29/3/07

मजा आने लगा है।

इतना बदल लिया है
खुद को ऐ जिन्दगी,
अब तो अकेलेपन में
मजा आने लगा है।


आँसू दफन के दिल में
इतना घुटा हूँ मैं,
अब दर्द की शिकन में
मजा आने लगा है।


वो सब रहैं सलामत,
जो थे कभी करीबी,
अब उनसे दूरियों में
मजा आने लगा है।

जानता हूँ मंजिल
मेरे लिये रुकी है,
रुखों की बेरुखी में,
मजा आने लगा है।

देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
9410361798

2 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे भी पढने में मज़ा आने लगा है.. हर कविता सहज और सुंदर..

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  2. बहुत सुन्दर!
    सुनीता(शानू)

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