... और कहानी का कोई इरा सिरा नहीं... खैर... मुआफ करना मुझे ज़रा बात घुमा फिरा कर करने की आदत है... हां तो मैं कह रहा था कि उसे अपनी आजादी अच्छी नहीं लगती थी... बुखार आ जाता था तो उसका मन होता वॉर्डन हाउस में बैठे डॉक्टर की कडुई क्रोसिन और कफ सिरप से आई नींद की जगह किसी अच्छी सी गोद में चुपचाप दुबक जाए... और कोई चूड़ियों भरा हाथ उसके सर पर पट्टियां रख दे... पर आज़ादी में ये मुमकिन नहीं था... आज़ादी उसे घुटती थी... बहुत दिन हो गए थे डांट सुने... उसके सब दोस्त बड़े हो गए थे सो अब न टीचर डांटते थे औऱ न ही वार्डन बात बात पर टोकती थी... पर कभी कभी टीवी के सास बहू के किस्से देखकर उसे लगता ज़रूर था कि सास ज़रूर ऐसी ही होती होगी... वार्डन से पहले डर लगता था... फिर डरना भूल गई... वार्डन से भी... जिंदगी से भी... अब डर की जगह अजीब सा लगता था... आज ज्यादा से ज्यादा उसे घबराहट का नाम दे सकते हैं... डर का नहीं... ऐसी ही घबराहट होती थी जब १५ अगस्त को बोर्डिंग होस्टल पर तिरंगा फहराने की बारी आती थी... तीन दिन पहले से प्लम्पलेट बांट दिये जाते थे... दीवारों पर मार्क्स के नारों के साथ चेतावनियां होती थीं... तिरंगा न फैराने की हिदायतें होती थीं... लाल सलाम की सलामी और गरमी अचानक बढ़ जाती थी... प्रसिपल गुपचुप रात में तिरंगा फहराते और रात में ही उतार लेते... रात में तिरंगा नहीं फहराना चाहिए, उन्हें पता था... पर उस खौफ का क्या जो दिनों दिन बढ़ता जाता था... हॉस्टल की छानबीन शुरू होती... लड़कों के कमरों की तलाशी शुरु होती... पता नहीं वक्त करवट ले रहा था या दौर... कोई यकीन नहीं कर पाता था कि क्लास का सबसे होशियार लड़का... सबसे सीधा शरीफ लड़का बागी हो गया है... किसी को इल्म भी नहीं हो पाता था कि वो अपने तकिये के नीचे खंजर और डैडी की तस्वीर के पीछे ऐके सेंतालीस छिपाए है... अगस्त की शुरुआत हुई नहीं कि आर्मी मूवमेंट बढ़ जाता था और इसका पता भी तभी चलता था जब उसी सीधे सादे होशियार लड़के के मर्तबान में मां के प्यार से सराबोर कच्ची आमी का अचार नहीं, खून के खतरनाक इरादों से सराबोर आरडीएक्स मिलती... ऐसा कई बार हुआ था... तब घबराहट हो जाती... यकीन फिर छलनी हो जाता था... पर कुछ दिनों में फिर सब शांत हो जाता था... सावन जाते जाते पत्तों से खून घुल जाता था... और अगस्त के आखिर तक फिर नदी के किनारों पर बच्चे पिकनिक मनाना शुरू कर देते थे... उन्हीं नदियों के रास्ते बस चली जा रही थी... और इंदू खामोश थी... पता नहीं क्या चल रहा था उसके मन में... आप थोड़ी देर के लिए इंदू बनकर देखिये... सब पता चल जाएगा...

जारी है...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

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तुम आना कभी मेमना लेकर... पहाड़ों से...


रोज़ बदलता हूं कम्प्यूटर के डेस्टोप से चेहरा अपना
औऱ पीछा छुड़ा लेता हूं तुझ से...
रोज़ लिखता हूं एक खत तुझे याद कर...
रोज़ गांठता हूं दोस्ती नए लोगों से...
और रोज़ भूल जाता हूं तुझे...
इस कदर कि तुम फिर याद नहीं आती...
जब तक मैं अगले दिन फिर न भुला दूं तुम्हें...
यकीन न आये तो देख जाना...
तुम आना कभी मेमना लेकर... पहाड़ों से...
पेड़ की उलझी डाल से झांककर ढूढ़ना मुझे...
और पूछना मेरा हाल...
वैसे मुझे तो तुमने भी भुला दिया होगा ना अब तक...

