20/6/08

राधा कैसे न जले- 6

वादियां- मेरी आवारगी की कहानी की पुरानी किश््तें यहां पढ़े-

जब अपने पिता को इंदू ने पहली बार देखा ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा हिन्दी फिल्मों में दिखाया जाता है... इंदू न रोई न चिल्लाई... अपने पिता से ये उसकी पहली पहचान हुई थी लेकिन बिल्कुल ठंडी और निर्जीव... बोर्डिंग की पढ़ाई पूरी हो गई थी... नाते रिश्तेदारों ने इंदू की मां से कहा तो उसे वहीं रोक लिया... शूरू में सारे रिश्ते नाते इंदू को अजब सी बनावट लगते... पर वादियों की रानी मसूरी में उसके पैर जैसे ही घर से बाहर पड़ते, दिमाग का सब ऊहापोह मिट जाता... मसूरी की एक खास बात मैं आपको बताता चलूं... शिवालिक की पहाड़ियों पर बसे मसूरी की एक खासियत है... यहां एक ही वक्त में अलग अलग मौसमों का मज़ा लिया जा सकता है... अगर मसूरी में पहाड़ के एक तरफ सूरज मेहरबान हो रहा होता है तो मुमकिन है कि जहां से उस पहाड़ी का घुमाव शुरू होता है वहां की सड़क पर बारिश हो रही हो... एक ही वक्त में धूप छांव का अजब खेल चलता है इस जादूई शहर में... हालांकि बहुत छोटा सा है मसूरी... देव जब भी बिट्टू से मसूरी घूमने की जिद करता था तो वो तपाक से यही कह देती थी... अरे मसूरी है ही कितना बड़ा... वो तो में तुम्हें बातों बातों में घुमा दूंगी... और फिर शुरू हो जाती थीं इंदू की बातें... देव, देखो ये गनहिल है ना, यहां से वो धनोल्टी दिखती है... औऱ वो दूर... वहां दूरबीन से जो छोटे छोटे झंड़े दिख रहे हैं ना... लोग कहते हैं कि वहां पांडवों ने तप किया था... देखो ना देव यहां के बंदर कितने मोटे मोटे और झबरीले हैं... पता है इनके झबरीले बाल इन्हें यहां की ठंड़ ये बचाते हैं... और उधर कैम्टीफाल... नहीं वहां नहीं जाएंगे... वहां बहुत भीड़ रहती है... यहां पास में भट्टा गांव में एक और झरना है... वहां कोई नहीं जाता... और- और तुम कभी बुद्धा मोनेस्ट्री गये हो... पता है... वहां पांच सौ सीढ़ियां हैं... और वो भी एकदम खड़ी... पर मैं तो दो मिनट में वहां चढ़ जाती हूं... पर तुम थक जाओगे... और पता है यहां से परसों एक जीप खाई में गिर गई थी...और देखो देव ये नीचे हमारा स्कूल... यहां मैं बच्चों को पढ़ाती हूं... यहां ना एक बड़ा प्यारा सा बच्चा है... बिल्कुल तुम्हारी तरह... हे भगवान, कितना बोलती थी बिट्टू... कि घूमना छोड़ो उसे चुप कराने में ही वक्त गुज़र जाता था... ओफ्फो... मैं फिर विषय से भटक गया... अभी देव और इंदू की प्रेम कहानी शुरू ही नहीं हुई और मैं उनके घूमने की कथा सुनाने लगा... अभी तो देव इंदू की जिंदगी में आया ही नहीं है... पर क्या करूं उसकी कहानी है ही इतनी आजाद कि उसे सिरे से बांधना मुश्किल है... हां तो मैं कह रहा था कि इंदू को मसूरी की खूबसूरती भा गई थी... इसीलिए उसका वहां मन भी लग गया... सवेरे सवेरे पैदल पैदल दूर पहाड़ी पर निकल जाती... उसे भीड़-भाड़ से चिढ़ सी हो गई थी... वो इंदू जो आसाम में सबसे शरारती थी... बंदिशें तोड़कर जीने में जिसे मज़ा आता था... वो अकेलापन ढूंढने लगी थी... वक्त इंसान की सूरत और सीरत कैसे बदल दे कोई नहीं जानता... शायद इसीलिए कहते हैं कि कल क्या होगा... कैसा होगा... किसी ने नहीं देखा...

जारी है...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया शुरुवाअ रही, जारी रखिये-इन्तजार करते हैं अगली कड़ी का.

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  2. देवेश भाई बड़ा अच्छा लगता है आपकी ये एनर्जी देख कर...आपकी नकल करते हुए एक सीरीज शुरु की है माफ करना बाबू जी..मौका मिला तो पढ़ना जरुर

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