tag:blogger.com,1999:blog-78465416192028275162008-05-15T09:31:36.765+05:30अच्छी बातें, अच्छा ब्लोगदेवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comBlogger31125tag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-23841963876197802702008-03-17T00:08:00.000+05:302008-03-17T00:11:56.597+05:30गैर जिम्मेदार...मुझसे सैकड़ों मील दूर तेरी सिसकन<br />बहुत तकलीफ दे रही हैं मेरे बच्चे<br />और मैं कुछ नहीं कर सकता... कुछ नहीं...<br />मैं फोन करूं तो जी भर के गुबार निकाल लेना...<br />खूब गालियां देना मुझे...<br />तुम्हारे दिल को थोड़ी तसल्ली तो हो जायेगी...<br />तुम्हारी घुटन अब मुझसे बर्दाश्त नही होती...<br />सच में अब लग रहा है कि जीना बेमानी हो गया है...<br />क्या करूंगा इन सफलताओं का बेटा... <br />तेरे बिना...<br />रोज़ नये रंग रंगने के दिन हैं तेरे... <br />रोज़ खिलने के दिन हैं...<br />तेरे गुलाब से सुर्ख औऱ प्यारे से होठों से <br />आज तक इतने आई लव यू निकले हैं कि <br />अब इन बंदिशों से निकलना मुमकिन नहीं रह गया है....<br />औऱ मैं जानता हूं कि तुम नहीं छोड़ पा रहे हो मुझे मुझसे <br />मेरा टूटकर किया गया प्यार... <br />औऱ तेरा हर दर्जे का समर्पण... <br />अब न मुझे जीने दे रहा है औऱ न तुझे...<br />तेरी बातें अब बहुत डराने लगी हैं... <br />कि कहीं... कहीं तुम.......<br />नहीं... वादा करो मुझसे... <br />वादा करो कि ऐसा कुछ नहीं करोगे...<br />उफ़...<br />मुझे पहली बार पता चला है कि पापा क्यों बोलते थे... <br />कितने गैर जिम्मेदार हो तुम....देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-90924299743135993382008-03-16T23:59:00.000+05:302008-03-17T00:04:51.019+05:30वादियां... मेरी आवारगी की कहानी III<a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R91n7_8P0XI/AAAAAAAAASc/p7iJZJWjk7M/s1600-h/Dream_Standard_1280x960.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R91n7_8P0XI/AAAAAAAAASc/p7iJZJWjk7M/s320/Dream_Standard_1280x960.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5178409427020009842" /></a><br /><br />मेरी आवारगी की कहानी I और II पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें-<br />आगे---<br /> <br /><br /> जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि इंदू अपने आप में कम्पलीट कहानी है... लेकिन हम तो बात बिट्टू की कर रहे हैं... इसलिये उसी की बात में आगे बताऊंगा... बिट्टू को समझने के लिय इंदू को समझना जरूरी था इसलिये बता दिया... तो मैं बता रहा था कि इंदू बदल गई थी... क्योंकि वो बिट्टू बनने वाली थी... आर्फन हाउस में बच्चों को पढ़ाने जाने लगी औऱ फिर उसकी दुनिया उन्हीं की हो गई... जिनके मां-बाप या तो नहीं थे... या उनका कुछ पता नहीं था... अनाथ बच्चों के साथ वो ऐसे रच बस गई कि दीन-दुनिया भूल गई... मां बाप का प्यार कैसा होता है ये उसके लिये भी एक सवाल ही था... पर इतना पता चल गया था कि मरियम की मूर्ती से वार्डन क्यों बहलाती थी... ये सवाल उसके लिये तो बिल्कुल ऐसा था जैसे अंधे होली खेलें औऱ उन्हीं से कोई बच्चा पूछ बैठे कि हमने कौन कौन से रंग खेले... ये हरा कैसा होता है... पर उसकी जिंदगी में तो अभी बहुत से रंग बचे थे... आसाम मे दुनिया हरी थी... कभी कभी लाल हो जाती थी... लाल सलाम आसाम में जोर लगा रहा था... उसे वहां से डर लगने लगा था... हर बड़े को वो घबराकर देखती थी... बस बच्चे थे जिनके साथ वो महफूज़ महसूस करती... लेकिन एक दिन बुलावा आ गया... घर से... उसका इंतज़ार हो रहा था... बेसब्री से... पहली बार... १२ साल में पहली बार... सब उसकी राह देख रहे थे... सब चाहते थे कि आखरी बार बेटी बाप को देख ले... आखरी बार... या पहली बार... जो भी कह लो... पर इंदू को घर जाना था... घर यानी मसूरी... वादियों के बीच... यहीं से शुरु होनी थी एक और कहानी... मेरी कहानी... जो आप पढ़ रहे हैं... वादियां... मेरी आवारगी की कहानी...<br />----------------------------------------------<br /><a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R91nzf8P0WI/AAAAAAAAASU/KnzBgdRahL8/s1600-h/dream.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R91nzf8P0WI/AAAAAAAAASU/KnzBgdRahL8/s320/dream.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5178409280991121762" /></a><br /><br />कुछ देर के लिये मैं अपना नाम देव यानी देवराज रख लेता हूं... देवराज बचपन में इतना शरारती था कि दसवीं करते करते ग्यारह स्कूलों को दुआ सलाम कर चुका था... पढ़ाई लिखाई में होशियार था पर पिताजी हमेशा कहते कि लापरवाह है... दरअसल उसे फक्कड़ कहें तो ज्यादा ठीक होगा... शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया... पर देवराज को बांध पाया... देवराज को बंधना कतई मंजूर नहीं था... उम्र अंगड़ाई ले ही रही थी कि जनाब पत्रकार हो गए... खुले घूमते... खबरें बटोरते... शहर का सबसे कम उम्र का खबरची... जैसे तैसे कॉलेज किया... इंतेहान में पहले दर्जे से पास तो हो गया पर पढा कभी नहीं... तीन बहनें थीं औऱ पिताजी बीमार... उम्र बढ़ी तो जिम्मेदारी का अहसास भी हो गया... दिल्ली से भोपाल औऱ भोपाल से देहरादून... नौकरियों की तलाश में शहर बदलना शुरु किया... एक शहर से मॉस कम्युनिकेशन किया औऱ दूसरे में वही पढ़ाया... लाइटें ढोने से लेकर पर्दे पर दिखने तक का हुनर सीख लिया... कुछ पूछ होने लगी तो मेहनत भी बढ़ गई... पर कहानी शुरु हुई देहरादून से...देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-46467261327450694852008-02-27T22:39:00.006+05:302008-02-29T11:34:42.840+05:30वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-II<strong><a href="http://deveshkhabri.blogspot.com/2008/02/blog-post.html">वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-I देखने के लिये यहां क्लिक करें</a>-</strong><br /><a href="http://deveshkhabri.blogspot.com/2008/02/blog-post.html"><a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8a3TvOz3-I/AAAAAAAAAR4/IH4djLmV-4U/s1600-h/33w390.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8a3TvOz3-I/AAAAAAAAAR4/IH4djLmV-4U/s320/33w390.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5172022771805577186" /></a></a><br /><br /><br />बिट्टू यानि इंदू... अपने आप में एक कम्पलीट कहानी... इंदू ने अपने पिता को जिंदगी में बस एक बार देखा... जिंदा नहीं... कफन में लिपटा हुआ... उसका अधिकार अपने पिता पर बस इतना ही हो पाया कि उसके आने तक उनकी अर्थी रोक ली गई थी... इंदू को बचपन में ही बोर्डिंग भेज दिया गया था... इंदू की मां को वो पसंद नहीं थी... क्यों... इसका जबाब भी उसे पिता की मौत के बाद ही मिल सका... बचपन से आसाम में रही... बोर्डिंग स्कूल में... नर्सरी से लेकर बारहवीं तक... रिश्ते अहमियत रखते हैं ये उसे तब पता चलता जब होस्टल की फीस औऱ जेबखर्च उसके स्कूल एकाउंट में क्रेडिट कर दिये जाते थे... कभी कभी भाई मिलने आ जाता था तो पता चलता था कि लड़कों से कुछ औऱ भी रिश्ते बनाये जा सकते हैं... हर साल उसकी दुनिया बदल जाती थी... बोर्डिंग में खूब रैगिंग...ली भी औऱ दी भी...