देवेश वशिष्ठ खबरी
9811852336

१६-३-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी III



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जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि इंदू अपने आप में कम्पलीट कहानी है... लेकिन हम तो बात बिट्टू की कर रहे हैं... इसलिये उसी की बात में आगे बताऊंगा... बिट्टू को समझने के लिय इंदू को समझना जरूरी था इसलिये बता दिया... तो मैं बता रहा था कि इंदू बदल गई थी... क्योंकि वो बिट्टू बनने वाली थी... आर्फन हाउस में बच्चों को पढ़ाने जाने लगी औऱ फिर उसकी दुनिया उन्हीं की हो गई... जिनके मां-बाप या तो नहीं थे... या उनका कुछ पता नहीं था... अनाथ बच्चों के साथ वो ऐसे रच बस गई कि दीन-दुनिया भूल गई... मां बाप का प्यार कैसा होता है ये उसके लिये भी एक सवाल ही था... पर इतना पता चल गया था कि मरियम की मूर्ती से वार्डन क्यों बहलाती थी... ये सवाल उसके लिये तो बिल्कुल ऐसा था जैसे अंधे होली खेलें औऱ उन्हीं से कोई बच्चा पूछ बैठे कि हमने कौन कौन से रंग खेले... ये हरा कैसा होता है... पर उसकी जिंदगी में तो अभी बहुत से रंग बचे थे... आसाम मे दुनिया हरी थी... कभी कभी लाल हो जाती थी... लाल सलाम आसाम में जोर लगा रहा था... उसे वहां से डर लगने लगा था... हर बड़े को वो घबराकर देखती थी... बस बच्चे थे जिनके साथ वो महफूज़ महसूस करती... लेकिन एक दिन बुलावा आ गया... घर से... उसका इंतज़ार हो रहा था... बेसब्री से... पहली बार... १२ साल में पहली बार... सब उसकी राह देख रहे थे... सब चाहते थे कि आखरी बार बेटी बाप को देख ले... आखरी बार... या पहली बार... जो भी कह लो... पर इंदू को घर जाना था... घर यानी मसूरी... वादियों के बीच... यहीं से शुरु होनी थी एक और कहानी... मेरी कहानी... जो आप पढ़ रहे हैं... वादियां... मेरी आवारगी की कहानी...
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जारी है...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

२७-२-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-II

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-I देखने के लिये यहां क्लिक करें-



बिट्टू यानि इंदू... अपने आप में एक कम्पलीट कहानी... इंदू ने अपने पिता को जिंदगी में बस एक बार देखा... जिंदा नहीं... कफन में लिपटा हुआ... उसका अधिकार अपने पिता पर बस इतना ही हो पाया कि उसके आने तक उनकी अर्थी रोक ली गई थी... इंदू को बचपन में ही बोर्डिंग भेज दिया गया था... इंदू की मां को वो पसंद नहीं थी... क्यों... इसका जबाब भी उसे पिता की मौत के बाद ही मिल सका... बचपन से आसाम में रही... बोर्डिंग स्कूल में... नर्सरी से लेकर बारहवीं तक... रिश्ते अहमियत रखते हैं ये उसे तब पता चलता जब होस्टल की फीस औऱ जेबखर्च उसके स्कूल एकाउंट में क्रेडिट कर दिये जाते थे... कभी कभी भाई मिलने आ जाता था तो पता चलता था कि लड़कों से कुछ औऱ भी रिश्ते बनाये जा सकते हैं... हर साल उसकी दुनिया बदल जाती थी... बोर्डिंग में खूब रैगिंग...ली भी औऱ दी भी...उत्तर औऱ पूरब में कुछ परेशानी है... ये उसे वहीं समझ में आया... नये एडमीशन हुए तो सब खुश हो जाते थे... पर पहली बार जब असम के उस स्कूल में गोलियां चली तो जिंदगी भी समझ में आ गई... बिट्टू तब तक बिट्टू नहीं थी... वो इंदू थी... छ: साल की इंदू... घर से दूर गई तो रोई थी या नहीं उसे याद नहीं... पर उसने कभी घर को याद भी नहीं किया... असम में इंदू ने दुनियादारी की पूरी तालीम पाई... जब देह भरने लगी तो पूरब की चपटी नाक वाली लड़कियों के बीच इंदू ही सबसे खूबसूरत लगती थी... लड़के आगा पीछा करने लगते औऱ वो किसी को घास नहीं डालती थी... या यूं भी कह सकते हैं कि उसे गुरूर था अपने चेहरे-मोहरे पर... घर का प्यार मिला नहीं तो जहां से भी मिला... बटोरती चली गई... लेकिन दो दिन औऱ तीन रातों की दोस्तियों से जब नकाब हटता तो इंदू का बड़ा बुरा लगता... हालांकि इंदू से कोई ज़ोर जबर्दस्ती की गुस्ताखी नहीं कर सकता था... लेकिन उम्र है... अगर कोई रोक-टोक न हो तो उड़ने की चाहत किसकी नहीं होती... कभी- कभी उसे अपनी ही इस आजादी से घुटन होने लगती... पर माहौल मिले तो कौन कम्बख्त घुटने बैठेगा... बोर्डिंग के लड़के बड़े घरों के बिगड़े शहज़ादे थे... अफम... चरस...दारू औऱ मारपीट... इसी दुनिया में मस्त औऱ व्यस्त रहते थे... अब सोहबत से कब तक कोई खुद को दूर रख सकता है... कुल मिलाकर हुआ ये कि रोज लड़कों को चरस पीते देख एक दिन उसका भी मन कर आया... लड़कों ने बहका दिया औऱ इंदू लगा बैठी ड्रग का इंजेक्शन... बहक तो गई पर संभाल नहीं पाई... इंदू के मुंह से झाग आने लगे तो उसके साथी घबरा गये... हास्पीटल में भर्ती कराया तो बात खुल गई... इंदू के घर वालों को बुलाया पर कोई नहीं आया... इंदू को इन्जेक्शन का ज़हर रिएक्शन कर गया औऱ पूरे चेहरे पर दाने निकल आये... इंदू ठीक तो हो गई तो उसे लगा कि सब उससे कटने लगे हैं... जो कल तक आगा पीछा करते थे, अब हाय हलो भी नहीं करते... कभी कभी कुछ झटके इंसान को बिल्कुल बदल देते हैं... इंदू भी बदल गई थी...

