5/5/07

ऐ मेरे मालिक, मुझे एक रबर दे दे,

ऐ मेरे मालिक,
मुझे तू ऐसी रबर दे दे,
जिससे इस पन्ने पर उकरी
कुछ तिरछी रेखाऔं को हटा सकूँ।
भेद मिटा सकूँ,
सफेदपोश कोरे कागज को
सही राह दिखा सकूँ।
यहाँ वहाँ को एक बना सकूँ,
माटी के खिलौनौं को
टूटने से बचा सकूँ।
गुल खिला सकूँ,
दिल मिला सकूँ
ऐ मेरे मालिक
तू मुझे वो दिल दे दे,
जिससे किसी के काम आ सकूँ,
उसके मन की नफरत से झलकते प्यार को
बाहर ला सकूँ।
भाई को भाई से मिला सकूँ,
गा सकूँ, गवा सकूँ
हँस सकूँ, हँसा सकूँ।
ऐ मेरे खुदा
तू मुझे ऐसी मुहब्बत दे दे
गैरों को अपना बना सकूँ,
दुश्मनी मिटा सकूँ,
दोस्त बना सकूँ।
जहर को भी पचा सकूँ,
राम और रहीम के
और पास आ सकूँ।
ऐ मेरे खुदा
तू भले मुझे कुछ मत दे,
पर थोडी इंसानियत दे दे,
जिससे एक जानवर को
फिर से इंसान बना सकूँ,
..... मैं किसी के काम आ सकूँ।
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9410361798

9 टिप्‍पणियां:

  1. भैया कविता तो अच्छी लिखी हो...
    लेकिन एक बात कहनी थी, अमरीका में 'रबर' कुछ और होता है, वहाँ के पाठक आपकी कविता पढकर कुछ और ना भेज दें, ध्यान रखना।

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  2. Devesh Ji,

    Badi bechaini hai is kavita mey. Sarhaden mitane aur insaan ko sahi mayno mey insaan banane ki utkat aakankcha...Samucha sangharsh utar aaya hai kavita mey.. Sahaj pravah mey bahti tamam sawalon ko uthati gambhi kavita hai ye.. aameen

    mafi chahunga ki Roman lipi ka prayog kiya..

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  3. "...भैया कविता तो अच्छी लिखी हो...
    लेकिन एक बात कहनी थी, अमरीका में 'रबर' कुछ और होता है, ..."


    शीर्षक से तो मुझे भी ऐसा ही लगा था - आजकल लोग द्वि-अर्थी शीर्षक जरा ज्यादा ही रखने लगे हैं...:)

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  4. aameen.................hme bhi aapki tarah us shubh din ka intzar hai..kabita manmohak hai......

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  5. देवेश भाई आपकी लेखनी खूब गुल खिला रही है
    जीतूजी और रविजी जिनकी टिप्पणियां दुर्लभ मानी जाती हैं वे भी आपकी ब्लाग पर दिख रही हैं बधाई.

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  6. देवेश जी..
    धार है लेखनी में आपकी, आपकी प्रतिभा को नमन। यह सपना तो हम सभी का है...

    ऐ मेरे खुदा
    तू भले मुझे कुछ मत दे,
    पर थोडी इंसानियत दे दे,
    जिससे एक जानवर को
    फिर से इंसान बना सकूँ,
    ..... मैं किसी के काम आ सकूँ।

    बहुत खूब..

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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  7. बात तो आपने एक बहुत ही अहम विषय की की है...पर मेरे दोस्त अभी बहुत समय लगेगा.... जब तक यहाँ भारत देश में छटे हुये नेता रहेंगे आपका सपना एक सौ वर्षों में भी पूरा नहीं होगा... पर हम ये अवश्य चाहेंगे कि वो दिन आये...आमीन.

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  8. बहुत सुन्दर देवेशजी,

    आपकी कविता में निहीत भावना को काश समझा जा सके।

    सस्नेह,

    गिरिराज जोशी "कविराज"

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  9. देवेश जी
    सुन्दर कविता लिखी है.. जो भाव आप के मन मेँ है शायद वो भाव उन सब के मन मेँ भी हैँ जिन्हेँ शान्ति प्रिय है
    लिखते रहिये

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