उत्तर औऱ पूरब में कुछ परेशानी है... ये उसे वहीं समझ में आया... नये एडमीशन हुए तो सब खुश हो जाते थे... पर पहली बार जब असम के उस स्कूल में गोलियां चली तो जिंदगी भी समझ में आ गई... बिट्टू तब तक बिट्टू नहीं थी... वो इंदू थी... छ: साल की इंदू... घर से दूर गई तो रोई थी या नहीं उसे याद नहीं... पर उसने कभी घर को याद भी नहीं किया... असम में इंदू ने दुनियादारी की पूरी तालीम पाई... जब देह भरने लगी तो पूरब की चपटी नाक वाली लड़कियों के बीच इंदू ही सबसे खूबसूरत लगती थी... लड़के आगा पीछा करने लगते औऱ वो किसी को घास नहीं डालती थी... या यूं भी कह सकते हैं कि उसे गुरूर था अपने चेहरे-मोहरे पर... घर का प्यार मिला नहीं तो जहां से भी मिला... बटोरती चली गई... लेकिन दो दिन औऱ तीन रातों की दोस्तियों से जब नकाब हटता तो इंदू का बड़ा बुरा लगता... हालांकि इंदू से कोई ज़ोर जबर्दस्ती की गुस्ताखी नहीं कर सकता था... लेकिन उम्र है... अगर कोई रोक-टोक न हो तो उड़ने की चाहत किसकी नहीं होती... कभी- कभी उसे अपनी ही इस आजादी से घुटन होने लगती... पर माहौल मिले तो कौन कम्बख्त घुटने बैठेगा... बोर्डिंग के लड़के बड़े घरों के बिगड़े शहज़ादे थे... अफम... चरस...दारू औऱ मारपीट... इसी दुनिया में मस्त औऱ व्यस्त रहते थे... अब सोहबत से कब तक कोई खुद को दूर रख सकता है... कुल मिलाकर हुआ ये कि रोज लड़कों को चरस पीते देख एक दिन उसका भी मन कर आया... लड़कों ने बहका दिया औऱ इंदू लगा बैठी ड्रग का इंजेक्शन... बहक तो गई पर संभाल नहीं पाई... इंदू के मुंह से झाग आने लगे तो उसके साथी घबरा गये... हास्पीटल में भर्ती कराया तो बात खुल गई... इंदू के घर वालों को बुलाया पर कोई नहीं आया... इंदू को इन्जेक्शन का ज़हर रिएक्शन कर गया औऱ पूरे चेहरे पर दाने निकल आये... इंदू ठीक तो हो गई तो उसे लगा कि सब उससे कटने लगे हैं... जो कल तक आगा पीछा करते थे, अब हाय हलो भी नहीं करते... कभी कभी कुछ झटके इंसान को बिल्कुल बदल देते हैं... इंदू भी बदल गई थी...<br /><br />जारी है...<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9811852336देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-14989943900630846342008-02-27T21:12:00.000+05:302008-02-27T21:13:36.464+05:30भूल...रोज़ बदलता हूं कम्प्यूटर के डेस्टोप से चेहरा अपना <br />औऱ पीछा छुड़ा लेता हूं तुझ से...<br />रोज़ लिखता हूं एक खत तुझे याद कर...<br />रोज़ गांठता हूं दोस्ती नए लोगों से...<br />और रोज़ भूल जाता हूं तुझे...<br />इस कदर कि तुम फिर याद नहीं आती...<br />जब तक मैं अगले दिन फिर न भुला दूं तुम्हें...<br />यकीन न आये तो देख जाना...<br />तुम आना कभी मेमना लेकर... पहाड़ों से...<br />पेड़ की उलझी डाल से झांककर ढूढ़ना मुझे... <br />और पूछना मेरा हाल... <br />वैसे मुझे तो तुमने भी भुला दिया होगा ना अब तक...देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-68100977543157362712008-02-22T21:34:00.003+05:302008-02-27T22:39:23.148+05:30वादियां... मेरी आवारगी की कहानी-I<a href="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8WYwvOz37I/AAAAAAAAARc/6AyhKbD_PiQ/s1600-h/9_ilikethemtoo.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8WYwvOz37I/AAAAAAAAARc/6AyhKbD_PiQ/s320/9_ilikethemtoo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5171707710184611762" /></a><br /><br />.<br />..<br />...<br />'तो क्या सोचा तुमने देव...'<br />बिट्टू की आवाज ने लम्बी खामाशी तोड़ी... कांच के गिलास में चाय शर्बत हो गई थी... पर अभी देव को उसे पीने लायक होने का इंतज़ार था... दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी... मसूरी में मौसम की पहली बर्फ गिरी थी... करनपुर मे किराये के कमरे की छत से अक्सर देव औऱ बिट्टू मसूरी और धनोल्टी की पहाड़ियों को निहारा करते थे... देव यानि देवराज़... औऱ बिट्टू यानि इंदु... इंदु को देवराज प्यार से बिट्टू बुलाता था... <br />बिट्टू धनोल्टी की पहाड़ियां देखो कैसी सफेद हो गई हैं... <br />सुंदर हैं ना... <br />देवराज ने एक घूंट में चाय की फार्मेलटी पूरी कर दी... वो अक्सर ऐसा ही किया करता था... कॉफी शाम को तैयार करता... रात भर लिखता रहता... औऱ सवेरे के पहले पहर गटागट पीकर सो जाता... हॉट कॉफी को कोल्ड करके पीने में या तो उसे मज़ा आता था या चाय औऱ कॉफी उसके लिये बस एक ज़रिया होती थी कि सिलसिला चलता रहे... <br />लेकिन देव ये तो मेरी बात का जबाब नहीं है...<br />ऊं... देव ने कुछ इस अंदाज़ में पूछा जैसे वो उसके सवाल पर ध्यान नहीं दे पाया है...<br />बिट्टू ने सवाल दोहराया... तुमने क्या सोचा है देव...<br />कांच के खाली गिलास में खोए खोए उसने कहा...<br />पता नहीं यार... कुछ नहीं पता... <br />घबराई सी नज़रों से दोनों ने एक दूसरे को देखा... औऱ फिर हिचकियां बंध गई... हलकी हलकी बारिश हो रही थी... बिट्टू को बुखार आ गया...<br />-----------------------------------------<br /><br /><a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8WYZfOz36I/AAAAAAAAARU/UnLZdo0QlfQ/s1600-h/heaven_can_wait_b.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R8WYZfOz36I/AAAAAAAAARU/UnLZdo0QlfQ/s320/heaven_can_wait_b.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5171707310752653218" /></a><br /><br /><br />बिट्टू को बुखार आ गया था... देवराज दिल्ली से पत्रिकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी आवारगी थी... यही आवारगी उसे देहरादून तक खींच लाई... एक प्रोडक्शन हाऊस में कैमरामैन की नौकरी कर ली... तनख्वाह आठ हज़ार रूपये महीना... बहुत थे तब अकेली जान के लिए... पर देवराज के लिये नहीं... मैं ये सब इसलिये बता रहा हूं जिससे आप कोई पूर्वाग्रह बनाने से पहले देवराज या बिट्टू के देव को समझ जाएं... इस कहानी के देव का करेक्टर कुछ ऐसा है जिसे अकेला रहना पसंद है... पर चाहता है कि कोई हो जिसे पाल सके... जिस पर सब लुटा सके... जिसका दीवाना हो जाये... लुटने औऱ कमाने की चाहत ही देवराज की खासियत है... औऱ कोई खोट नहीं... कोई एब नहीं... पर कानों का कच्चा है... दिल का भी... ख्वाब इतने कि सवेरे आंखें खोलने का मन नहीं करता... पर उस पूरी रात देव को नींद नहीं आई... वैसे अक्सर ऐसा होता था... बिट्टू की तबियत बिगड़ती जा रही था... बिट्टू को तेज़ फीवर था... पर उसे सहन करने की आदत थी... वैसे ये आदत दोनों को थी... औऱ इसी लिये दोनों के बीच खूब पटती थी... दोनों अक्सर मिला करते थे... पर जमीन पर बिछे गद्दे पर दूर दूर बैठे रहते थे... और दूरी को सहन करते रहते थे... किसी को पहल करना गवारा नहीं था... देव बिट्टू के लिये चाय बनाता... तब तक बिट्टू देव का कमरा सजाती... पर दूर-दूर... खामोश-खामोश... बड़ा अनकहा सा प्यार था दोनों के बीच... पर प्यार बहुत था... इतना कि देव रात में दो बार बिट्टू के पीजी तक चक्कर लगा आया था... फोन किया तो पता चला बंदिश है... रात को वो नहीं आ सकती... सवेरे चार बजे देव के कमरे पर बिट्टू ने नॉक किया... देहरादून में अब बर्फ नहीं पड़ती पर बुखार में तपती बिट्टू बारिश में एक बार फिर भीग गई थी... हालांकि देव उसका हालचाल लेने औऱ एक नज़र देख भर लेने के इंतज़ार में था... पर इस तरह उसने कभी नहीं सोचा था... ये क्या पागलपन है पगली... देव ने भीगी बिट्टू को कसकर गले से लगा लिया... पहाड़ों पर अक्सर बारिश के साथ ठंड़ी हवाएं चलती हैं... उस रोज भी चल रहीं थीं... तारीख २६ जनवरी २००७... ठंड जैसे कुछ कर बैठने की कसम खाकर आई थी... उस रोज़ शायद कुछ हो जाना था...