जारी है...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

भूल...

रोज़ बदलता हूं कम्प्यूटर के डेस्टोप से चेहरा अपना
औऱ पीछा छुड़ा लेता हूं तुझ से...
रोज़ लिखता हूं एक खत तुझे याद कर...
रोज़ गांठता हूं दोस्ती नए लोगों से...
और रोज़ भूल जाता हूं तुझे...
इस कदर कि तुम फिर याद नहीं आती...
जब तक मैं अगले दिन फिर न भुला दूं तुम्हें...
यकीन न आये तो देख जाना...
तुम आना कभी मेमना लेकर... पहाड़ों से...
पेड़ की उलझी डाल से झांककर ढूढ़ना मुझे...
और पूछना मेरा हाल...
वैसे मुझे तो तुमने भी भुला दिया होगा ना अब तक...

२२-२-०८

वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-I



.
..
...
'तो क्या सोचा तुमने देव...'
बिट्टू की आवाज ने लम्बी खामाशी तोड़ी... कांच के गिलास में चाय शर्बत हो गई थी... पर अभी देव को उसे पीने लायक होने का इंतज़ार था... दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी... मसूरी में मौसम की पहली बर्फ गिरी थी... करनपुर मे किराये के कमरे की छत से अक्सर देव औऱ बिट्टू मसूरी और धनोल्टी की पहाड़ियों को निहारा करते थे... देव यानि देवराज़... औऱ बिट्टू यानि इंदु... इंदु को देवराज प्यार से बिट्टू बुलाता था...
बिट्टू धनोल्टी की पहाड़ियां देखो कैसी सफेद हो गई हैं...
सुंदर हैं ना...
देवराज ने एक घूंट में चाय की फार्मेलटी पूरी कर दी... वो अक्सर ऐसा ही किया करता था... कॉफी शाम को तैयार करता... रात भर लिखता रहता... औऱ सवेरे के पहले पहर गटागट पीकर सो जाता... हॉट कॉफी को कोल्ड करके पीने में या तो उसे मज़ा आता था या चाय औऱ कॉफी उसके लिये बस एक ज़रिया होती थी कि सिलसिला चलता रहे...
लेकिन देव ये तो मेरी बात का जबाब नहीं है...
ऊं... देव ने कुछ इस अंदाज़ में पूछा जैसे वो उसके सवाल पर ध्यान नहीं दे पाया है...
बिट्टू ने सवाल दोहराया... तुमने क्या सोचा है देव...
कांच के खाली गिलास में खोए खोए उसने कहा...
पता नहीं यार... कुछ नहीं पता...
घबराई सी नज़रों से दोनों ने एक दूसरे को देखा... औऱ फिर हिचकियां बंध गई... हलकी हलकी बारिश हो रही थी... बिट्टू को बुखार आ गया...
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बिट्टू को बुखार आ गया था... देवराज दिल्ली से पत्रिकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी आवारगी थी... यही आवारगी उसे देहरादून तक खींच लाई... एक प्रोडक्शन हाऊस में कैमरामैन की नौकरी कर ली... तनख्वाह आठ हज़ार रूपये महीना... बहुत थे तब अकेली जान के लिए... पर देवराज के लिये नहीं... मैं ये सब इसलिये बता रहा हूं जिससे आप कोई पूर्वाग्रह बनाने से पहले देवराज या बिट्टू के देव को समझ जाएं... इस कहानी के देव का करेक्टर कुछ ऐसा है जिसे अकेला रहना पसंद है... पर चाहता है कि कोई हो जिसे पाल सके... जिस पर सब लुटा सके... जिसका दीवाना हो जाये... लुटने औऱ कमाने की चाहत ही देवराज की खासियत है... औऱ कोई खोट नहीं... कोई एब नहीं... पर कानों का कच्चा है... दिल का भी... ख्वाब इतने कि सवेरे आंखें खोलने का मन नहीं करता... पर उस पूरी रात देव को नींद नहीं आई... वैसे अक्सर ऐसा होता था... बिट्टू की तबियत बिगड़ती जा रही था... बिट्टू को तेज़ फीवर था... पर उसे सहन करने की आदत थी... वैसे ये आदत दोनों को थी... औऱ इसी लिये दोनों के बीच खूब पटती थी... दोनों अक्सर मिला करते थे... पर जमीन पर बिछे गद्दे पर दूर दूर बैठे रहते थे... और दूरी को सहन करते रहते थे... किसी को पहल करना गवारा नहीं था... देव बिट्टू के लिये चाय बनाता... तब तक बिट्टू देव का कमरा सजाती... पर दूर-दूर... खामोश-खामोश... बड़ा अनकहा सा प्यार था दोनों के बीच... पर प्यार बहुत था... इतना कि देव रात में दो बार बिट्टू के पीजी तक चक्कर लगा आया था... फोन किया तो पता चला बंदिश है... रात को वो नहीं आ सकती... सवेरे चार बजे देव के कमरे पर बिट्टू ने नॉक किया... देहरादून में अब बर्फ नहीं पड़ती पर बुखार में तपती बिट्टू बारिश में एक बार फिर भीग गई थी... हालांकि देव उसका हालचाल लेने औऱ एक नज़र देख भर लेने के इंतज़ार में था... पर इस तरह उसने कभी नहीं सोचा था... ये क्या पागलपन है पगली... देव ने भीगी बिट्टू को कसकर गले से लगा लिया... पहाड़ों पर अक्सर बारिश के साथ ठंड़ी हवाएं चलती हैं... उस रोज भी चल रहीं थीं... तारीख २६ जनवरी २००७... ठंड जैसे कुछ कर बैठने की कसम खाकर आई थी... उस रोज़ शायद कुछ हो जाना था...
देव मुझसे सहन नहीं हो रहा...
बस बिट्टू इतना बोल सकी... उसमें जैसे इतनी ही ताकत बची थी... बिट्टू निडाल हो गई... ठंड में बुखार से तप रही थी... माथा जल रहा था... हाथ बिल्कुल ठंडे पड़े थे... बोल भी ऐसे निकले जैसे गले में आवाज़ निकलने की जगह ही नहीं बची हो... देव ने बिट्टू को सम्हाला...
देव ने जल्दी हीटर चलाया... पर गीले कपड़ों में बिट्टू की तबियत बिगड़ती जा रही थी... देव ने बिट्टू को उठाने जगाने की बहुत कोशिश की... पर उसे कोई होश नहीं था... लग रहा था कि बस उसकी सांस उखड़ रहीं हैं... पहली बार देव उसके इतने करीब था... लेकिन परेशान... घबराया हुआ औऱ लाचार सा... स्वेटर... कोट... शाल... कंबल... देव के पास जो कुछ था उससे बिट्टू को ढंक दिया... जो हो सका करने की कोशिश की... जैसे भी बिट्टू को राहत मिल सकती थी किया... पर बिट्टू बुरी तरह तप रही थी... देव की घबराहट इस कदर बढ गई कि आंखें भर आईं... गला रुंध गया... बस एक शब्द निकला... आई लव यू बिट्टू... प्लीज आंखें खोलो बिट्टू... प्लीज...
देव की हिचकी बंध गईं थीं... बिट्टू ने बमुश्किल आंखें खोली... होठों से कुछ बुदबुदाने की कोशिश की... पर बोल नहीं पाई... बिट्टू बिल्कुल राजकुमारी लग रही थी... किसी राजकुमार की गोद में सिमटी राजकुमारी...
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जारी है...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

