15/12/08

राधा कैसे न जले-11



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देव घर लौट आया था.
क्यों? उसने मुझे नहीं बताया-
देव मुझसे सारी बातें छुपा जाता था. पर मुझे पता था. वो बहुत कुछ भूल आया था. भुलक्कड़ था देव. देव को कुछ भी याद नहीं आता था. वो स्कूल- स्कूल का रिशेप्शन- करनपुर की हलवाई की वो दुकान- ढलान की दूध जलेबी- पांच रुपये के स्टीम्ड और दस रुपये में फुल प्लेट फ्राइड मोमोज़- गांधी बाबा का पार्क- पार्क की बेंच- सर्वे चौक- कदमताल- एक रुपये के सिक्के वाला पब्लिक टेलीफोन, जिससे बातें करने के लिए देव को सब्जी वाली आंटी से रुपये तुड़वाने पड़ते थे- उसके बराबर वाली दुकान की चाय भी देव भूल गया था- देव सब कुछ भूलता जा रहा था- भुलक्कड़ हो गया था देव- याद नहीं आता था और न ही उसके खत- ये जानते हुए भी कि वो घरवालों की नजर में आ जाएंगे, वो उन्हें अपनी एक पुरानी किताब में रखकर भूल गया था- भुलक्कड़ जो ठहरा देव-

काश बिट्टू भी इतनी भुलक्कड़ हो जाती- काश राधा इतनी भुलक्कड़ होती- कितना आसान होता है भूलना सब कुछ- और फिर लोग पूजते... कन्हैया की तरह- पागल थी राधा- रोये जाती थी और उसे याद रहता था दुनिया के देव से किया वायदा- आंसू मत गिराना राधे- जैसे प्रेम निवेदन नहीं आदेश हो कोई- या निवेदन भी- लेकिन स्वार्थ से भरा- राधा रोएगी- तमाशा खड़ा होगा- मुश्किल हो जाएगी- लोग क्या कहेंगे- राधा से उसके रोने की वजह जानेंगे- भेद खुल जाएगा- सो कन्हैया भुलक्कड़ हो गया- कन्हैया सब भूल गया- पनघट से लेकर प्रियतम तक को- कान्हा भी भुलक्कड़ था देव की तरह- कन्हैया योगी हो गया- और राधा रोती रही जिंदगी भर- कन्हैया ने अपने सारे भार उतार दिए- बिना किसी कचोट के रुक्मणी जैसी 64000 पत्नियों के बाबजूद कान्या योगी बने रहे- महान थे कान्हा- एक झटके में सब भूलने की कला भी उन 64 कलाओं में से एक रही होगी जिसके लिए कान्हा का प्रताप था- कन्हैया के स्वार्थी वचन का वजन जिंदगी भर उठाती फिरी राधा और फिर गुम हो गई- राधा ने कभी कन्हैया को तकलीफ नहीं दी- कभी उसकी जिंदगी में नहीं लौटी- पर क्या हुआ? उस देवाधीश को क्या फर्क पड़ता- वो तो योगी था- दुनिया भर को भोगने के बाद भी वो विरक्त था- इसी विरक्ति को तो पूजती है दुनिया- इसी विरक्ति को पाने के लिए ही तो इतने आडम्बर किये जाते हैं- पर राधा प्रेयसी थी- वो राजनीति- रणनीति और धर्मनीतियां नहीं जानती थी- शायद थोड़ी बहुत जानती भी हो- पर कान्हा के गूढ़ प्रेम ज्ञान को वो अनपढ़ कैसे समझती- ये ज्ञानी लोग बहुत खतरनाक होते हैं- ब्राह्मणों की तरह- भोज करते हैं- दक्षिणा भी लेते हैं- और फिर चरण भक्ति भी कराते हैं- राधा कान्हां से फिर कभी नहीं मिली- कभी अपने हक की आवाजें उसने नहीं उठाईं- न कान्हा की प्रेयसी होने के महत्व का कभी फायदा उठाया- वियोग के सर्ग के बाद वो कभी नहीं दिखी- बेबकूफ थी राधा- बिट्टू की तरह- कान्हा भुलक्कड़ नहीं था- वैरागी नहीं था- स्वार्थी था वो- उसके सीने में कभी रुलाई नहीं आई- उसकी वजह से कभी राधा को हिचकियां नहीं आईं पर देव कैसे किसी को बताता कि हर रात उसे इतनी हिचकियां क्यों आतीं हैं- भुलक्कड़ जो ठहरा- सब भूल गया था देव-