<br />देव मुझसे सहन नहीं हो रहा...<br /> बस बिट्टू इतना बोल सकी... उसमें जैसे इतनी ही ताकत बची थी... बिट्टू निडाल हो गई... ठंड में बुखार से तप रही थी... माथा जल रहा था... हाथ बिल्कुल ठंडे पड़े थे... बोल भी ऐसे निकले जैसे गले में आवाज़ निकलने की जगह ही नहीं बची हो... देव ने बिट्टू को सम्हाला... <br />देव ने जल्दी हीटर चलाया... पर गीले कपड़ों में बिट्टू की तबियत बिगड़ती जा रही थी... देव ने बिट्टू को उठाने जगाने की बहुत कोशिश की... पर उसे कोई होश नहीं था... लग रहा था कि बस उसकी सांस उखड़ रहीं हैं... पहली बार देव उसके इतने करीब था... लेकिन परेशान... घबराया हुआ औऱ लाचार सा... बिना सोचे समझे उसने बिट्टू के कपड़े उतार दिये... स्वेटर... कोट... शाल... कंबल... देव के पास जो कुछ था उससे बिट्टू को ढंक दिया... जो हो सका करने की कोशिश की... जैसे भी बिट्टू को राहत मिल सकती थी किया... पर बिट्टू बुरी तरह तप रही थी... देव की घबराहट इस कदर बढ गई कि आंखें भर आईं... गला रुंध गया... बस एक शब्द निकला... आई लव यू बिट्टू... प्लीज आंखें खोलो बिट्टू... प्लीज...<br />देव की हिचकी बंध गईं थीं... बिट्टू ने बमुश्किल आंखें खोली... होठों से कुछ बुदबुदाने की कोशिश की... पर बोल नहीं पाई... बिट्टू बिल्कुल राजकुमारी लग रही थी... किसी राजकुमार की गोद में सिमटी राजकुमारी... <br />-------------------------------------- <br /> <br /><br />जारी है...<br /><br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9811852336देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-21798138652226217572008-02-06T11:03:00.000+05:302008-02-06T11:06:49.893+05:30keep quite my dear…<a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R6lGwVkxATI/AAAAAAAAAQ4/wAlx3zNpPIc/s1600-h/life.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R6lGwVkxATI/AAAAAAAAAQ4/wAlx3zNpPIc/s320/life.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163736243996000562" /></a><br /><br />Quite.. keep Quite my dear…<br />Let me feel warmth<br /> in this child night…<br />Let me think of no mind…<br />Let me die for some time<br />& let me feel my Sole other than me…<br />Keep Quite my dear… <br />Let me know…<br />Let me know closeness of our relation… <br />Let me know the pleasure with out you & me…<br />Let me know ourselves…<br />Let me cry with out Sound my dear…<br />Keep Quite my dear…<br /> <br />… Devesh k Vashishtha ‘Khabri’<br />9811852336<br />31/01/08देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-14835833776943185062007-12-17T13:49:00.000+05:302007-12-17T14:35:00.419+05:30अप्पन समाचारबिहार के बहुत से गांवों में आज तक बिजली नहीं पहुंची है... लेकिन लोग समाचारों से रुबरु रहते हैं... गांवों में केबल कनेक्शन नहीं है पर गांव का अपना चैनल जरूर है... ये बातें सुनने में भले आपको अटपटी सी लगें पर बिहार के एक गांव में चार लड़कियां मिलकर गांव का चैनल चलाती हैं औऱ उस चैनल का नाम है अप्पन समाचार... <img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5144854079743098338" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R2YxhuROfeI/AAAAAAAAAPc/Wqqgggcn0jk/s320/APPAN+SAMACHAAR+3.jpg" border="0" />देश में खबरिया चैनल बढ़ते जा रहे हैं... एक औऱ चैनल लांच हुआ है... बिहार के एक गांव में एक ऐसे गांव में जहां न बिजली हैं औऱ न ही लोग टीवी चैनलों के ज्यादा मायने समझते हैं... गांव वाले अगर कभी कभार टीवी देख भी लेते हैं... तो शिकायत रहती है कि नेशनल चैनल उनके गांव की सुध नहीं लेते... पर इसी गांव की चार लड़कियां मिली औऱ शुरु कर दिया एक चैनल... गांव का अपना चैनल... बिहार के एक छोटे से गांव का अप्पन समाचार एक मिशन लेकर उतरा है... औऱ मिशन है अशिक्षा औऱ बुरी प्रथाएं दूर करना औऱ इस चैनल की स्टोरी भी इसी तरह के सब्जेक्ट पर रहती हैं... गांव के ही एक छोटे से घर के एक छोटे से कमरे से चलता है अप्पन समाचार...<img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5144853839224929746" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R2YxTuROfdI/AAAAAAAAAPU/of0bqWHBjeU/s320/APPAN+SAMACHAAR.jpg" border="0" /> यानी अपना समाचार... रोज सवेरे चैनल को चलाने वाली चार लड़कियां अप्पन समाचार के लिये खबरें ढूंढने निकलती हैं... कभी साइकिल पर तो कभी पैदल... छोटे से गांव की इन लड़कियों के हाथ में ट्राईपोर्ट औऱ हैण्डीकैम अब गांव वालों को अजीब नहीं लगते... छोटे से गांव की अपनी खबरें दिखाता है अप्पन चैनल... <img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5144856270176419314" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/R2YzhOROffI/AAAAAAAAAPk/A85uUe-x0Qo/s320/APPAN+SAMACHAAR1.jpg" border="0" />इनकी साइकिल की बास्केट के आगे लिखा है प्रेस औऱ उसी में रहता है अप्पन समाचार का माइक... इसी पहचान के साथ इन लड़कियों ने कम्युनिटी रेडियो की तर्ज पर गांव का अपना चैनल शुरु किया है...खबरें जुटा लेने के बाद शुरु होता है उनका पोस्ट प्रोडक्शन... ये लड़कियां एक जगह बैठकर खबरों की कॉपी लिखती हैं... उन्हें अंतिम रुप देती हैं औऱ बुलेटिन तैयार करती हैं... और उसके बाद शुरु होती है एंकरिंग... जिसके लिये इन लड़कियों में काफी क्रेज रहता है... हालांकि गांव में बिजली नहीं है... पर ये लड़कियां प्रोजेक्टर के सहारे अपनी खबरों को बाजार और चौपाल पर लोगों को दिखाती हैं...देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-22351012065795586642007-12-16T14:06:00.000+05:302007-12-16T14:08:45.718+05:30न्यूजरूम...न्यूजरूम<br />मजमा लगता है हर रोज़,<br />सवेरे से,<br />खबरों की मज़ार पर<br />और टूट पड़ते हैं गिद्दों के माफिक<br />हम...हर लाश पर<br />और कभी...<br />ठंडी सुबह...<br />उदास चेहरे,<br />कुहरे में कांपते होंठ-हाथ-पांव,<br />और दो मिनट की फुर्सत...<br />काटने दौड़ती है आजकल<br />अब शरीर गवाही नहीं देता सुस्ती की...<br />न दिन में और न रात में...<br />जरूरी नहीं रहे दोस्त...<br />दुश्मन...<br />अपने...<br />बहुत अपने<br />ज्यादा खास हो गयी है<br />फूटी आंख न सुहाने वाली<br />टेलीफोन की वो घंटी...<br />जो नींद लगने से पहले उठाती है...<br />और खुद को दो चार गालियां देकर...<br />फिर चल पड़ता हूं...<br />चीड़ फाड़ करने...<br />न्यूजरुम में...देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-62687507236329730742007-10-24T19:23:00.001+05:302007-10-24T19:23:04.195+05:30...ले आऊं एक जोड़ी सांस<a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rx9Nw4BzKyI/AAAAAAAAAJw/R0JAV8Y_l0o/s1600-h/hands-open.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5124900403039906594" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rx9Nw4BzKyI/AAAAAAAAAJw/R0JAV8Y_l0o/s200/hands-open.jpg" border="0" /></a><br /><div><a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rx9Ng4BzKxI/AAAAAAAAAJo/danzxPDFKbM/s1600-h/hands-open.jpg"></a><br /><div><br /><br /><br /><br /><br /><br />कभी कभी <span class="">बनना</span> पड़ता है<br />सख्त दिल...