६-२-०८

keep quite my dear…



Quite.. keep Quite my dear…
Let me feel warmth
in this child night…
Let me think of no mind…
Let me die for some time
& let me feel my Sole other than me…
Keep Quite my dear…
Let me know…
Let me know closeness of our relation…
Let me know the pleasure with out you & me…
Let me know ourselves…
Let me cry with out Sound my dear…
Keep Quite my dear…

… Devesh k Vashishtha ‘Khabri’
9811852336
31/01/08

१७-१२-०७

अप्पन समाचार

बिहार के बहुत से गांवों में आज तक बिजली नहीं पहुंची है... लेकिन लोग समाचारों से रुबरु रहते हैं... गांवों में केबल कनेक्शन नहीं है पर गांव का अपना चैनल जरूर है... ये बातें सुनने में भले आपको अटपटी सी लगें पर बिहार के एक गांव में चार लड़कियां मिलकर गांव का चैनल चलाती हैं औऱ उस चैनल का नाम है अप्पन समाचार... देश में खबरिया चैनल बढ़ते जा रहे हैं... एक औऱ चैनल लांच हुआ है... बिहार के एक गांव में एक ऐसे गांव में जहां न बिजली हैं औऱ न ही लोग टीवी चैनलों के ज्यादा मायने समझते हैं... गांव वाले अगर कभी कभार टीवी देख भी लेते हैं... तो शिकायत रहती है कि नेशनल चैनल उनके गांव की सुध नहीं लेते... पर इसी गांव की चार लड़कियां मिली औऱ शुरु कर दिया एक चैनल... गांव का अपना चैनल... बिहार के एक छोटे से गांव का अप्पन समाचार एक मिशन लेकर उतरा है... औऱ मिशन है अशिक्षा औऱ बुरी प्रथाएं दूर करना औऱ इस चैनल की स्टोरी भी इसी तरह के सब्जेक्ट पर रहती हैं... गांव के ही एक छोटे से घर के एक छोटे से कमरे से चलता है अप्पन समाचार... यानी अपना समाचार... रोज सवेरे चैनल को चलाने वाली चार लड़कियां अप्पन समाचार के लिये खबरें ढूंढने निकलती हैं... कभी साइकिल पर तो कभी पैदल... छोटे से गांव की इन लड़कियों के हाथ में ट्राईपोर्ट औऱ हैण्डीकैम अब गांव वालों को अजीब नहीं लगते... छोटे से गांव की अपनी खबरें दिखाता है अप्पन चैनल... इनकी साइकिल की बास्केट के आगे लिखा है प्रेस औऱ उसी में रहता है अप्पन समाचार का माइक... इसी पहचान के साथ इन लड़कियों ने कम्युनिटी रेडियो की तर्ज पर गांव का अपना चैनल शुरु किया है...खबरें जुटा लेने के बाद शुरु होता है उनका पोस्ट प्रोडक्शन... ये लड़कियां एक जगह बैठकर खबरों की कॉपी लिखती हैं... उन्हें अंतिम रुप देती हैं औऱ बुलेटिन तैयार करती हैं... और उसके बाद शुरु होती है एंकरिंग... जिसके लिये इन लड़कियों में काफी क्रेज रहता है... हालांकि गांव में बिजली नहीं है... पर ये लड़कियां प्रोजेक्टर के सहारे अपनी खबरों को बाजार और चौपाल पर लोगों को दिखाती हैं...

१६-१२-०७

न्यूजरूम...

न्यूजरूम
मजमा लगता है हर रोज़,
सवेरे से,
खबरों की मज़ार पर
और टूट पड़ते हैं गिद्दों के माफिक
हम...हर लाश पर
और कभी...
ठंडी सुबह...
उदास चेहरे,
कुहरे में कांपते होंठ-हाथ-पांव,
और दो मिनट की फुर्सत...
