31/3/07

अब तो डर भी नहीं

तुझसे जब मेरी कोई बात चलती है,

तू मुझे मुझसे भी बेहतर समझती है!

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दर्द ओ गम पर,मैं मरहम लगाता गया।

तू सुनती रही,गुनगुनाता गया।

मुझको नाजुक सी खुशियाँ,हमेशा से थीं.

मैं ही उन पर, परदे लगाता गया।

चूमकर जो चखा,तेरे नूर को,

जितना तैरा मैं उतना समाता गया।

तेरी दौलत, मुहब्बत की बरसात है।

मुस्कुराते लवों पर क्या बात है ?

मुझको कह दे,जो कुछ है दिल में चला।

कहीं फिर ये मौसम,चला जाये ना।

मेरी हर छुअन,अब अमानत तेरी,

पास आ करवटों में समाता गया।

इस उनींदी पलक में है कोई बसा,

मुस्कुराहट में भी होता है नशा।

ये बातें, ये रातें,बडी हैं नयी,

अब तो डर भी नहीं खोने का कहीं,

बिन कहे मैं कहानी सुनाता गया।

तू सुनती रही,गुनगुनाता गया।

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देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

9410361798

4 टिप्‍पणियां:

  1. मुझको नाजुक सी खुशियाँ,हमेशा से थीं.
    मैं ही उन पर, परदे लगाता गया।

    ये बातें, ये रातें,बडी हैं नयी,
    अब तो डर भी नहीं खोने का कहीं,

    बिन कहे मैं कहानी सुनाता गया।
    तू सुनती रही,गुनगुनाता गया।

    देवेश जी उपर कुछ पंक्तियाँ हैं जो मैनें विशेष रूप से पसंद की हैं। आपका लेखन स्तरीय है..मुझे पढवाते रहें, प्रसन्नता होगी..

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  2. देवेशजी आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं
    आशा है आगे भी इसी प्रकार लिखते रहें
    आपकी रचनाओं के बारे में बस एक बात कहूँगा कि ये मात्र तुकबंदी ना होकर दिल से निकली हुई कविता है जो कम ही लोग कर पाते हैं इसीलिए आप पसंद भी बहुत किये जा रहे हैं आजकलमेरी सलाह है कि आप कविता के साथ अन्य मुद्दों पर भी कलम चलायें
    कविता भी लिखते रहें पर अन्य विधाओं में भी तो हमें आपकी रचनात्मकता का परिचय मिले
    ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि लोग या तो कविता ही लिखते हैं या गद्य एकरसता शायद रचनात्मकता के लिए घातक है

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  3. बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता।
    घुघूती बासूती

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  4. वाह बहुत सुन्दर लिखते है,...हर पन्क्ति भाव बध्द है,...

    इस उनींदी पलक में है कोई बसा,
    मुस्कुराहट में भी होता है नशा।
    सुनीता(शानू)

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