30/3/07

......श्री कृष्णम् समर्पयामी।


मैं,
मेरी सोच,

मेरे खयाल,
जीया हुआ हर दिन,
काटे गये महीने,
और बितायी हर साल।
हर हद तक गया अनुराग,
परिपक्वता,
और फिर चुंबक के एक से छोरों सा वैराग।
मेरा सारा आलस, सारे काम,
मेरे से टूटा और जुङा हर नाम,
कूट-कूट कर भरे व्यसन, वासना, दुर्विचार,
मेरा अहंकार,
हर दिन की जीत ,
हर रोज़ की हार,
मेरा प्रेम,
समर्पण,
मेरा जुङाव और भटकाव,
टूटन, तडपन खुद का चिंतन,
कंठ तक भरा रीतापन,
मजे में डूबी हर एक बात,
मुझे उठाने और गिराने मैं लगे सैंकङों हाथ,
उसकी नफरत, मेरा प्यार,
हर अनुभव, हर चोट, हर मार,
सारी प्राप्तियाँ, सारे आनंद, सारे सुकून,
मुझसे जुडा हर काला, सफेद, तोतई और मरुन,
मेरी सारी ताकत,
सारी खामी,
.....श्री कृष्णम् समर्पयामी।
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '

9410361798

4 टिप्‍पणियां:

  1. yeh bahut badiya hai... abhi tak kisi bhee blog par dekhi- padi kisi bhi kavita se isaka koi mukabala nahee hai.........sach me.....

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  2. धन्यवाद दोस्त। मैं और बेहतरी की कोशिश करुँगा।
    आशीष बनाये रखें।
    'खबरी'

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  3. सच कहूं बहुत बेहतरीन.. मेरा मुझमें कुछ नहीं जो होवत सो तोर..तेर तुझ्को अर्पण करने में क्या लागे है मोर..

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  4. मेरी सारी ताकत,
    सारी खामी,
    .....श्री कृष्णम् समर्पयामी

    Main kuch bhi likhun in shabdon ke aage feeka hi lagega. Isliye nahi likhta :)

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