काटने दौड़ती है आजकल
अब शरीर गवाही नहीं देता सुस्ती की...
न दिन में और न रात में...
जरूरी नहीं रहे दोस्त...
दुश्मन...
अपने...
बहुत अपने
ज्यादा खास हो गयी है
फूटी आंख न सुहाने वाली
टेलीफोन की वो घंटी...
जो नींद लगने से पहले उठाती है...
और खुद को दो चार गालियां देकर...
फिर चल पड़ता हूं...
चीड़ फाड़ करने...
न्यूजरुम में...

२४-१०-०७

...ले आऊं एक जोड़ी सांस









कभी कभी बनना पड़ता है
सख्त दिल...
इतना सख्त
कि घुटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं...
इतना सख्त…
कि सब पैबन्द, पैबस्त हो जाते हैं
अपने आप...
कभी कभी
जब अतीत के पंख लगे दिन
जंजीर बनकर गर्म गर्म
तपाते रहते हैं...
कभी कभी
कुछ समझदारियां
जिंदगी की सबसे बड़ी भूल लगने लगती हैं...
तब खूब घुटने का दिल करता है...
पर यार इस तमन्ना पर भी
बड़ा होने का अहसास
तमाचा मार जाता है...
वो नासमझियां क्यों पीछे छोड़ दी मैंने...?
क्यों हो गया हूं इतना बड़ा
कि सब छूट गया
बहुत पीछे...
कभी कभी
दिल करता है
कि झुककर उठा लूं सब जो बिखर गया है...
दिल करता है
कि चूम लू एक एक किरच
और फिर जोड़ लूं...
और ले आऊं एक जोड़ी सांस
पुरानी वाली...
पर सब रास्ते बंद कर लिये हैं मैंने...
इतने सख्त,
कि अब घुट भी नहीं पाता
सांस लेकर....

देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’

४-७-०७

बडे़ भाई की ब्लोगर मीट

भाई साहब हम पत्रकारों की जात ही ऐसी होती है कि पाँच सितारा होटलों में भी मान मनौब्बत करवाकर ही पहुँचते हैं। पर इस बार बिन बुलाये भी पहुँच गये थे। मनीष भाई रांची वाले, रांची से दिल्ली पधारे थे।मनीष जी के संस्मरण तो खूब पढे थे, पर पहली बार उनके पीछे का स्टिंग हाथ लगा। मैंने स्कूप ढूँढ लिया कि मनीष जी इतने यात्रा टाइप संस्मरण इसलिये लिख लेते हैं क्योंकि उन्हैं स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया की मैनेजरी प्राप्त है। सुगबुगाहट थीं कि बहुत जल्दी 'मेरा दिल्ली संस्मरण' भी मनीष जी लिख ही डालेंगे। खैर जैसे मनीष जी का 'सेल' हर किसी की जिंदगी से जुडा है, वैसे उन्होंने भी दिल्ली के ब्लोगर दोस्तों से मिलने की ठानी, कुछ नारदीय रॉ एजेण्टों को विशेष रिक्रूट किया गया पता लगाने को कि दिल्ली के ब्लोगर कहाँ कहाँ अण्डरग्राउण्ड हैं? साहब खोद खोद कर फुनियाये गये। पर हमारा नसीब कहें या अति सतर्कता हमारे नोकिया 1110 तक एक भी घन्टी नहीं आई। पर इसमें मनीष जी की गलती भी कहाँ है? वो दिल्ली के ब्लोगरों से मिलना चाह रहे थे, पर विश्व के सर्वश्रेष्ठ कवि/पत्रकार/ब्लोगर यानी मैंने पैदा लेने का जुर्म तो आगरा में किया था, सो हम तो हुऐ 'आगरी'। फिर मनीष जी की देहलवी थीम पर कैसे फिट बैठ पाते? पर आजकल हम दिल्ली गेट से लाल किले और मूलचंद से पालम के फ्लाईओवरो पर झक मार रहे थे सो संगीतकार मित्र सजीव सारथी जी ने जबरन हमें भी घसीट लिया।

