
हमेशा की तरह देव के कानों में कोई बाबरी धुन बज रही थी... देव लिखने में तल्लीन था... देव का हुलिया बिल्कुल बदल चुका था... आंखों पर बिना फ्रेम का मंहगा चश्मा था... नंबर कोई माइनस दो होगा... दूर की चीजें बिना चश्मे के धुंधली सी दिखती थीं... पिछले दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था... देव की चार किताबें बाजार में आ चुकी थीं... किसी दार्शनिक की तरह बाल लम्बे और घुंघराले हो गये थे... बालों का झड़ना रुक गया था... नीला डेनिम का कुर्ता और सफेद रेशमी पजामा जंच रहा था... दीवार पर बनी पुरानी अंगीठी अब सजावट का सामान हो गई थी... और देव से जुड़ी बिट्टू की यादें भी... देव कई दफा मसूरी गया पर फिर किसी पहाड़ी के पेड़ के नीचे इंतजार करती बिट्टू नहीं मिली... ऐसा नहीं है कि देव ने उसे ढूंढने के लिए भाग दौड़ नहीं की थी... लेकिन धीरे धीरे उस दौर की कविताओं को पौ फटे तक गुनगुनाना उसकी नियती बन गया था... बिट्टू को सोचकर लिखी गई कविताएं अब फिल्मी गीत बन गईं थीं... देव अब तक बड़ा फनकार बन गया था... समाचार पढ़ता था... फिल्मों के लिए कहानी लिखता था... बड़ा शायर हो गया था...जमाना उसे अच्छे पत्रकार के तौर पर जानने लगा था... न्यूजरूम की चहलपहल में उसकी आवाज गूंजती थी तो बाकी खामोश हो जाते... दिन भर की सिरदर्दी के बाद शाम को घर लौटता तब भी टीवी के स्कूप और स्टोरी कंटेंट दिमाग में चलते रहते... और इतना सब अगर हर वक्त देव इतना सोचने लगा था कि इस दुनिया के अलावा भी कोई और दुनिया है ये उसे याद भी नहीं रहता...

हरिद्वार में कुंभ लगने वाला था... कुंभ नहीं महाकुंभ... तैयारियां जोर शोर से हो रहीं थीं... माना जा रहा था कि आस्था का ये सैलाब पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ देगा... सरकार, पुलिस प्रशासन और अखाड़ों में जितनी बेचैनी थी उससे कहीं ज्यादा बेचैनी थी खबरिया चैनलों के दफ्तरों में... 12 साल में ऐसा मौका मिला था... आस्था खूब बिकती थी... इसलिए आस्था के इस महाबाजार को हर कोई भुना लेना चाहता था... हरिद्वार में स्टूडियो लगाने और सबसे बेहतर कवरेज के लिए गजब की फजीहत मची हुई थी... कुंभ को जीतना था... कुंभ पत्रकारों के लिए चुनाव से बड़ा कर्मयुद्ध था... और देव को उसके चैनल की ओर से कुंभ का कर्मयुद्ध जीतने के लिए कहा गया था... देव हरिद्वार में था... तीन महीनों तक उसे यहीं रहना था... चारों पीठों के शंकराचार्य से लेकर तमाम मठाधीशों तक के इंटर्व्यू कर रहा था... नागाओं की सेना का कौतुहल उसे टीवी पर दुनिया को दिखाना था... महाकुंभ में धर्म और आस्था की बयार बह रही थी, वहीं कुछ साधु संत धर्म की चर्चाओं से दूर आपसी विवाद में उलझ रहे थे... और इस सब में देव को खूब मजा आ रहा था... देव को खास तौर पर कुंभ में से चुन-चुनकर पब्लिक इंट्रस्ट की स्टोरी कवर कर रहा था... कांची कामकोटी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती कथिर तौर पर ब्रह्मचारी आत्मानंद एवं दिव्यानंद जैसे कथित फर्जी शंकराचार्यो को कुंभ मेले से खदेड़ने की मांग को लेकर अनशन पर बैठ गये थे... साधुओं के लिए बनाए गए अस्थाई द्वीपों पर साधु संतों के डेरों में खूब करतब दिख रहे थे और देव उन करतबों को