<br />इतना सख्त<br />कि घुटने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं...<br />इतना सख्त…<br />कि सब पैबन्द, पैबस्त हो जाते हैं<br />अपने आप...<br />कभी कभी<br />जब अतीत के पंख लगे दिन<br />जंजीर बनकर गर्म गर्म<br />तपाते रहते हैं...<br />कभी कभी<br />कुछ समझदारियां<br />जिंदगी की सबसे बड़ी भूल लगने लगती हैं...<br />तब खूब घुटने का दिल करता है...<br />पर यार इस तमन्ना पर भी<br />बड़ा होने का अहसास<br />तमाचा मार जाता है...<br />वो नासमझियां क्यों पीछे छोड़ दी मैंने...?<br />क्यों हो गया हूं इतना बड़ा<br />कि सब छूट गया<br />बहुत पीछे...<br />कभी कभी<br />दिल करता है<br />कि झुककर उठा लूं सब जो बिखर गया है...<br />दिल करता है<br />कि चूम लू एक एक किरच<br />और फिर जोड़ लूं...<br />और ले आऊं एक जोड़ी सांस<br />पुरानी वाली...<br />पर सब रास्ते बंद कर लिये हैं मैंने...<br />इतने सख्त,<br />कि अब घुट भी नहीं पाता<br />सांस लेकर....<br /><br />देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’ </div><div><a href="mailto:devesh.tecindia@gmail.com">devesh.tecindia@gmail.com</a></div></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-55257984439489214142007-07-04T20:49:00.000+05:302007-07-04T20:49:15.447+05:30बडे़ भाई की ब्लोगर मीटभाई साहब हम पत्रकारों की जात ही ऐसी होती है कि पाँच सितारा होटलों में भी मान मनौब्बत करवाकर ही पहुँचते हैं। पर इस बार बिन बुलाये भी पहुँच गये थे। <em><em><strong>मनीष भाई रांची वाले</strong></em></em>, रांची से दिल्ली पधारे थे।मनीष जी के संस्मरण तो खूब पढे थे, पर पहली बार उनके पीछे का स्टिंग हाथ लगा। मैंने स्कूप ढूँढ लिया कि मनीष जी इतने यात्रा टाइप संस्मरण इसलिये लिख लेते हैं क्योंकि उन्हैं <strong>स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया</strong> की मैनेजरी प्राप्त है। सुगबुगाहट थीं कि बहुत जल्दी <strong>'मेरा दिल्ली संस्मरण' </strong>भी मनीष जी लिख ही डालेंगे। खैर जैसे मनीष जी का 'सेल' हर किसी की जिंदगी से जुडा है, वैसे उन्होंने भी दिल्ली के ब्लोगर दोस्तों से मिलने की ठानी, कुछ <strong>नारदीय रॉ एजेण्टों </strong>को विशेष रिक्रूट किया गया पता लगाने को कि दिल्ली के ब्लोगर कहाँ कहाँ अण्डरग्राउण्ड हैं? साहब खोद खोद कर फुनियाये गये। पर हमारा नसीब कहें या अति सतर्कता हमारे नोकिया 1110 तक एक भी घन्टी नहीं आई। पर इसमें मनीष जी की गलती भी कहाँ है? वो दिल्ली के ब्लोगरों से मिलना चाह रहे थे, <strong>पर विश्व के सर्वश्रेष्ठ कवि/पत्रकार/ब्लोगर </strong>यानी मैंने पैदा लेने का जुर्म तो आगरा में किया था, सो हम तो हुऐ <strong>'आगरी'</strong>। फिर मनीष जी की <strong>देहलवी थीम </strong>पर कैसे फिट बैठ पाते? पर आजकल हम दिल्ली गेट से लाल किले और मूलचंद से पालम के फ्लाईओवरो पर झक मार रहे थे सो <strong>संगीतकार मित्र सजीव सारथी </strong>जी ने जबरन हमें भी घसीट लिया। <br /><a href="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RonmUpMXiRI/AAAAAAAAAGE/R3lBXw0mzVY/s1600-h/DSC01958.jpg"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RonmUpMXiRI/AAAAAAAAAGE/R3lBXw0mzVY/s320/DSC01958.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5082846896793815314" /></a><br />(चित्र में बायें से शैलेश भारतवासी,सजीव सारथी, देवेश खबरी यानि मैं खुद :), , अमित गुप्ता, मनीष ,अरुण अरोड़ा,जगदीश भाटिया <br /><br />खैर, <strong>होटल पार्क </strong>में हुई ब्लोगर मैत्री मीट में हमने एकमात्र बिन बुलाऐ मेहमान का एक्सक्लूसिव फर्ज अदा किया। पर ज्यादा मजा तो तब आया जब <strong>हर इतवार 'हिन्द युग्म' </strong>पर कविता के स्तर को बनाये रखने की सख्त हिदायत देकर पुचकारने वाले युग्मेश्वर <strong>शैलेष भारतवासी </strong>जी पहने से ही एक्सक्लूसिव की जुगाड़मेंट में बैठे थे। उस दिन मैं नबाबी-पत्रकारी-झोला छाप स्टाइल में था,गालों पर फ्रेन्च कट, बदन पर झनझना लाल कुर्ता और जूट का थैला। बिल्कुल 1947 की लव स्टोरीज की बीट पर काम करने वाले पत्रकार के माफिक। यकीन मानिये इस पहनावे का इतना असर हुआ कि मनीष जी ने तुरंत एक मात्र अलग रखी कुर्सी मेरी तरफ खिसका दी। अब तक मेरी नजर <strong>पंगेबाज</strong> पर नहीं गयी थी, पिछली ब्लोगर मीट (मैथली जी वाली) में अरुण जी और अविनाश जी का फोटो एक साथ मैंने ही खींचा था, सो डर लगना स्वाभाविक था। जी नजरें मिलीं दुअ सलाम हुई और मैंने कुर्सी थोडी खिसकाकर <strong>'अमित जी'</strong> के पास कर ली। अमित जी के पास चूँकि पावर ऑफ अटॅर्नी है एसे में किसी भी पंगे से मुझे वही बचा सकते थे। खैर जब तक पंगेबाज मैदान में रहे मेरे बोल नहीं फूटे। उनके साथ <strong>मैथली जी</strong> भी थे। जिनके बस इतने ही शब्द मैं सभी के लिये कट-कॉपी-पेस्ट की तरह सुन सका-<br /> "अरे! आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।" <br />खैर जनाब पंगेबाज जी का पंगे का वक्त हो गया था और मैथली जी का नयी खोजों का। सो दोंनों जल्दी चले गये। मैंने सोचा चलो जान बची, पर असली तो अब अटकी थी। उस दिन <strong>अमित जी</strong> और <strong>मनीष जी</strong> के साथ मिलकर <strong>पत्रकारों से आहत जगदीश भाटिया जी</strong> की तिकडी के बीच मुझे अपना पत्रकार बताना महँगा पड गया। फिर क्या क्या हुआ अगली बार बताऊँगा।<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-5636145085944779962007-06-20T20:41:00.001+05:302007-06-20T20:41:04.625+05:30फिर उठा,लडखडाया,उड़ गया।<a href="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RnlDNrw1EWI/AAAAAAAAAFo/uLyK_Sk9icg/s1600-h/untitled.bmp"><img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RnlDNrw1EWI/AAAAAAAAAFo/uLyK_Sk9icg/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5078163957201834338" /></a><br />परिंदा उडा,<br />लडखडाया,<br />गिर गया।<br />फिर उठा,<br />लडखडाया,<br />गिर गया।<br />आसमान ने धक्का मारा,<br />धरती ने जंजीर डाल दी।<br />पखेरू भी उड़ गये साथ के।<br />पंछी नवेला,<br />बैठा अकेला।<br />गुमसुम,<br />चुपचाप,<br />पसीना,<br />घुटन,<br />कांप<br />सारी रात रोया,<br />चिल्लाया,<br />डरा,<br />म्यांउ की हर घुडकी पर<br />कई कई बार मरा। <br />पैरों में खो गया<br />पागल सा हो गया।<br />जंजीर बहुत गर्म हो गई,<br />जलाने लगी,<br />प्यास लगी,<br />भूख कलेजे तक आने लगी,<br />सब उम्मीद मिट गईं,<br />सब अरमान खो गए।<br />सारे सपने जैसे नींद में सो गए।<br />उसे आकाश नहीं मिला<br />और धरती भी नहीं बची<br />कुछ बोने को,<br />पर अब क्या बचा था<br />खोने को?<br />परिंदा उडा,<br />लडखडाया,<br />गिर गया।<br />फिर उठा,<br />लडखडाया,<br />उड़ गया।<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9811852336देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-81928838259118288942007-06-07T22:02:00.000+05:302007-06-07T22:02:52.304+05:30फिर बचेगा क्या......?<a href="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RmgzGbw1EUI/AAAAAAAAAFY/mz0oYablcIA/s1600-h/untitled.