(चित्र में बायें से शैलेश भारतवासी,सजीव सारथी, देवेश खबरी यानि मैं खुद :), , अमित गुप्ता, मनीष ,अरुण अरोड़ा,जगदीश भाटिया

खैर, होटल पार्क में हुई ब्लोगर मैत्री मीट में हमने एकमात्र बिन बुलाऐ मेहमान का एक्सक्लूसिव फर्ज अदा किया। पर ज्यादा मजा तो तब आया जब हर इतवार 'हिन्द युग्म' पर कविता के स्तर को बनाये रखने की सख्त हिदायत देकर पुचकारने वाले युग्मेश्वर शैलेष भारतवासी जी पहने से ही एक्सक्लूसिव की जुगाड़मेंट में बैठे थे। उस दिन मैं नबाबी-पत्रकारी-झोला छाप स्टाइल में था,गालों पर फ्रेन्च कट, बदन पर झनझना लाल कुर्ता और जूट का थैला। बिल्कुल 1947 की लव स्टोरीज की बीट पर काम करने वाले पत्रकार के माफिक। यकीन मानिये इस पहनावे का इतना असर हुआ कि मनीष जी ने तुरंत एक मात्र अलग रखी कुर्सी मेरी तरफ खिसका दी। अब तक मेरी नजर पंगेबाज पर नहीं गयी थी, पिछली ब्लोगर मीट (मैथली जी वाली) में अरुण जी और अविनाश जी का फोटो एक साथ मैंने ही खींचा था, सो डर लगना स्वाभाविक था। जी नजरें मिलीं दुअ सलाम हुई और मैंने कुर्सी थोडी खिसकाकर 'अमित जी' के पास कर ली। अमित जी के पास चूँकि पावर ऑफ अटॅर्नी है एसे में किसी भी पंगे से मुझे वही बचा सकते थे। खैर जब तक पंगेबाज मैदान में रहे मेरे बोल नहीं फूटे। उनके साथ मैथली जी भी थे। जिनके बस इतने ही शब्द मैं सभी के लिये कट-कॉपी-पेस्ट की तरह सुन सका-
"अरे! आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।"
खैर जनाब पंगेबाज जी का पंगे का वक्त हो गया था और मैथली जी का नयी खोजों का। सो दोंनों जल्दी चले गये। मैंने सोचा चलो जान बची, पर असली तो अब अटकी थी। उस दिन अमित जी और मनीष जी के साथ मिलकर पत्रकारों से आहत जगदीश भाटिया जी की तिकडी के बीच मुझे अपना पत्रकार बताना महँगा पड गया। फिर क्या क्या हुआ अगली बार बताऊँगा।
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

२०-६-०७

फिर उठा,लडखडाया,उड़ गया।


परिंदा उडा,
लडखडाया,
गिर गया।
फिर उठा,
लडखडाया,
गिर गया।
आसमान ने धक्का मारा,
धरती ने जंजीर डाल दी।
पखेरू भी उड़ गये साथ के।
पंछी नवेला,
बैठा अकेला।
गुमसुम,
चुपचाप,
पसीना,
घुटन,
कांप
सारी रात रोया,
चिल्लाया,
डरा,
म्यांउ की हर घुडकी पर
कई कई बार मरा।
पैरों में खो गया
पागल सा हो गया।
जंजीर बहुत गर्म हो गई,
जलाने लगी,
प्यास लगी,
भूख कलेजे तक आने लगी,
सब उम्मीद मिट गईं,
सब अरमान खो गए।
सारे सपने जैसे नींद में सो गए।
उसे आकाश नहीं मिला
और धरती भी नहीं बची
कुछ बोने को,
पर अब क्या बचा था
खोने को?
परिंदा उडा,
लडखडाया,
गिर गया।
फिर उठा,
लडखडाया,
उड़ गया।
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

७-६-०७

फिर बचेगा क्या......?