कौतूहल बनाकर दुनिया को दिखा रहा था... कहते हैं कि आदि शंकराचार्य ने केवल चार पीठ बनाई थी जिसमें चार विद्वानों को काशी विद्वत परिषद द्वारा योग्यता अनुसार शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है। लेकिन देव जहां देखता, भगवा ओढे सिंहासन पर बैठे महिमामंडित शंकराचार्यों की बाढ़ सी दिखाई देती... कुंभ में करीब पांच दर्जन शंकराचार्य दिख रहे थे... और आपस में झगड़ रहे थे... दरअसल कुंभ संतों के धार्मिक महापर्व से ज्यादा आपसी झगड़ों को निपटाने की महापंचायत ज्यादा नजर आ रहा था... महाकुंभ मेला दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन था इसलिए कोई चटपटा स्कूप छोड़ना बेबकूफी थी... हरिद्वार महाकुंभ की महिमा इसलिए भी ज्यादा मानी जाती है क्योंकि यह भगवान शंकर के निवास कैलाश पर्वत का प्रवेश द्वार माना जाता है। इसके मुकाबले सिर्फ इलाहाबाद के कुंभ में ही भारी भीड़ होती है क्योंकि वहां गंगा, यमुना और पौराणिक नदी सरस्वती का संगम है। देव महाकुंभ की भव्यता देखकर अचंभित तो था लेकिन वो ये भी जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर सातवीं शताब्दी में ह्वेन सांग से लेकर 19वीं शताब्दी में मार्क ट्वेन और 20वीं शताब्दी में बहुत से विद्वानों ने महाकुंभ मेले में ऐसा क्या देखा कि उन्होंने चमत्कृत होकर इसका वर्णन किया है। संत तमाम कहानियों का हवाला देकर बताते कि कुंभ मेले के आयोजन के पीछे बुराई पर अच्छाई की जीत और दुनिया में समृद्धि के चक्र का शुरू का प्रतीक है। कुंभ मेले के दौरान विभिन्न संप्रदाय या अखाड़े से जुड़े हिंदू संत जुटकर ग्रंथों पर चर्चा कर रहे थे... अपने भक्तों से मिल रहे थे और अपने अखाड़े में नए संतों का प्रवेश भी कर रहे थे। हरिद्वार कुंभ की रौनक दिनोंदिन बढ़ रही थी। पेशवाइयों के साथ संतों के आश्रम सज गए थे और परलोक सुधारने के इस महाआयोजन के बीच खूब शाष्त्रार्थ हो रहे थे... संत दुनिया को बेहतर बनाने का संदेश दे रहे थे... लेकिन सबसे दिलचस्प न्यूज स्टोरियां निकल रहीं थी आधुनिक और कम उम्र के संतों के शिविरों से... जो धर्म के पुराने ढर्रे को छोड़कर लोगों को ग्लोबल वार्मिंग और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर सचेत कर रहे थे। नीदरलैंड से हरिद्वार कुंभ में शामिल होने आए सोहम बाबा विदेश में सनातन संस्कृति का प्रचार करने गए थे। जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर को पर्यावरण को बेहतर बनाना पूजा पाठ जितना ही जरूरी लग रहा था। संतों में समाजसुधारक बनने और नए से नए विचार लाने की होड़ मची थी... एक अखाड़े से आवाज आई- कुंभ में एक डुबकी लगाओ, एक पेड़ लगाओ। दूसरे अखाड़े से नागा चिल्लाए- गंगा को बचाना है- तीसरे अखाड़े के नागाओं ने तलवारें ऊंची कर दीं और बोले- सबसे जरूरी है कन्या भ्रूण हत्या को रोकना... पेशवाई जुलूस में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ प्रचार होता देख देव चौंक गया। उसे लगा कि शायद वाकई दुनिया बदल जाएगी... उसे पता चल गया कि पाप नहाने से नहीं, दुनिया को बेहतर बनाने से धुलते हैं। लेकिन अचानक सब बदल गया... अखाड़ों में फरसे चलने लगे... मल्लयुद्ध होने लगा... त्रिशूल सामने आ गए...
