8/4/09

तुम गीत हो...


बिट्टू, तुम गीत हो...
तुम्हें मैंने नहीं लिखा,
खुद लिख गए तुम,
हर्फ-हर्फ अपने आप...
मैंने तुम्हें नहीं गाया,
तुम खुद रहे जुबान पर,
मीठी-मीठी लोरी से...
मैं बेसुरा था,
तुम खुद बन गए सरगम,
और निकलते रहे मेरी जुबान से...
तुम गीत हो,
वियोग का...
जिसने मुझे सिखाया,
अहसास ऐसे किया जाता है...
संयोग का,
जिसने बताया कि जीया ऐसे जाता है...
तुम एक प्यार भरा नगमा हो,
जिसे मैंने अपनी सबसे ऊंची आवाज में गाया है...
तुम गीत हो,
जिसे सबसे आसानी से गाया जा सकता है...
तुम प्रीत हो, जिसे हमेशा-हमेशा निभाया जा सकता है...
तुम सौगंध हो,
जिसके लिए मुझे कभी आडम्बर नहीं करना पड़ा...
तुम जीत हो,
जिसके लिए मुझे कभी नहीं लड़ना पड़ा...
तुम गीत हो उत्साह का,
जिसने मुझे हमेशा हौसला दिया है...
कि रुकना नहीं है,
हारना नहीं है...
जीना है
और जीत लाना है तुम्हें...
तुम गीत हो, गाना है तुम्हें...

देवेश वशिष्ठ खबरी

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

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  2. गीत खुद ही बन जाता है .. हम कैसे लिख सकते हैं .. हम कैसे गा सकते है .. बहुत बढिया भाव .. बहुत अच्‍छा लिखा।

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