29/3/07

खूब डाँटा आज,

खूब डाँटा आज,
यादों को,
बेवक्त यादों को।
वक्त- बेवक्त, हर वक्त क्यों चली आती हो तुम ?
लावारिस सी।
मैं तुम्हारी तरह फालतू नही हूँ,
काम करना है ढेर सारा,
पैसे का जुगाढ़ करना है,
शोहरत घसीट कर लानी है,॰॰॰ पैरों तक।
पर तुम हो कि पीछा ही नहीं छोङती।
रोज दुत्कार देता हूँ तुम्हैं,
लंच के बाद जब बाँस की 'क्विक' और 'हरी' की आवाजें आती हैं।
भाग जाने को कहता हूँ तुमको,
जब मेरा सबसे अजीज़ दोस्त मुझे घुटता है।
चंद सिक्के ज्यादा कमा लेता है मुझसे ॰॰॰
इस दोस्त से लड़ना है।
फिर दिल्ली से॰॰॰
फिर दुनिया से॰॰॰
तुम तो फालतू हो ॰॰॰
बेकाम की।
कभी उसके पास भी जाया करो॰॰॰,
जिसकी ढेर सारी तस्वीरें एक साथ मेरे सिराहने रख देती हो,
और फिर रात भर॰॰॰
खीज आती है तुम्हारी इन हरकतों पर।
भागो यहाँ से , मुझे सोना है॰॰।
जाओ उसके पास॰॰
दिखाओ उसे भी एक-आध तस्वीर मेरी धुँधली सी॰॰॰
'गयी थी॰॰'
याद बोली।
'पर उसने ॰॰खूब डाँटा आज'।
देवेश वशिष्ठ'खबरी'
9410361798

6 टिप्‍पणियां:

  1. सच में बङी प्यारी लगी कविता.. प्यारी थोङा अजीब लग रहा होगा.. पर यादें प्यारी ही होती हैं उनका आना भी.. आपकॊ पहली बार पढा है.. सहजता पसंद आई..

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  2. बहुत बेहतरीन लिखा है देवेश जी... पढ़ कर लगा कि जैसे मेरे मन की बात आपने लिख दी हो ।

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  3. एक यादें ही तो हैं जो इन्सान का साथ कभी नहीं छोड़ती और आप उन्हें ही डांट रहे हैं।

    सुन्दर कविता और सुन्दर भाव।

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  4. बढि़या किया डांट दिया और अच्छा किया लिख दिया!

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  5. Nice yaar, bahut acchi lines hai. Pad kar bahut accha laga, jaise mere dil ki baate aapne in lines mai likh di hon.

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