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5073361165857657154" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RmgzGbw1EUI/AAAAAAAAAFY/mz0oYablcIA/s320/untitled.bmp" border="0" /></a><br /><div>सोचता हूँ,<br />खुरच कर मिटा दूँ<br />उस रात के निशां,<br />अपने जिस्म से।<br />हटा दूँ सारे पैबंद,<br />तेरे नाम के-<br />अपनी हर कविता से।<br />तोड दूँ वो हर कडी,<br />जो भेज देती है वहीं।<br />अब छोड भी दूँ तेरा साथ<br />तेरे जाने के बाद।<br />एक वो सादा सा चेहरा,<br />जी तलक जो जा छिपा है,<br />सोचता हूँ ढूँढ लाऊँ,<br />और दरवाजे चढा दूँ।<br />सोचता हूँ अब फैंक भी दूँ<br />बाल जो उलझे पडे़ हैं,<br />कंघी में ।<br />कुछ चूडियों के टुकडे<br />संभाले बैठा हूँ अब तक।<br />तुम्हैं याद है, जब जोर से<br />मैंने तुम्हारी कलाई पकडी थी।<br />इतनी जोर से कि....<br />और वो गुड्डा तुम्हारा...<br />मेरे पास है,<br />वो कॉफी का कप,<br />वो बिस्किट का रैपर,<br />तेरी छुई हर चीज मेरे पास है।<br />सोचता हूँ, सब हटा दूँ।<br />पर फिर बचेगा क्या......?<br />'देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9811852336<br />(दिल्ली)</div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-70948603764792256412007-06-05T14:50:00.001+05:302007-06-05T14:50:25.720+05:30मैनें कुछ नहीं छोडा है तुम्हारे लिये।<div align="center"><a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RmUnBbw1ETI/AAAAAAAAAFQ/4OQ-0u40R7k/s1600-h/181550_gurjar10.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5072503460888645938" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RmUnBbw1ETI/AAAAAAAAAFQ/4OQ-0u40R7k/s320/181550_gurjar10.jpg" border="0" /></a><br />नंदीग्राम में फिर फाइरिंग हुई है!<br />वहाँ के किसान उपद्रवी हैं<br />उनका पेशा अलग है आज से।<br />पंजाब में खून खराबा हो सकता है,<br />आखिर धर्म की इज्जत का सवाल है।<br />असम में भी मारे गये हैं कुछ लोग आज,<br />वो हिन्दी बोलते थे।<br />राजस्थान सुलग रहा है.....।<br />......आज दिल्ली बंद है।<br />दो बस जला दी गयी हैं सवेरे-सवेरे,<br />दो आदमी भी चौराहे पर....<br />दो पुलिस वाले..<br />दो गुज्जर..<br />दो मीणा..<br />दो ब्राह्मण..<br />दो जाट..<br />दो हिन्दी भाषी..<br />दो.<br />दो..<br />दो...<br />सब माँग रहे हैं कुछ-कुछ।<br />किसी को जमीन चाहिये,<br />किसी को सत्ता,<br />किसी को नौकरी,<br />और किसी को रोटी।<br />हर चीज मिलेगी।<br />रूस की क्रांति की तरह,<br />जब मर जायेगी आधे से ज्यादा आबादी<br />महान होकर...क्रांति के नाम पर।<br />फिर सब मरघट आबाद हो जाऐंगें।<br />वहाँ किसी की दुनाली,<br />किसी की लाठी,<br />किसी के फरसे,<br />और कहीं कहीं बिना गले में लटकाये कुछ टायर जलाए जायेंगे।<br />तब मिटेंगें ये हथियार,<br />ये वार।<br />ऐ मेरी अगली पीढी,<br />माफ कर देना मुझे।<br />मैं जल्द मर जाऊँगा,<br />किसी न किसी आंदोलन की खातिर।<br />बिना कुछ किये तुम्हारे लिये।<br />पर तुम्हें नई दुनिया बनानी है।<br />जहाँ सब इंसान रहना,<br />तब मुझे याद मत करना मेरे बेटे।<br />भुला देना मेरी हर बात,<br />याद,<br />इतिहास,<br />मुझे याद करोगे तो याद आयेगी<br />मेरी जात... मेरी औकात...17%,... 27%....<br />या फिर मुझे सामान्य करार देना।<br />मेरी हर तलवार का हिसाब लेना।<br />फिर गालियाँ देना मुझे,<br />थूकना मेरे चित्र पर,<br />दशहरे पर जलाना मेरा पुतला।<br />पर जला देना सारी नफरत, मेरे साथ।<br />कुछ मत रखना संजोकर विरासत में,<br />क्योंकि मैनें कुछ नहीं छोडा है तुम्हारे लिये।<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9811852336 </div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-21027999919675027972007-05-26T19:58:00.000+05:302007-05-26T19:58:44.904+05:30चोरी करनी है!<a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RlhDbMOFL7I/AAAAAAAAAD8/414FBwC26IY/s1600-h/trek.palong3"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5068875515021307826" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RlhDbMOFL7I/AAAAAAAAAD8/414FBwC26IY/s200/trek.palong3" border="0" /></a><br /><div><br /><div><br /><div><br /><br /><div> </div><div> </div><div>यार कोई तरक़ीब बता</div><div>तरक़ीब बता,</div><div>पच्चीस पैसे की जुगाड़ की।</div><div>वो वाले पच्चीस पैसे,</div><div>जिसकी चार संतरे वाली गोलियाँ आती थीं।</div><div>तरक़ीब बता,</div><div>चोरी करनी है!</div><div>अपने ही घर में कटोरी भर अनाज की...।</div><div>आज सपने में भोंपू वाली बर्फ़ बिकी थी!</div><div>मुझे 'पीछे देखो मार खाई' वाले खेल </div><div>दोबारा खेलने हैं...</div><div>जानी-अनजानी गोदों को,</div><div>अंकल,आण्टी,चाचा, ताई,मौसी,</div><div>दीदी,मामा,नाना,दादा,दादी कहना है।</div><div>यार क्या इतना बड़ा हो गया हूँ,</div><div>कि रोज़ काम पर जाना पड़ेगा?</div><div>ट्यूशन वाले मास्टर जी का काम नहीं किया है,</div><div>' आज फिर पेट दर्द का बहाना बना लूँ॰॰॰'?</div><div>ये रोज़-रोज़ के प्रीतिभोज बेस्वादे हैं।</div><div>अगली रामनवमी का इंतज़ार करूँगा।</div><div>खूब घरों में जाऊँगा 'लांगुरा' बनकर।</div><div>खूब पैसे मिलेंगे तब...</div><div>शाकालाका वाली पेंसिल खरीदकर </div><div>चिढाऊँगा दोस्तों को।</div><div>वो 'जवान' है, </div><div>नज़रें चुरा लेती है।</div><div>चल उससे बचपन वाली होली खेलते हैं,</div><div>यार चल कुछ 'सद्दा' लूटें॰॰</div><div>मुझे पतंग उड़ानी है॰॰॰॰।</div><div> </div><div><a href="http://kaviparichay.blogspot.com/2007/05/blog-post_12.html">देवेश वशिष्ठ'खबरी'</a></div><div>9811852336</div><div><a href="http://merekavimitra.blogspot.com/2007/05/blog-post_13.html">यह कविता १३ मई २००७ को 'हिन्द-युग्म' पर प्रकाशित है।</a></div></div></div></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-70410449783086678552007-05-10T13:58:00.000+05:302007-05-10T13:58:26.576+05:30शायद मर गया हूँ मैं।<a href="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RkKjVHjA4dI/AAAAAAAAACU/7i3KVkKFJmc/s1600-h/4114411884.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5062788514316345810" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RkKjVHjA4dI/AAAAAAAAACU/7i3KVkKFJmc/s200/4114411884.jpg" border="0" /></a><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">गुम गया हूँ मैं,</span> </div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">मिट गये हैं-</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">अतीत के चलचित्र।</span> <a href="http://bp0.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RkKihHjA4bI/AAAAAAAAACE/zcddA6Kk4HI/s1600-h/dhyan1.jpg"></a><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">धुँधले अक्स, </span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">बातें,</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">यादें,</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">पीङाऐं।