सोचता हूँ,
खुरच कर मिटा दूँ
उस रात के निशां,
अपने जिस्म से।
हटा दूँ सारे पैबंद,
तेरे नाम के-
अपनी हर कविता से।
तोड दूँ वो हर कडी,
जो भेज देती है वहीं।
अब छोड भी दूँ तेरा साथ
तेरे जाने के बाद।
एक वो सादा सा चेहरा,
जी तलक जो जा छिपा है,
सोचता हूँ ढूँढ लाऊँ,
और दरवाजे चढा दूँ।
सोचता हूँ अब फैंक भी दूँ
बाल जो उलझे पडे़ हैं,
कंघी में ।
कुछ चूडियों के टुकडे
संभाले बैठा हूँ अब तक।
तुम्हैं याद है, जब जोर से
मैंने तुम्हारी कलाई पकडी थी।
इतनी जोर से कि....
और वो गुड्डा तुम्हारा...
मेरे पास है,
वो कॉफी का कप,
वो बिस्किट का रैपर,
तेरी छुई हर चीज मेरे पास है।
सोचता हूँ, सब हटा दूँ।
पर फिर बचेगा क्या......?
'देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336
(दिल्ली)

५-६-०७

मैनें कुछ नहीं छोडा है तुम्हारे लिये।


नंदीग्राम में फिर फाइरिंग हुई है!
वहाँ के किसान उपद्रवी हैं
उनका पेशा अलग है आज से।
पंजाब में खून खराबा हो सकता है,
आखिर धर्म की इज्जत का सवाल है।
असम में भी मारे गये हैं कुछ लोग आज,
वो हिन्दी बोलते थे।
राजस्थान सुलग रहा है.....।
......आज दिल्ली बंद है।
दो बस जला दी गयी हैं सवेरे-सवेरे,
दो आदमी भी चौराहे पर....
दो पुलिस वाले..
दो गुज्जर..
दो मीणा..
दो ब्राह्मण..
दो जाट..
दो हिन्दी भाषी..
दो.
दो..
दो...
सब माँग रहे हैं कुछ-कुछ।
किसी को जमीन चाहिये,
किसी को सत्ता,
किसी को नौकरी,
और किसी को रोटी।
हर चीज मिलेगी।
रूस की क्रांति की तरह,
जब मर जायेगी आधे से ज्यादा आबादी
महान होकर...क्रांति के नाम पर।
फिर सब मरघट आबाद हो जाऐंगें।
वहाँ किसी की दुनाली,
किसी की लाठी,
किसी के फरसे,
और कहीं कहीं बिना गले में लटकाये कुछ टायर जलाए जायेंगे।
तब मिटेंगें ये हथियार,
ये वार।
ऐ मेरी अगली पीढी,
माफ कर देना मुझे।
मैं जल्द मर जाऊँगा,
किसी न किसी आंदोलन की खातिर।
बिना कुछ किये तुम्हारे लिये।
पर तुम्हें नई दुनिया बनानी है।
जहाँ सब इंसान रहना,
तब मुझे याद मत करना मेरे बेटे।
भुला देना मेरी हर बात,
याद,
इतिहास,
मुझे याद करोगे तो याद आयेगी
मेरी जात... मेरी औकात...17%,... 27%....
या फिर मुझे सामान्य करार देना।
मेरी हर तलवार का हिसाब लेना।
फिर गालियाँ देना मुझे,
थूकना मेरे चित्र पर,
दशहरे पर जलाना मेरा पुतला।
पर जला देना सारी नफरत, मेरे साथ।
कुछ मत रखना संजोकर विरासत में,
क्योंकि मैनें कुछ नहीं छोडा है तुम्हारे लिये।
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

२६-५-०७

चोरी करनी है!






यार कोई तरक़ीब बता
तरक़ीब बता,
पच्चीस पैसे की जुगाड़ की।
वो वाले पच्चीस पैसे,
जिसकी चार संतरे वाली गोलियाँ आती थीं।
तरक़ीब बता,
चोरी करनी है!
अपने ही घर में कटोरी भर अनाज की...।
आज सपने में भोंपू वाली बर्फ़ बिकी थी!
मुझे 'पीछे देखो मार खाई' वाले खेल
दोबारा खेलने हैं...
जानी-अनजानी गोदों को,
अंकल,आण्टी,चाचा, ताई,मौसी,
दीदी,मामा,नाना,दादा,दादी कहना है।
यार क्या इतना बड़ा हो गया हूँ,
कि रोज़ काम पर जाना पड़ेगा?
ट्यूशन वाले मास्टर जी का काम नहीं किया है,
' आज फिर पेट दर्द का बहाना बना लूँ॰॰॰'?
ये रोज़-रोज़ के प्रीतिभोज बेस्वादे हैं।
अगली रामनवमी का इंतज़ार करूँगा।
खूब घरों में जाऊँगा 'लांगुरा' बनकर।
खूब पैसे मिलेंगे तब...
शाकालाका वाली पेंसिल खरीदकर
चिढाऊँगा दोस्तों को।
वो 'जवान' है,
नज़रें चुरा लेती है।
चल उससे बचपन वाली होली खेलते हैं,
यार चल कुछ 'सद्दा' लूटें॰॰
मुझे पतंग उड़ानी है॰॰॰॰।
9811852336

