6/3/09

मेरा स्वर्गवास


एक सपना देखा अभी,
आधी रात को
और फिर नहीं लगी आंख...
अब धुंधला सा याद है बस
सीढ़ीदार खेत थे पहाड़ियों के...
और एक ढलान पर एक गांव
सीढ़ियों के रास्ते वाला गांव
टूटी सीढ़ियां... पहाड़ी लाल पत्थरों की
बीच में कुछ घर थे...
बुरांश के पेड़ों से ढंके...
एक हाथी था...
उस पर इंद्र...
उसकी शक्ल मिलती थी मुझसे बहुत कुछ
वो स्वर्ग था...
आज रात में फिर स्वर्गवासी हुआ...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

2 टिप्‍पणियां:

  1. आप स्वर्ग में नही अपनी खूबसूरत दुनिया में थे...जो दिखने में स्वर्ग जैसी है...

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  2. अरे यार आप बहुत अच्‍छा लिख रहे हें , कहानी अच्‍छी जा रही है , मैं पढता रहूंगा

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