23/5/09

दाग झूठे हैं...



सच सुंदर होता है...
और दाग अच्छे...
आज तक यही कहा है मैंने...
यही पढ़ा है...

मैंने इन दागों पर सुंदर कविताएं लिखीं,
और हर बार सुंदर धब्बों पर यकीन किया...
मैं डूबा रहा रंगों में...
गरारे करता रहा अपनी ही कविताओं के देर तक...

मैंने इंद्रधनुष को सुंदर कहा...
और समेटता रहा आंखों में सुंदर ख्वाब...
ये जानकर भी कि सुबह टूट जाएगी नींद...
और आंखों के झूठे ख्वाब भी...

सोता रहा मैं... आंखें मूंद कर
समेटता रहा सुंदर वादों का बोझ...
जैसे पोटली खोलूंगा तो सब बचा रहेगा...

मैं अक्सर बांधता रहा मुठ्ठी में किनारे की चमकीली रेत...
चुनता रहा फूल ये मानकर कि ये कभी नहीं मुरझाएंगे
मैं बटोरता रहा मुस्कान, शाश्वत खजाने की तरह...
पर मैं गलत था...

सब सुंदर चीजें सच नहीं थीं...
इंद्रधनुष बादलों का धोखा था...
मुस्कानों में दुनियादारी का फरेब था...
वादों में छिपी थी गद्दारी...

मेरी सब कविताएं झूठी थीं...
मेरे ख्वाब नकली थे...
अच्छे दागों की तरह...
अच्छे दाग झूठे होते हैं अक्सर...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना हेतु बधाई स्वीकार करें

    ---
    तकनीक दृष्टा

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  2. एक और उम्दा रचना!! बधाई.

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  3. देवेश जी............. सुन्दर लिखा है............. गहरे अर्थ वाली बात कही है.........लाजवाब

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  4. मैं अक्सर बांधता रहा मुठ्ठी में किनारे की चमकीली रेत...
    चुनता रहा फूल ये मानकर कि ये कभी नहीं मुरझाएंगे
    मैं बटोरता रहा मुस्कान, शाश्वत खजाने की तरह...
    पर मैं गलत था...

    कितना सुन्दर लिखते हो तुम देवेश. हमेशा ऐसे ही लिखते रहना.

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