बुधवार, 27 फ़रवरी, 2008

भूल...

रोज़ बदलता हूं कम्प्यूटर के डेस्टोप से चेहरा अपना
औऱ पीछा छुड़ा लेता हूं तुझ से...
रोज़ लिखता हूं एक खत तुझे याद कर...
रोज़ गांठता हूं दोस्ती नए लोगों से...
और रोज़ भूल जाता हूं तुझे...
इस कदर कि तुम फिर याद नहीं आती...
जब तक मैं अगले दिन फिर न भुला दूं तुम्हें...
यकीन न आये तो देख जाना...
तुम आना कभी मेमना लेकर... पहाड़ों से...
पेड़ की उलझी डाल से झांककर ढूढ़ना मुझे...
और पूछना मेरा हाल...
वैसे मुझे तो तुमने भी भुला दिया होगा ना अब तक...

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

ऐसे कैसे भूल जायेंगे.... :)