मेरा अध्ययन थोड़ा कम है- इसलिए नहीं पता कि किसी मंत्रशास्त्र में राधा की सुंदरता का भी कोई वर्णन है क्या? लेकिन इतना जरूर कहूंगा, रुकमणि ज्यादा खूबसूरत रही होगी- देव का प्रेम भी सुंदरता और वैभव की कसौटी पर कसा जाने लगा था- घर में रिश्ते के लिए हर रोज मेहमान आने लगे थे- रोज मेज पर प्लेटें बिस्किटों से भरी जातीं थीं- और देव बेशर्म हंसता हुआ चेहरा लेकर उनके पास चला जाता था- फिर उसके इंट्रोडेक्शन का रिवाज शुरू होता था- पिताजी उस वक्त चारण-भाट हो जाते थे- छायावादी कवियों की तरह उन्हें उसमें कोई दोष दिखाई नहीं देता था- तारीफों के पुल बांधने लगते थे- देव दिल्ली में तमाम प्रतिष्ठित चैनलों में बड़े पदों पर नौकरी कर आया था- एक से बढ़कर एक जॉब अपोर्च्युनिटी देव की चौखट पर खड़ी रहीं थीं- पर कितना बड़ा वैरागी था देव- सब पर लात मार आया- पिताजी सच छिपा जाते थे- भगोड़ा हो गया था देव- कृष्ण की तरह- रणछोड़- देव की छलांगे नकली थीं- वो खुद से भाग रहा था- भागकर देव सोचता था कि सारे झंझटों को वहीं छोड़ आया है- विरक्ति का नया तरीका ढूंढ निकाला था देव ने- पिताजी को देव में कोई बुराई नज़र नहीं आती थी- सिर के उड़ते बाल- सर्वाइकल स्पोंडियोलाइटिस- देव बीमार था- बिट्टू जानती थी- इसीलिए उसे उसकी ज्यादा फिक्र रहती थी- देव को शादी के लिए लड़कियों के फोटो दिखाए जाने लगे थे- एक से एक खानदानी उसके दरवाजे पर आने लगे थे- बिट्टू तो अकेली थी- पहाड़ी की मुड़ती हुई ओट सी- बिट्टू भी राजनीति नहीं जानती थी- पहाड़ी नदियों में कचरा नहीं होता, जब तक मैदान में नहीं आ जातीं- बहन के हाथों में देव को रिझाने के लिए फोटो होते थे- पर सब के सब क्लोज अप- देव उनमें बिट्टू को ढूंढता था- उसके उन हाथों को ढूंढता था जो दर्द से कराहते उसके कंधे की बिना कहे मालिश कर देते थे- देव को सिर्फ क्लोज अप दिखाए जाते थे- उनमें देव को बिट्टू जैसी तस्वीरें तो मिल जाती पर बिट्टू जैसे हाथ नहीं- देव उन निगाहों को ढूंढता था जो देव को सर्दी से बचाने के लिए सपने बुनते थे- अपराधी था देव- पता नहीं बिट्टू क्यों ऐसे देवों को माफ कर देतीं हैं- पता नहीं क्यों राधाएं क्यों खामोशी से रोती रही- बेबकूफ थी राधा- बिट्टू की तरह- पर आज देव का भला रुंध रहा था- देव को बिट्टू की बहुत याद आ रही थी- आज हिचकियां भी बहुत आ रहीं थीं, और देव सोच रहा था- सवेरे ड्यूटी जाना है- ये बिट्टू कब सोएगी- कब सोने देगी-

जारी है-
देवेश वशिष्ठ खबरी

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपको बहुत दिनों के बाद पढ़ रहा हूं...अच्छा लगा..

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  2. कैसे हैं आप देवेष सर ?
    आपने ब्लॉग पर लिखना काफी कम कर दिया है। इस कहानी को जितना जल्दी पढ़ना चाहती हूं, उतना ही धीरे लिख रहे हैं आप। आपको खुशी होगी कि इंडिया न्यूज ने अपने कुछ इन्टर्न्स का कई महीने पहले भला कर दिया था, मतलब ट्रेनी बना दिया है।

    अनु गुप्ता

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