यार... कोई तरकीब बता...
तरकीब बता...
बस पच्चीस पैसे की जुगाड़ चाहिए।
वो वाले पच्चीस पैसे...
जिनसे चार संतरे वाली गोलियाँ आ—ती थीं...
कोई तरकीब बता,
चोरी करनी है...
अपने ही घर से...
एक कटोरी अनाज की।
आज... सपने में भोंपू वाली बर्फ़ बिकती दिखी थी...
और मुझे फिर से खेलना है—
"पीछे देखो, मार खाई!" वाला खेल...
मुझे फिर से कहना है—
अजनबी गोदों को अपने,
अंकल, आंटी, चाचा, ताई, मौसी...
दीदी, मामा, नाना, दादा... दादी।
यार...
क्या इतना बड़ा हो गया हूँ
कि रोज़ काम पर जाना पड़ेगा?
ट्यूशन वाले मास्टर जी का काम नहीं किया है—
सोच रहा हूँ,
आज फिर पेट दर्द का बहाना बना लूँ?
ये रोज़-रोज़ के ‘प्रीतिभोज’...
अब बेस्वाद से लगते हैं।
मैं अगली रामनवमी का इंतज़ार करूँगा,
जब फिर से बन जाऊँगा... ‘लांगूरा’।
खूब पैसे लूटूँगा,
और फिर खरीदूंगा—
शाकालाका वाली जादुई पेंसिल...
और चिढ़ाऊँगा दोस्तों को।
वो... ‘जवान’ है,
अब नज़रें चुरा लेती है।
चल... उससे भी बचपन वाली होली खेलते हैं।
चल यार...
कुछ 'सद्दा' लूटते हैं...
मुझे फिर से पतंग उड़ानी है...
बस पतंग उड़ानी है।