मुझसे सैकड़ों मील दूर तेरी सिसकन
बहुत तकलीफ दे रही हैं मेरे बच्चे
और मैं कुछ नहीं कर सकता... कुछ नहीं...
मैं फोन करूं तो जी भर के गुबार निकाल लेना...
खूब गालियां देना मुझे...
तुम्हारे दिल को थोड़ी तसल्ली तो हो जायेगी...
तुम्हारी घुटन अब मुझसे बर्दाश्त नही होती...
सच में अब लग रहा है कि जीना बेमानी हो गया है...
क्या करूंगा इन सफलताओं का बेटा...
तेरे बिना...
रोज़ नये रंग रंगने के दिन हैं तेरे...
रोज़ खिलने के दिन हैं...
तेरे गुलाब से सुर्ख औऱ प्यारे से होठों से
आज तक इतने आई लव यू निकले हैं कि
अब इन बंदिशों से निकलना मुमकिन नहीं रह गया है....
औऱ मैं जानता हूं कि तुम नहीं छोड़ पा रहे हो मुझे मुझसे
मेरा टूटकर किया गया प्यार...
औऱ तेरा हर दर्जे का समर्पण...
अब न मुझे जीने दे रहा है औऱ न तुझे...
तेरी बातें अब बहुत डराने लगी हैं...
कि कहीं... कहीं तुम.......
नहीं... वादा करो मुझसे...
वादा करो कि ऐसा कुछ नहीं करोगे...
उफ़...
मुझे पहली बार पता चला है कि पापा क्यों बोलते थे...
कितने गैर जिम्मेदार हो तुम....
सोमवार, 17 मार्च, 2008
गैर जिम्मेदार...
रविवार, 16 मार्च, 2008
वादियां... मेरी आवारगी की कहानी III

मेरी आवारगी की कहानी I और II पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें-
आगे---
जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि इंदू अपने आप में कम्पलीट कहानी है... लेकिन हम तो बात बिट्टू की कर रहे हैं... इसलिये उसी की बात में आगे बताऊंगा... बिट्टू को समझने के लिय इंदू को समझना जरूरी था इसलिये बता दिया... तो मैं बता रहा था कि इंदू बदल गई थी... क्योंकि वो बिट्टू बनने वाली थी... आर्फन हाउस में बच्चों को पढ़ाने जाने लगी औऱ फिर उसकी दुनिया उन्हीं की हो गई... जिनके मां-बाप या तो नहीं थे... या उनका कुछ पता नहीं था... अनाथ बच्चों के साथ वो ऐसे रच बस गई कि दीन-दुनिया भूल गई... मां बाप का प्यार कैसा होता है ये उसके लिये भी एक सवाल ही था... पर इतना पता चल गया था कि मरियम की मूर्ती से वार्डन क्यों बहलाती थी... ये सवाल उसके लिये तो बिल्कुल ऐसा था जैसे अंधे होली खेलें औऱ उन्हीं से कोई बच्चा पूछ बैठे कि हमने कौन कौन से रंग खेले... ये हरा कैसा होता है... पर उसकी जिंदगी में तो अभी बहुत से रंग बचे थे... आसाम मे दुनिया हरी थी... कभी कभी लाल हो जाती थी... लाल सलाम आसाम में जोर लगा रहा था... उसे वहां से डर लगने लगा था... हर बड़े को वो घबराकर देखती थी... बस बच्चे थे जिनके साथ वो महफूज़ महसूस करती... लेकिन एक दिन बुलावा आ गया... घर से... उसका इंतज़ार हो रहा था... बेसब्री से... पहली बार... १२ साल में पहली बार... सब उसकी राह देख रहे थे... सब चाहते थे कि आखरी बार बेटी बाप को देख ले... आखरी बार... या पहली बार... जो भी कह लो... पर इंदू को घर जाना था... घर यानी मसूरी... वादियों के बीच... यहीं से शुरु होनी थी एक और कहानी... मेरी कहानी... जो आप पढ़ रहे हैं... वादियां... मेरी आवारगी की कहानी...
----------------------------------------------
कुछ देर के लिये मैं अपना नाम देव यानी देवराज रख लेता हूं... देवराज बचपन में इतना शरारती था कि दसवीं करते करते ग्यारह स्कूलों को दुआ सलाम कर चुका था... पढ़ाई लिखाई में होशियार था पर पिताजी हमेशा कहते कि लापरवाह है... दरअसल उसे फक्कड़ कहें तो ज्यादा ठीक होगा... शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया... पर देवराज को बांध पाया... देवराज को बंधना कतई मंजूर नहीं था... उम्र अंगड़ाई ले ही रही थी कि जनाब पत्रकार हो गए... खुले घूमते... खबरें बटोरते... शहर का सबसे कम उम्र का खबरची... जैसे तैसे कॉलेज किया... इंतेहान में पहले दर्जे से पास तो हो गया पर पढा कभी नहीं... तीन बहनें थीं औऱ पिताजी बीमार... उम्र बढ़ी तो जिम्मेदारी का अहसास भी हो गया... दिल्ली से भोपाल औऱ भोपाल से देहरादून... नौकरियों की तलाश में शहर बदलना शुरु किया... एक शहर से मॉस कम्युनिकेशन किया औऱ दूसरे में वही पढ़ाया... लाइटें ढोने से लेकर पर्दे पर दिखने तक का हुनर सीख लिया... कुछ पूछ होने लगी तो मेहनत भी बढ़ गई... पर कहानी शुरु हुई देहरादून से...


