30/4/07

कहाँ रुके हैं बढे कदम।


बढे कदम, उठे कदम,

पदचिन्हों पर चले कदम।

कही अनकही एक कहानी,

चुपके से कह चले कदम।


चकमक मंजिल देख भ्रमित हो,

आशाओं ने छले कदम

ठोकर लगी जाम से झलके,

उपमानों से भले कदम।


पन्नों पर काजल सी रेखा,

भावों के नभ तले कदम।

सब रुक जाऐं भले जहाँ में,

कहाँ रुके हैं बढे कदम।

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410361798

6 टिप्‍पणियां:

  1. it was nice in reading but very hard to digest,

    please write normal hindi so i can along with reading and enjoying can also understand it.

    by the way good job..... keep it up

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  2. बहुत सुन्दर !
    घुघूती बासूती

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  3. बहुत सुन्दर !
    घुघूती बासूती

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  4. सुन्दर लिखा है दोस्त.....कोमल मनोभावो की प्रस्तुति.. पसन्द आई आप की रचना लिखते रहिये...

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  5. कोमल भावनाओं की सुन्दर प्रस्तुती!

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