मुझसे सैकड़ों मील दूर तेरी सिसकन
बहुत तकलीफ दे रही हैं मेरे बच्चे
और मैं कुछ नहीं कर सकता... कुछ नहीं...
मैं फोन करूं तो जी भर के गुबार निकाल लेना...
खूब गालियां देना मुझे...
तुम्हारे दिल को थोड़ी तसल्ली तो हो जायेगी...
तुम्हारी घुटन अब मुझसे बर्दाश्त नही होती...
सच में अब लग रहा है कि जीना बेमानी हो गया है...
क्या करूंगा इन सफलताओं का बेटा...
तेरे बिना...
रोज़ नये रंग रंगने के दिन हैं तेरे...
रोज़ खिलने के दिन हैं...
तेरे गुलाब से सुर्ख औऱ प्यारे से होठों से
आज तक इतने आई लव यू निकले हैं कि
अब इन बंदिशों से निकलना मुमकिन नहीं रह गया है....
औऱ मैं जानता हूं कि तुम नहीं छोड़ पा रहे हो मुझे मुझसे
मेरा टूटकर किया गया प्यार...
औऱ तेरा हर दर्जे का समर्पण...
अब न मुझे जीने दे रहा है औऱ न तुझे...
तेरी बातें अब बहुत डराने लगी हैं...
कि कहीं... कहीं तुम.......
नहीं... वादा करो मुझसे...
वादा करो कि ऐसा कुछ नहीं करोगे...
उफ़...
मुझे पहली बार पता चला है कि पापा क्यों बोलते थे...
कितने गैर जिम्मेदार हो तुम....
सोमवार, 17 मार्च, 2008
गैर जिम्मेदार...
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