एक अखाड़े ने कहा- नागा होकर कन्याओं की बात करते हो... धर्म भ्रष्ट हो...
दूसरी ओर से आवाज आई... तुम पुरुषवादी हो... शिव बिना शक्ति के अधूरे हैं...
पहले ने कहा- ऐसा है तो अपने अखाड़े का महामंडलेश्वर महिला को बना दो...
महिला महामंडलेश्वर---
अब सब नि:शब्द थे...
देव, इस झगड़े का साक्षी था... उसे अपने जीवन की सबसे बेहतरीन स्टोरी मिलने वाली थी... नागा महिला को महामंडलेश्वर बनाएंगे... तो क्या महिला भी नागा... ? कुंभ की सबसे बेहतर स्टोरी का देव चक्षुदर्शी बनने जा रहा था...
बात बात की थी,
बात अखाड़े की साथ की थी...
तो ठीक है...
हमारी महामंडलेश्वर महिला होगी...
शक्ति स्वरूपा मां इंदुमती देवी की जय...
अर्धनारीश्वर शक्तिश्वरूपा रुद्र भगवान की जय...
शोर फिर से शुरू हो गया... कुंभ में पहली बार नागाओं की महामंडलेश्वर कोई महिला होगी... ये कैसे हो सकता है... अखाड़ों में महिला...? नागाओं में महिला...? क्या वो श्वेतांबरी होगी, या वो भी दिगंबर...? पर इन सब सवालों से बड़ा कौतूहल इस सवाल को लेकर था, कि आखिर वो कौन है वो शक्ति स्वरूपा... ? आखिर कौन है वो वैरागन जो नागाओं में महामंडलेश्वर बनने की योग्यता रखती है... आखिर कौन है जो शस्त्र और शास्त्र में इन अहोरी संन्यासियों का मुकाबला कर सके...
तो ठीक है... फैसला हो गया... महामंडलेश्वर के पट्टाभिषेक की तैयारियां शुरू की जाएं... सिंहासन आरूढ़ एक खेमे से आदेश हुआ...
सबका कौतूहल चरम पर था...
तर्क-वितर्क-कुतर्क... ? ये तो सनक है... ये न्यायोचित नहीं है... अखाड़े को कोई ऐसी महिला नहीं मिलेगी जो शास्त्र-मर्मज्ञ हो...
पर बात जुबान से निकल चुकी थी...
सबकी नजरें भावी महामंडलेश्वर पर टिकी थीं...
सिंहासन आरूढ़ एक खेमे से महिलाओं के एक दस्ते की ओर एक इशारा हुआ... और उस ओर भीड़ टूट पड़ी... देव कुछ समझ पाता इससे पहले भीड़ ने उसे धकिया दिया... संन्यासियों के शंखों, और नागाओं के मृदंगों- चिमटों की चिंघाड़ती आवाजें व्याकुल करने लगीं... कुरुक्षेत्र के अश्वघोष जैसे शोर में देव जैसे तैसे संभला... भीड़ को चीरता महिलाओं के दस्ते की ओर पहुंचा...
महामंडलेश्वर का चुनाव हो चुका था...
गेरुए कपड़ों में बैठी महिला को गुलाल से सराबोर कर दिया गया था...
अब पंचामृत स्नान कराया जा रहा था... महिला थी... कईयों की नजर में अतिरिक्त शुद्धि जरूरी थी...
पहले कलश का गंगा जल नवनियुक्त महामंडलेश्वर के अभिषेक करने लगा... चेहरे का गुलाल छूट गया... बस लाली बाकी थी...
बिट्टू...
देव, जीवन भर इससे ज्यादा नहीं बोल सका...
'समाप्त'
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705
कहानी किसी से मिलती जुलती है जिसे मैं जानता हूं। लेकिन ये कहानी क्या कभी खत्म हो सकती है
प्रत्युत्तर देंहटाएंradha to jalegi hi...jab knhaaya gopiya khojege......ha..ha...ha...
प्रत्युत्तर देंहटाएंvihal dubey....