10/5/07

शायद मर गया हूँ मैं।


गुम गया हूँ मैं,

मिट गये हैं-

अतीत के चलचित्र।

धुँधले अक्स,

बातें,

यादें,

पीङाऐं।

गुम गयीं हैं सारी स्मृतियाँ,

और गुम हो गया है भविष्य भी,

तुम्हारे साथ,

गुम गया हूँ मैं।

अब कल्पना नहीं है,

न समय है,

न आकाश।

कुछ नहीं बचा है मेरे लिये।

खो दिया है सब कुछ ।

अब हाथ पैर नहीं पटकता,

किसी चमकी को देखकर,

चीखता नहीं हूँ चोट खाकर,

चुप हो गया हूँ मैं।

शायद मर गया हूँ मैं।

आ लगा हूँ निर्जन द्वीप पर,

पर वहाँ तुम रहते हो।

होठों के पार...

इस बार तुम ज्यादा पास हो,

भीतर तक...

बिल्कुल सक्रिय।

मैं समाधि में हूँ....।

श्श्श्श....... तुम भी गुम जाओ,

मेरे साथ।

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410173698

17 टिप्‍पणियां:

  1. खबरीजी,पता नहीं आपको खबर हो या नहीं, अपना ताल्लुक भी आगरा से है। वहां एक कालेज हुआ करता है, सेंट जोन्स कालेज, वहां से पढ़ाई की है। जनमत में अब आपको देखूंगा।

    आलोक पुराणिक
    9810018799

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  2. अब हाथ पैर नहीं पटकता,
    किसी चमकी को देखकर,
    चीखता नहीं हूँ चोट खाकर,
    चुप हो गया हूँ मैं।
    शायद मर गया हूँ मैं।

    Wah janab yeh lines to bahut khuch keh jati hai...
    Bahut bahut shukriya is pyari kavita ke liye...
    shashank

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  3. अब हाथ पैर नहीं पटकता,
    किसी चमकी को देखकर,
    चीखता नहीं हूँ चोट खाकर,
    चुप हो गया हूँ मैं।
    शायद मर गया हूँ मैं।
    wah....
    bahut khoob....
    shukriya...
    baht pyaaree kavita hai..

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  4. खबरी जी,बहुत गंभीर बात कह गये आप तो
    कैसे?
    मैं भी समाधि में हूँ
    आभार देना चाहूँगा

    सस्नेह
    गौरव शुक्ल

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. मैं समाधि में हूँ....।
    श्श्श्श....... तुम भी गुम जाओ,
    मेरे साथ।
    कविता को बेहतर तारीके से व्य्क्त करता है. आपकी इस सुन्दर कविता के लिये आपको बधाई.

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  7. सुन्दर लिखा है...मन के आक्रोश को कागज पर उतारन सहज नही होता....आपने कर दिखाया है

    बधायी

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  8. Insaan gum ho sakta hai....
    charitra ghum nahi ho sakta....
    aapme charitrik visheshta hai...isliye
    AAP MAR NAHI SAKTE...
    main samajh nahi paa raha ki aapko dhanyawad/shabashi du, ya kuch aur kahu....
    jis din aapse baat hui,main baya nahi kar sakta ki mujhe kitni khushi hui....
    jaisa ki bataya tha ki khud bhi thora bahut likh leta hu,so aap mere agraj hai aur hum aapse sikhne ko taiyaar rehte hai....
    par bhaiya, aapko humesha "dukh/pida" likhte hi dekha hai...
    mana ki duniya me bahut dukh hai,to kya hum is dukh ko dekhte hue marte rahe?????
    chota baccha hu,itni badi baat kehne ka haq nahi rakhta,par bhaiya hum aapse "khushi" chahte hai,aapse khushi sikhna chahte hai....
    aasha hai aap mujhe nirash nahi karenge....
    jyada bol gaya hu to, kshmaprarthi hu....
    manu,udaipur

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  9. देवेश जी आपके लिये क्या कहूं बस ऐसी ही कविताएं पढ़वाते रहिये

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  10. बस यहीं तो मिलन है ... गोरख को सुनिये " मरो है जोगी मरो , मरो मरण है मीठा " ... क्योंकि जब तक पुराना मर नही जाता नया जनम नही ले सकता॥ अभी मंजिलें और भी है ...

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  11. देवेश जी..
    आपकी कविताये बहुत स्तरीय होती हैं। आनंद आ गया पढ कर। बधाई\

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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  12. शैलेश जी की आरकुट से आपका लिंक मिला,

    काफी अच्‍छे शब्‍दों में आपने कविता प्रस्‍तुत की है, इसकी प्रशंसा के लिये शब्‍दों को खोजना कठिन है।
    अच्‍छी कविता को लिये बधाई।

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  13. देवेशजी,

    आपने मन की छटपटाहट को बहुत ही खूबसूरती से कविता में पिरोया है, आपकी कविता सही जगह पर चोट कर रही है, कल व्यस्तता के चलते आपकी यह कविता नहीं पढ़ पाया था, मुझे खेद है।

    बधाई!!!

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  14. आप ही की रचना को समर्पित कुछ पक्तियां॰॰॰॰॰

    "दिल जल रहा है, बस धुआं नही है।
    इस दर्द का हमदर्द यहां नही है।
    मोम की तरह पिघल रहा हू दोस्त,
    कल को तुम कहोगे कि मेरा निशां नही है॰॰॰॰॰॰"
    ०९८२९०३२४९१ आर्यमनु

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  15. bhook par aetbaar mat karna
    tum parindy shikaar mat karna

    shaam udasi ka isteaara hai
    shaah ko ikht~yaar mat karna

    khud j~lana koee dia ghar meiN
    dhoop par inhesaar mat karna

    kirchiaaN ungliaaN ch~ba leiN gi
    zakhm dil k shumaar mat karna

    un se milty hi sub b~tady gi
    aankh par aetbaar mat karna

    maiN bhi kha~wboN k safar pehnooN ga
    tum bhi taary shumaar mat karna

    kis liye ungliaN j~laty ho
    kaha tou tha k pyar mat karna

    theek hai ishq kar lia sahab
    ye kh~ta baar baar mat karna.

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