</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">गुम गयीं हैं सारी स्मृतियाँ,</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">और गुम हो गया है भविष्य भी,</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">तुम्हारे साथ, </span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">गुम गया हूँ मैं।</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">अब कल्पना नहीं है,</span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">न समय है, </span><br /></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">न आकाश।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">कुछ नहीं बचा है मेरे लिये।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">खो दिया है सब कुछ ।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">अब हाथ पैर नहीं पटकता,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">किसी चमकी को देखकर,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">चीखता नहीं हूँ चोट खाकर,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">चुप हो गया हूँ मैं।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">शायद मर गया हूँ मैं।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">आ लगा हूँ निर्जन द्वीप पर,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">पर वहाँ तुम रहते हो।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">होठों के पार...</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">इस बार तुम ज्यादा पास हो,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">भीतर तक... </span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">बिल्कुल सक्रिय।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">मैं समाधि में हूँ....।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">श्श्श्श....... तुम भी गुम जाओ, </span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">मेरे साथ।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">देवेश वशिष्ठ 'खबरी'</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">9410173698 </span></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-76697889638666102552007-05-06T10:02:00.000+05:302007-05-06T10:02:55.227+05:30यहाँ हिन्दू मुसलमान रहते हैं! 'आबाद'...<a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rjxdz3jA4ZI/AAAAAAAAAB0/94XeQ0nBVb0/s1600-h/bapu.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5061023226923114898" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rjxdz3jA4ZI/AAAAAAAAAB0/94XeQ0nBVb0/s200/bapu.jpg" border="0" /></a><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">एक हिन्दू ने</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">एक आदमी मार दिया...,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">एक मुसलमान ने </span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">उसकी बीबी की इज्जत लूटी...,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">... मजे से,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">किसी ने नहीं रोका।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">फिर दोंनों ने मिलकर</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">उसका घर जला दिया...।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">कुछ और आदमी थे उस मोहल्ले मैं,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">मार दिये गये...</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">अब वहाँ बस,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">हिन्दू मुसलमान रहते हैं...</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">...आबाद!!</span></div><br /><div align="center"></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">देवेश वशिष्ठ 'खबरी'</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">9410361798</span></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-85613318238995471802007-05-05T16:08:00.000+05:302007-05-05T16:08:13.875+05:30ऐ मेरे मालिक, मुझे एक रबर दे दे,<a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RjLPU3jA4XI/AAAAAAAAABk/57BNXsMmlPM/s1600-h/UN_ASIA_MAP3.jpg"><span style="font-size:85%;color:#990000;"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5058333288905630066" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RjLPU3jA4XI/AAAAAAAAABk/57BNXsMmlPM/s200/UN_ASIA_MAP3.jpg" border="0" /></span></a><span style="color:#990000;"><span style="font-size:85%;"> ऐ मेरे मालिक,<br />मुझे तू ऐसी रबर दे दे,<br />जिससे इस पन्ने पर उकरी<br />कुछ तिरछी रेखाऔं को हटा सकूँ।<br />भेद मिटा सकूँ,<br />सफेदपोश कोरे कागज को<br />सही राह दिखा सकूँ।<br />यहाँ वहाँ को एक बना सकूँ,<br />माटी के खिलौनौं को<br />टूटने से बचा सकूँ।<br />गुल खिला सकूँ,<br />दिल मिला सकूँ<br />ऐ मेरे मालिक<br />तू मुझे वो दिल दे दे,<br />जिससे किसी के काम आ सकूँ,<br />उसके मन की नफरत से झलकते प्यार को<br />बाहर ला सकूँ।<br />भाई को भाई से मिला सकूँ,<br />गा सकूँ, गवा सकूँ<br />हँस सकूँ, हँसा सकूँ।<br />ऐ मेरे खुदा<br />तू मुझे ऐसी मुहब्बत दे दे<br />गैरों को अपना बना सकूँ,<br />दुश्मनी मिटा सकूँ,<br />दोस्त बना सकूँ।<br />जहर को भी पचा सकूँ,<br />राम और रहीम के<br />और पास आ सकूँ।<br />ऐ मेरे खुदा<br />तू भले मुझे कुछ मत दे,<br />पर थोडी इंसानियत दे दे,<br />जिससे एक जानवर को<br />फिर से इंसान बना सकूँ,<br />..... मैं किसी के काम आ सकूँ।<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9410361798</span><br /></span><div><span style="font-size:85%;"></span></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-76080110519327317022007-04-30T13:00:00.000+05:302007-04-30T13:00:37.372+05:30कहाँ रुके हैं बढे कदम।<a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RjWa3HjA4YI/AAAAAAAAABs/alrrK4X2hjM/s1600-h/Untitled-1+copy.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5059120028130009474" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RjWa3HjA4YI/AAAAAAAAABs/alrrK4X2hjM/s200/Untitled-1+copy.jpg" border="0" /></a><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">बढे कदम, उठे कदम,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">पदचिन्हों पर चले कदम।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">कही अनकही एक कहानी,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">चुपके से कह चले कदम।</span></div><br /><div align="center"><br /><span style="font-size:85%;">चकमक मंजिल देख भ्रमित हो,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">आशाओं ने छले कदम</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">ठोकर लगी जाम से झलके,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">उपमानों से भले कदम।</span></div><br /><div align="center"><br /><span style="font-size:85%;">पन्नों पर काजल सी रेखा,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">भावों के नभ तले कदम।