6/3/09

ये वादा रहा...


तुम्हारी याद को लिख लेता हूं सबके लिये
ये सोचे बगैर कि सब सवाल करेंगे
और निरुत्तर हो जाऊंगा मैं...
तुम्हारी याद को रख लेता हूं बटुए की उस जेब में...
जहां रखा है शगुन का सिक्का,
कि पर्स खाली न रहे कभी...
तुम्हारी याद को सी लिया है आज
फटे घाव के साथ...
कि तुम मिल जाओ मेरे खून में...
और अगले जन्म में...
बेटा बनूं तुम्हारा...
या
तुम बेटी मेरी।
ये वादा रहा...
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देवेश वशिष्ठ खबरी

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन भावपूर्ण रचना के साथ बहुत दिनों बाद दिखे?

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  2. तुम्हारी याद को लिख लेता हूं सबके लिये
    ये सोचे बगैर कि सब सवाल करेंगे
    और निरुत्तर हो जाऊंगा मैं...
    भाई वशिष्ठ ताजनगरी से एक शेर अर्ज किया है-
    जो हयाते जाविदा है, जो है मर्गे नागहां
    आज कुछ उस नाज, उस अंदाज की बातें करो.

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