१०-५-०७

शायद मर गया हूँ मैं।


गुम गया हूँ मैं,

मिट गये हैं-

अतीत के चलचित्र।

धुँधले अक्स,

बातें,

यादें,

पीङाऐं।

गुम गयीं हैं सारी स्मृतियाँ,

और गुम हो गया है भविष्य भी,

तुम्हारे साथ,

गुम गया हूँ मैं।

अब कल्पना नहीं है,

न समय है,

न आकाश।

कुछ नहीं बचा है मेरे लिये।

खो दिया है सब कुछ ।

अब हाथ पैर नहीं पटकता,

किसी चमकी को देखकर,

चीखता नहीं हूँ चोट खाकर,

चुप हो गया हूँ मैं।

शायद मर गया हूँ मैं।

आ लगा हूँ निर्जन द्वीप पर,

पर वहाँ तुम रहते हो।

होठों के पार...

इस बार तुम ज्यादा पास हो,

भीतर तक...

बिल्कुल सक्रिय।

मैं समाधि में हूँ....।

श्श्श्श....... तुम भी गुम जाओ,

मेरे साथ।

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410173698

६-५-०७

यहाँ हिन्दू मुसलमान रहते हैं! 'आबाद'...


एक हिन्दू ने

एक आदमी मार दिया...,

एक मुसलमान ने

उसकी बीबी की इज्जत लूटी...,

... मजे से,

किसी ने नहीं रोका।

फिर दोंनों ने मिलकर

उसका घर जला दिया...।

कुछ और आदमी थे उस मोहल्ले मैं,

मार दिये गये...

अब वहाँ बस,

हिन्दू मुसलमान रहते हैं...

...आबाद!!


देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410361798

५-५-०७

ऐ मेरे मालिक, मुझे एक रबर दे दे,

ऐ मेरे मालिक,
मुझे तू ऐसी रबर दे दे,
जिससे इस पन्ने पर उकरी
कुछ तिरछी रेखाऔं को हटा सकूँ।
भेद मिटा सकूँ,
सफेदपोश कोरे कागज को
सही राह दिखा सकूँ।
यहाँ वहाँ को एक बना सकूँ,
माटी के खिलौनौं को
टूटने से बचा सकूँ।
गुल खिला सकूँ,
दिल मिला सकूँ
ऐ मेरे मालिक
तू मुझे वो दिल दे दे,
जिससे किसी के काम आ सकूँ,
उसके मन की नफरत से झलकते प्यार को
बाहर ला सकूँ।
भाई को भाई से मिला सकूँ,
गा सकूँ, गवा सकूँ
हँस सकूँ, हँसा सकूँ।
ऐ मेरे खुदा
तू मुझे ऐसी मुहब्बत दे दे
गैरों को अपना बना सकूँ,
दुश्मनी मिटा सकूँ,
दोस्त बना सकूँ।
जहर को भी पचा सकूँ,
राम और रहीम के
और पास आ सकूँ।
ऐ मेरे खुदा
तू भले मुझे कुछ मत दे,
पर थोडी इंसानियत दे दे,
जिससे एक जानवर को
फिर से इंसान बना सकूँ,
..... मैं किसी के काम आ सकूँ।
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9410361798

३०-४-०७

कहाँ रुके हैं बढे कदम।


बढे कदम, उठे कदम,

पदचिन्हों पर चले कदम।

कही अनकही एक कहानी,

चुपके से कह चले कदम।


चकमक मंजिल देख भ्रमित हो,

आशाओं ने छले कदम

ठोकर लगी जाम से झलके,

उपमानों से भले कदम।


पन्नों पर काजल सी रेखा,

भावों के नभ तले कदम।

सब रुक जाऐं भले जहाँ में,

कहाँ रुके हैं बढे कदम।

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410361798

२८-४-०७

चल यार आज बेबात हँसें!

चल यार आज बेबात हँसें,
कोई बात चले इससे पहले।
आ तुझको आखों में भर लूँ,
घर को उड़ने से पहले।
चल यार दोबारा उसी जगह,
बेठें बिल्कुल अनजानों से,
चल कर लें फिर से वही हाल,
अपने अपने दीवानों से।
फिर तुम कहना कुछ,
कुछ मैं कह दूँ,
सब लोग कहैं इससे पहले।
चल यार आज बेबात हँसें,
कोई बात चले इससे पहले।
चल यार वहीं पर, उन्हीं दिनों ,
जब थी खुश तू भी, खुश मैं भी।
हर बात तेरी थी तब भारी,
हर बात मेरी थी तब वजनी।
मैं तुझको कुछ था, कुछ तू मुझको,
सब कुछ बनने से पहले,
चल यार आज बेबात हँसें,
कोई बात चले इससे पहले।
चल बैठ वहीं देखूगाँ तुझको,
चोरी चोरी चुपके चुपके।
फिर करना वो बातें मेरी,
अपनी उसी सहेली से।
चल फिर से इकरार करें
हम वैसे ही चोरी चोरी।
आ तुझको यादों में भर लूँ,
घर को उड़ने से पहले।
चल यार आज बेबात हँसें,
कोई बात चले इससे पहले।

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9410361798