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">सब रुक जाऐं भले जहाँ में,</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">कहाँ रुके हैं बढे कदम।</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">देवेश वशिष्ठ 'खबरी'</span></div><br /><div align="center"><span style="font-size:85%;">9410361798</span></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-42404801725887586602007-04-28T10:17:00.000+05:302007-04-28T10:17:01.375+05:30चल यार आज बेबात हँसें!<div><a href="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RiCw35Sl9II/AAAAAAAAABE/wOHYcxhzxkQ/s1600-h/IMGA0244.JPG"></a></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार आज <a href="http://bp3.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/RiCvqJSl9HI/AAAAAAAAAA8/13mzoMQ5-Xk/s1600-h/IMGA0244.JPG"></a>बेबात हँसें,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">कोई बात चले इससे पहले।</span> </div><div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">आ तुझको आखों में भर लूँ,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">घर को उड़ने से पहले।</span> </div><div></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार दोबारा उसी जगह,</span><br /><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">बेठें बिल्कुल अनजानों से,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल कर लें फिर से वही हाल,</span><br /><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">अपने अपने दीवानों से।</span> </div><div></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">फिर तुम कहना कुछ, </span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">कुछ मैं कह दूँ,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">सब लोग कहैं इससे पहले।</span><br /><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार आज बेबात हँसें,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">कोई बात चले इससे पहले।</span></div><div><span style="font-size:85%;color:#339999;"></span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार वहीं पर, उन्हीं दिनों ,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">जब थी खुश तू भी, खुश मैं भी।</span><br /><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">हर बात तेरी थी तब भारी,</span> </div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">हर बात मेरी थी तब वजनी।</span></div><div><span style="font-size:85%;color:#339999;"></span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">मैं तुझको कुछ था, कुछ तू मुझको,</span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">सब कुछ बनने से पहले,</span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार आज बेबात हँसें,</span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">कोई बात चले इससे पहले।</span></div><div><span style="font-size:85%;color:#339999;"></span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल बैठ वहीं देखूगाँ तुझको,</span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चोरी चोरी चुपके चुपके।</span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">फिर करना वो बातें मेरी, </span></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">अपनी उसी सहेली से।</span></div><div></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल फिर से इकरार करें </span><br /></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">हम वैसे ही चोरी चोरी।</span><br /></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">आ तुझको यादों में भर लूँ, </span><br /></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">घर को उड़ने से पहले।</span><br /></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">चल यार आज बेबात हँसें,<br />कोई बात चले इससे पहले।</span></div><div><span style="font-size:85%;color:#339999;"></span></div><br /><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">देवेश वशिष्ठ 'खबरी'</span><br /></div><div><span style="font-family:georgia;font-size:85%;color:#339999;">9410361798</span></div></div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-79100976569945974992007-04-04T09:27:00.000+05:302007-04-04T09:27:50.930+05:30मेरे खेत की तहजीब।दिल्ली की कभी ना रूकने वाली और मुंबई की कभी ना झुकने वाली जींदगी के बीच एक और सभ्यता-संस्कृति है। वहाँ कहीं भोग के पेडों का निराला स्वाद है तो कहीं पेठे की कई रंगों में मिठास। बडी भागम-भाग तो यहाँ नहीं है पर अब सुकून भी छिन गया है। जी मैं दौरा कर रहा हूँ ब्रज की तहजीब का ।<br /><div align="left">ब्रज , यानी मथुरा,वृंदावन, आगरा और भरतपुर। ब्रज, यानि कान्हा का आँगन!वो संस्कृति जहाँ घरों से ज्यादा मंदिर हैं आर लोगों से ज्यादा रिश्ते। पुराना भारत अभी सिमटा जरूर है पर आज भी गालिब, नजीर और ताज के माहौल में जिंदा है।यहाँ मुशायरों पर भी खूब भीड जमती है और अब जरीवाला के लटकों का भी लडकपन कायल है। लडकियों को घर से बाहर भेजा जाने लगा है पर अभी नजर रखी जाती है। इतिहास बिखरा पडा है। कान्हा की यशोदा ने जितने नाम उसके नहीं रखे होंगे उससे ज्यादा नामों के अवशेष यहाँ वहाँ खूब हैं। छाछ दूध की अब भी कमी नहीं है पर अब बच्चों को कोक ज्यादा पसंद है। कैरियर की फिक्र से इनके माथे पर भी सलवटें आ जाती हैं, पर धूँए के छल्लों ने ज्यादा देर टेंशन में न रहना इन्हें सिखा दिया है। यमुना को माँ कहते हैं, पूजा करते हैं आचमनी भी ले लेते हैं पर कचरा मलवा और गन्दगी फेकने में भी गुरेज नहीं करते। पेडे की मिठास बरकरार है, पर पेठे की मिठाई थोडी कडवी हो गयी है। आगरा दिल्ली बनने की कोशिश में है।सुनने में आया है कि मेट्रोज़ में शुमार हो गया है।सुबह-सुबह ट्रेफिक की लाल बत्ती को अगूँठा दिखाते ये नौजवान एक मोटर-साइकिल पर कम से कम तीन की विषम संख्या में सुबह आई॰ऐ॰एस की कोचिंग जाते हैं और फिर हर शाम तेरे नाम। पेठ और पेडे़ के शहरों का इतिहास सुर्ख और गुलाबी मोहब्बत ने लिखा है। एक ओर राधा-कृष्ण की पूजा होती है तो दूसरी ओर शाहजहाँ-मुमताज का सफेद पाक मकबरा दूर दूर के सैलानियों से कहता है कि 'मोहब्बत ऐसे करते हैं'। पर अभी खुले आम मोहब्बत पर बंदिशें हैं, प्रेमियों को यहाँ कोई ठौर नसीब नहीं है। झाडियों में छिपते हैं तो बदनसीब पुलिसिया डंडा पाँच के नोट की ख्वाहिश में उन्हैं इश्क नहीं करने देता, और कहीं वैलेन्टाइन पर गुलाब देने का मन बना लिया, तो बजरंग दल और शिवसेना के हर माह मनोनीत होने वाले नेता उन्हें जीने नहीं देते। अभी सुबह-सुबह उठकर माँ-बाप के पैर छूने की परंपरा कहीं कहीं बची है पर उन्हीं को मारकर संगीन उठाने वाले भी चंबल की आबादी बढा रहे हैं।यहाँ टूटे नाले, उखडे खरंजे और खुले सीवर नगरपालिका में अर्जी देने से नहीं, जाम लगाने से दुरूस्त होते हैं। यहाँ के लोगों को ये रास्ते बखूबी पता चल गये हैं इसलिये ट्रांसफार्मर फुंकने की शिकायतें सीधे प्रधानमंत्री के नाम ग्यापन लिख कर की जाती हैं और उसके प्रेस नोटिस हर शाम आखबारी दप्तरों में पहुँचा दिये जाते हैं।