4/6/09

खबरी की पांच छहनिकाएं


दीवार पर गढ़ी कील,
दिल-दीवार,
बाकी तुम..!

बांस सा ज्वार,
फनकार,
बंसी की धुन!
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चुक गए सवाल,
सांस,
मोक्ष-

रंगीन पानी...
तेरा अक्स...
होश!
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आहट,
अकेलापन,
डर-

न तू,
न मां,
न घर!
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खारा सागर,
टूटी बोतल,
जिन्न-

कारे आखर,
कोरे कागज,
तेरे बिन!
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तड़पती भूख,
रेगिस्तान,
प्यास!

वादियां... झरना...
तू...
काश!
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देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705

3 टिप्‍पणियां:

  1. Waah !! Waah !! Waah !!

    Bahut bahut sundar....sabhi kshanikayen man me utar jane wali.

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  2. इन पंक्तियों से कूद-फाँद की चोट का आभास-सा मिलता है। अच्छा है। छंदज्ञान की ओर यही रास्ता जाता है। बढ़े चलो…

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  3. बहुत अच्छा भाई अब काफी समझदार हो गए हो ।
    तुमहारा गोपी भैया

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