यमुना किनारे तक कॉलोनियाँ बन गयीं हैं,और अब फ्लाईओवर भी बनने लगे हैं,पर ताज के सामने पत्थरों का ठेर लगाकर सरकार को बनाने और गिराने का खेल भी यहीं से चला है।लोग अब कुर्ता-धोती छोड चुके हैं, पेंट शर्ट से भी तौबा करने लगे हैं, लूज ट्रेंडी ट्राउजर और वी गले की टी-शर्ट बदन पर दिखने लगी हैं। जिमखाने सुबह-शाम भरे रहते हैं और फूले सीनों के साथ आखों पर चढा मासनस दो का चश्मा बताता है कि हम लोग सेहत का तो खयाल रखते हैं पर पढाई का भी। खैर अब सब मॉर्डनाइज्ड हो रहा है। पुरानी तहजीब धीरे-धीरे दम तोड रही है , पर नयी हवाऔं में सास लेने की आदत ये दाल चुके हैं।आखिर ब्रज विकसित हो रहा है। </div><div align="left">देवेश वशिष्ठ 'खबरी' </div><div align="left">09410381798 </div>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-28713517652949733052007-03-31T09:53:00.000+05:302007-03-31T09:53:22.653+05:30अब तो डर भी नहीं<p>तुझसे जब मेरी कोई बात चलती है,</p><p>तू मुझे मुझसे भी बेहतर समझती है!</p><p>.............................................................</p><p></p><p></p><p>दर्द ओ गम पर,मैं मरहम लगाता गया।</p><p>तू सुनती रही,गुनगुनाता गया।</p><p>मुझको नाजुक सी खुशियाँ,हमेशा से थीं.</p><p>मैं ही उन पर, परदे लगाता गया।</p><p>चूमकर जो चखा,तेरे नूर को,</p><p>जितना तैरा मैं उतना समाता गया।</p><p>तेरी दौलत, मुहब्बत की बरसात है।</p><p>मुस्कुराते लवों पर क्या बात है ?</p><p>मुझको कह दे,जो कुछ है दिल में चला।</p><p>कहीं फिर ये मौसम,चला जाये ना।</p><p>मेरी हर छुअन,अब अमानत तेरी,</p><p>पास आ करवटों में समाता गया।</p><p>इस उनींदी पलक में है कोई बसा,</p><p>मुस्कुराहट में भी होता है नशा।</p><p>ये बातें, ये रातें,बडी हैं नयी,</p><p>अब तो डर भी नहीं खोने का कहीं,</p><p>बिन कहे मैं कहानी सुनाता गया।</p><p>तू सुनती रही,गुनगुनाता गया।</p><p></p><p>.................................<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'</p><p>9410361798</p>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-41879986877303721792007-03-30T17:35:00.000+05:302007-03-30T17:35:00.276+05:30......श्री कृष्णम् समर्पयामी।<a href="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rgz8DFTcaNI/AAAAAAAAAA0/zgMbq0kEPkg/s1600-h/untitled.bmp"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5047686412269021394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rgz8DFTcaNI/AAAAAAAAAA0/zgMbq0kEPkg/s200/untitled.bmp" border="0" /></a><br /><p align="left"><span style="font-family:verdana;"><span style="color:#cc6600;"><span style="font-size:130%;">मैं,</span><br />मेरी सोच, </span><a href="http://bp1.blogger.com/_-4i8e8NuuM4/Rgz3m1TcaII/AAAAAAAAAAM/fzbi8o6lFZQ/s1600-h/2982060859.jpg"></a><br /><span style="color:#cc6600;">मेरे खयाल,<br />जीया हुआ हर दिन,<br />काटे गये महीने,<br />और बितायी हर साल।<br />हर हद तक गया अनुराग,<br />परिपक्वता,<br />और फिर चुंबक के एक से छोरों सा वैराग।<br />मेरा सारा आलस, सारे काम,<br />मेरे से टूटा और जुङा हर नाम,<br />कूट-कूट कर भरे व्यसन, वासना, दुर्विचार,<br />मेरा अहंकार,<br />हर दिन की जीत ,<br />हर रोज़ की हार,<br />मेरा प्रेम,<br />समर्पण,<br />मेरा जुङाव और भटकाव,<br />टूटन, तडपन खुद का चिंतन,<br />कंठ तक भरा रीतापन,<br />मजे में डूबी हर एक बात,<br />मुझे उठाने और गिराने मैं लगे सैंकङों हाथ,<br />उसकी नफरत, मेरा प्यार,<br />हर अनुभव, हर चोट, हर मार,<br />सारी प्राप्तियाँ, सारे आनंद, सारे सुकून,<br />मुझसे जुडा हर काला, सफेद, तोतई और मरुन,<br />मेरी सारी ताकत,<br />सारी खामी,<br />.....श्री कृष्णम् समर्पयामी।<br />देवेश वशिष्ठ ' खबरी '</span></span><span style="font-family:verdana;color:#cc6600;"><br />9410361798</span></p>देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-62795184826659512812007-03-30T17:01:00.000+05:302007-03-30T17:01:45.990+05:30कहाँ सांझ है ?कहाँ सवेरा ?चुप है मन,<br />थकियारा तन,<br />चुपचाप चला जाता जीवन॰॰<br />कम होता है,<br />धीरे-धीरे<br />साँसों का चलता घर्षण।<br /><br />कैसा सुख?<br />फिर कैसा दुःख ?<br />उदासीनता का आँचल।<br />कहाँ सांझ है ?<br />कहाँ सवेरा ?<br />आ बैठा है अस्ताचल।<br /><br />चलता हूँ,<br />रुक जाता हूँ,<br />मुडकर देखूँ क्या पीछे... ?<br />शायद कोई छूट गया है,<br />मिटकर भावों के नीचे।<br /><br />लेकिन दिखता नहीं कहीं कुछ,<br />दूर-दूर तक उडती धूल,<br />चेहरा मेरा खिला कहाँ है?<br />कहाँ खिले दिल में<br />दो शूल?<br /><br />बतलाओगे कैसा सूखा ?<br />कैसी होती है कलकल ?<br />मैंने कब का ओढ लिया है<br />उदासीनता का आँचल।<br /><br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9410361798देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-7187648578117038762007-03-29T10:28:00.001+05:302007-03-29T10:28:22.875+05:30होली वाटरहर प्रतिमा का चरणामृत,<br />गुरुद्वारे का अमृत,<br />मस्जिद की आबोहयात,<br />और बडे वाले गिरजे का,<br />होली वाटर।<br />॰॰॰कुछ नहीं चखा मैंने।<br />पर वो दिन याद है<br />॰॰॰गुनगुना पानी लायीं थी तुम।<br />...जानू सर्दी हो गयी है तुम्हैं,<br />ठंडा पानी मत पीना,<br />प्लीज..<br />और खूब खयाल रखना अपना।<br />और मैं पागल,<br />बोला,<br />तुम हो ना,<br />मेरा खयाल रखने को।<br />अब पानी फीका लगता है,<br />बेरंगा॰॰॰बेस्वाद॰॰॰<br />पर वो दिन याद हैं,<br />जब पानी रंगीन हो जाता था,<br />तुम्हैं छूकर।<br />अब मेरे गाल का वो पिंपल ठीक हो गया है,<br />जुकाम भी नहीं है,<br />मौसम भी गरम है।<br />तुम आज भी मेरा खयाल रखती हो,<br />पर क्या जाना जरूरी था?<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9410361798देवेश वशिष्ठ ' खबरी 'http://www.blogger.com/profile/03089045465753357873noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-7846541619202827516.post-82760174615408958212007-03-29T10:28:00.000+05:302007-03-29T10:28:07.902+05:30मुझे यकीन है,<span style="font-family:times new roman;">मुझे यकीन है,<br />एक दिन आएगा उसका खत,<br />बजेगी घन्टी मेरे मोबाइल की,<br />या फिर स्कैप </span><br /><span style="font-family:times new roman;">औरकुट पर॰॰॰॰<br /><br />या फिर कहेगी </span><br /><span style="font-family:times new roman;">अपने दिल की बात,<br />अपने किसी दोस्त को,<br />और चुपचाप बता देगा वो मुझे,<br />शायद...।<br /><br />एक दिन डाँटेगी वो मुझे,<br />कितने सुस्त हो,<br />॰॰॰ पागल। मेरी तरह।<br />और तब डबडब आखों में</span><br /><span style="font-family:times new roman;">ढूँढ लूँगा मैं खुद को।<br />एक दिन बुलायेगी वो मुझको,<br />बस करो॰॰॰ मैं समझती हूँ।<br />पर क्या सब कुछ कहना जरुरी होता है॰॰?<br />उसका नाज़ुक और पसीजा़ हुआ हाथ,<br />रख लूँगा दिल पर,<br />तब रोउँगा थोडी देर॰॰॰॰ उसकी गोद मैं।<br /><br />वो आये, न आये,<br />उसका खत जरुर आयेगा एक दिन,<br />ऑरकुट पर॰॰॰<br />या फोन पर,<br />या॰॰॰<br />मुझे यकीन है।<br />देवेश वशिष्ठ 'खबरी'<br />9410361798</span>देवेश वशिष्ठ ' खबरी '